AI वीडियो, डीपफेक और ब्लैकमेलिंग का बढ़ता जाल: अब हर वायरल वीडियो पर ‘AI’ का ठीकरा फोड़ने का नया खेल
डिजिटल दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डीपफेक तकनीक ने जहां तकनीकी दुनिया को नई दिशा दी है, वहीं इसका खतरनाक दुरुपयोग भी तेजी से बढ़ता जा रहा है। अश्लील वीडियो, फर्जी क्लिप, मॉर्फिंग और ब्लैकमेलिंग जैसे मामलों में अब “ये वीडियो AI जनरेटेड है” कहकर बच निकलने की कोशिशें भी सामने आने लगी हैं। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि कई लोग अपनी असली वायरल वीडियो को भी “डीपफेक” बताकर समाज, परिवार, कॉरपोरेट और कानूनी जांच से बचने का रास्ता तलाश रहे हैं।
प्रसिद्ध साइबर एक्सपर्ट Amit Dubey ने एक पॉडकास्ट इंटरव्यू में इसी खतरनाक ट्रेंड का खुलासा किया। उन्होंने बताया कि किस तरह कुछ लोग अपनी विवादित और वायरल वीडियो को “डीपफेक” साबित कराने के लिए फर्जी सर्टिफिकेट तक लेने की कोशिश कर रहे हैं। अमित दुबे के अनुसार, एक व्यक्ति ने उनसे संपर्क कर कहा कि उसकी एक महिला के साथ वीडियो वायरल हो गई है, जिससे उसकी कॉरपोरेट लाइफ और बिजनेस पर गंभीर असर पड़ रहा है। उस व्यक्ति ने वीडियो को “डीपफेक” घोषित करने के लिए सर्टिफिकेट मांगा ताकि वह जांच और सामाजिक दबाव से बच सके।
अमित दुबे ने बताया कि उन्होंने वीडियो अपनी इन्वेस्टिगेशन टीम को जांच के लिए भेजी, लेकिन रिपोर्ट में वीडियो वास्तविक निकली। इसके बावजूद संबंधित व्यक्ति लगातार “डीपफेक सर्टिफिकेट” देने का दबाव बनाता रहा और कहता रहा कि “महिला कभी कोर्ट नहीं जाएगी, बस मेरी जिंदगी बचा लीजिए।” साइबर एक्सपर्ट ने साफ इनकार करते हुए कहा कि गलत सर्टिफिकेट देना कानूनी रूप से बेहद गंभीर मामला हो सकता है और भविष्य में अदालत में सच सामने आने पर खुद जांचकर्ता भी फंस सकते हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि बाद में उस व्यक्ति ने खुद दावा किया कि उसने एक अलग AI जनरेटेड डीपफेक वीडियो तैयार करवाया और उसी पर किसी तरह “डीपफेक सर्टिफिकेट” हासिल कर लिया। इसके बाद उसने उसी सर्टिफिकेट का इस्तेमाल कर अपनी वास्तविक वायरल वीडियो पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए। अमित दुबे के मुताबिक, इस तरह की चालाकियां अब तेजी से बढ़ रही हैं और कई मामले अदालत तक पहुंचते ही नहीं, क्योंकि लोग सामाजिक बदनामी, परिवार और करियर के डर से चुप्पी साध लेते हैं।
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल केवल मनोरंजन या एडिटिंग तक सीमित नहीं रह गया है। अब इसका उपयोग राजनीतिक प्रोपेगेंडा, चरित्र हनन, फर्जी अश्लील वीडियो, ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग और डिजिटल एक्सटॉर्शन जैसे अपराधों में भी हो रहा है। दूसरी तरफ, कई लोग अपनी असली वीडियो या आपत्तिजनक कंटेंट को भी AI का नाम देकर खुद को “पीड़ित” साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे मामलों में फॉरेंसिक जांच, मेटाडाटा एनालिसिस, फेस मैपिंग और डिजिटल ट्रेसिंग जैसी तकनीकें ही सच्चाई सामने ला सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में अदालतों, जांच एजेंसियों और साइबर फॉरेंसिक लैब्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि असली और नकली वीडियो में अंतर कैसे स्थापित किया जाए। क्योंकि AI तकनीक जितनी तेजी से विकसित हो रही है, उतनी ही तेजी से उसका दुरुपयोग भी बढ़ रहा है।