उत्तराखंड:बादल फटने, ग्लेशियर पिघलने,भूस्खलन जैसी बड़ी प्राकृतिक आपदाओं की संभावनाओं के बावजूद लोग नदियों के किनारे संवेदनशील पहाड़ियों में अतिक्रमण कर रह रहे है!शासन प्रशासन को भी नही है कोई चिंता
बीती देर रात देहरादून जिले के रायपुर प्रखंड के सरखेत गांव में बादल फटने से कई लोगो की जान मुश्किल में पड़ गयी। एसडीआरएफ की टीम मौके पर पहुंचकर रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटी हुई है। गनीमत रही कि बादल फटने के बाद मची तबाही में किसी जनहानि की सूचना नही है। नदियों का पानी उफान पर आ गया है जिससे नदी किनारे बसी बस्तियां खतरे की जद में है। नदियों के किनारे बसने से जान पर बन आ सकती है ये लोग अतिक्रमण करने से पहले नही सोचते।
नदी किनारे खाली पड़ी सरकारी ज़मीनों पर कब्जा करने की होड़ लगी है कई जगह तो नदियों के किनारे आलीशान मकान बन चुके है। हालात ये हो चुके है नदियों के किनारे मकानों की बैरिकेडिंग नज़र आने लगी है। बरसात के दिनों में जब भारी बारिश होती है तो नदिया उफान मारने लगती है ऐसे में नदी किनारे बने कच्चे मकान कब गिर जाए कहा नही जा सकता।
उत्तराखंड में आए दिन कुछ न कुछ प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाएं आती रहती हैं. जिसके चलते मालहानि और जनहानि भी हो रही है. इस साल जुलाई से लेकर अभी तक कई घटनाएं ऐसी हुई हैं जिनमें जान-माल का नुकसान हुआ है. पर्यावरणविदों का कहना है कि राज्य में बादल फटने, ग्लेशियर पिघलने या भूस्खलन के अलावा भी एक बड़ी समस्या उभर रही है।
उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं (Natural Disaster) के अलावा पिछले कुछ सालों से ये आपदाएं ज्यादा बढ़ी हैं जिनमें ब्रिज या पुल टूटना, भूस्खलन, नदी-नालों में बाढ़ का पानी आने से लोगों के डूबने की घटनाएं, जमीन के धंसने और मकानों के ढहने की घटनाएं आम हो गई हैं.
पिछले कुछ दिनों में देखा गया है कि राज्य में नदियों या नालों के ऊपर बनाए गए पुल और सार्वजनिक परियोजनाओं के आसपास बड़ी संख्या में अतिक्रमण की समस्या पैदा हुई है. लोग नालों के ऊपर घर बनाकर रह रहे हैं और ऐसा किसी एक जगह पर नहीं है बल्कि अधिकांश हाइवे या रास्तों के आसपास हो रहा है. वहीं बारिश के इन चार महीनों में नदी और नालों में जलस्तर बढ़ने से बाढ़ के हालात पैदा हो रहे हैं।
राज्य में अतिक्रमण को लेकर सरकार को ध्यान देने की जरूरत है. इसके साथ ही लोगों को भी जान को जोखिम में डालकर अतिक्रमण करके घर बनाने से बचना चाहिए. अगर इसी तरह हालात रहे तो प्रकृति के कहर को रोकना मुश्किल हो जाएगा और बड़े स्तर पर जन और मालहानि होने से नहीं रोक सकेंगे.