विमान हादसे, सत्ता और चुप्पीः जब ‘सब कुछ ठीक था’ कहकर सिस्टम अपने हाथ खड़े कर देता है! सवाल जब आसमान से गिरते हों, तो ज़मीन पर जवाबदेही तय करना ही असली उड़ान सुरक्षा है

Plane crashes, power, and silence: When the system throws up its hands, saying, "Everything was fine!" When questions fall from the sky, establishing accountability on the ground is true flight safet

जब ‘सब कुछ ठीक था’ कहकर सिस्टम अपने हाथ खड़े कर देता है।
सवाल जब आसमान से गिरते हों, तो ज़मीन पर जवाबदेही तय करना ही असली उड़ान सुरक्षा है।

भारत में हर बड़ा विमान हादसा महज़ एक दुर्घटना नहीं होता, वह पूरी व्यवस्था की परीक्षा बन जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि लगभग हर बार यह परीक्षा एक ही उत्तर के साथ समाप्त कर दी जाती है “सब कुछ ठीक था।” विमान तकनीकी रूप से सक्षम था, पायलट और क्रू अनुभवी थे, मौसम अनुकूल था। इसके बाद जांच की औपचारिक घोषणा होती है और समय बीतने के साथ सवालों पर चुप्पी की परत जम जाती है। चीफ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ के हेलीकॉप्टर हादसे से लेकर गुजरात से जुड़े हाई-प्रोफाइल विमान क्रैश तक, घटनाओं का पैटर्न लगभग एक-सा रहा है। शोक, संवेदना और औपचारिक श्रद्धांजलि के बीच सबसे बुनियादी सवाल हाशिए पर चला जाता है। यदि सब कुछ ठीक था, तो दुर्घटना क्यों हुई? यह सवाल केवल तकनीकी नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ा है।

जब विमान हादसे आम नागरिकों के साथ होते हैं, तब भी जवाबदेही उतनी ही अनिवार्य होती है। लेकिन जब ऐसी घटनाएं राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पदों या प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तियों से संबंधित हों, तब सवाल और गंभीर हो जाते हैं। क्योंकि यहां मामला केवल जीवन हानि का नहीं, बल्कि उस भरोसे का होता है जो नागरिक राज्य की सुरक्षा व्यवस्था पर करता है। यहीं पर नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) और विमानन मंत्रालय की भूमिका कठघरे में खड़ी होती है। क्या ये संस्थाएं केवल काग़ज़ी नियामक बनकर रह गई हैं? क्या निगरानी, मेंटेनेंस और सेफ्टी ऑडिट की प्रक्रियाएं ज़मीनी स्तर पर उतनी ही सख़्त हैं, जितनी फाइलों और प्रेस बयानों में दिखाई जाती हैं? और सबसे अहम, क्या जांच रिपोर्टें कभी पूरी स्पष्टता और पारदर्शिता के साथ जनता के सामने रखी जाती हैं?

भारत में विमान हादसों की जांच अक्सर तकनीकी शब्दावली की आड़ में सीमित कर दी जाती है। ब्लैक बॉक्स, फेल्योर एनालिसिस और ऑपरेशनल लिमिट्स जैसे शब्द आम नागरिक के लिए सवाल पूछने की गुंजाइश को संकुचित कर देते हैं। लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना तकनीकी अज्ञानता नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है। यह सही है कि हर दुर्घटना को साज़िश के चश्मे से देखना न तो ज़िम्मेदाराना है और न ही तथ्यसंगत। लेकिन यह मान लेना कि हर हादसा केवल एक संयोग है, उससे भी बड़ा अन्याय है। संदेह तब पैदा होता है जब व्यवस्था सवालों से बचती है। जहां पारदर्शिता नहीं होती, वहां अफ़वाहें जन्म नहीं लेतीं, उन्हें व्यवस्था खुद जन्म देती है।

इसी संदर्भ में महाराष्ट्र की राजनीति में अजीत पवार का नाम भी आता है, जिनका सार्वजनिक जीवन लंबे समय से सत्ता और भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच झूलता रहा है। सिंचाई परियोजनाओं में लागत वृद्धि से लेकर सहकारी संस्थानों और भूमि सौदों तक, उनके राजनीतिक सफर में बार-बार यह प्रश्न उठा कि क्या नीतिगत फैसले जनहित से प्रेरित थे या सत्ता-समीकरणों से। कई मामलों में उन्हें कानूनी राहत मिली, लेकिन लोकतंत्र केवल अदालतों की क्लीन चिट पर नहीं चलता,वह नैतिक जवाबदेही भी मांगता है। यही वह कसौटी है जहां उनकी राजनीति लगातार सवालों के घेरे में रही है।

हाल के स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान अजीत पवार द्वारा बीजेपी के स्थानीय नेतृत्व पर, विशेषकर पिंपरी-चिंचवड़ महानगरपालिका के प्रशासन को लेकर लगाए गए आरोप, इसी राजनीतिक विरोधाभास को उजागर करते हैं। उन्होंने एक समय में समृद्ध रहे नगर निगम के आर्थिक संकट को कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं से जोड़ा। यह राजनीतिक टकराव अपने आप में असामान्य नहीं है, लेकिन जब ऐसे आरोपों और घटनाक्रमों के बीच प्लेन क्रैश में अजीत पवार के मारे जाने की खबर सामने आई, तो संदेह का जन्म लेना स्वाभाविक है, कि क्या वास्तव में ये एक प्लेन क्रैश हादसा था या कोई साजिश? फिर भले ही निष्कर्ष निकालना जांच एजेंसियों का काम हो।

प्लेन क्रैश से जुड़े मामलों में सबसे चिंताजनक पहलू यही है कि जब अत्याधुनिक तकनीक, अनुभवी पायलट और उच्च-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद हादसे हो रहे हैं, तो आम नागरिक के लिए सुरक्षा की गारंटी क्या है? क्या उसकी जान कम मूल्यवान है, या उसकी सुरक्षा पर सवाल उठाने का अधिकार भी सीमित है? विमान हादसों में केवल लोग नहीं मरते, हर हादसे के साथ व्यवस्था पर से भरोसा भी टूटता है। और जब तक जांच स्वतंत्र, निष्पक्ष और सार्वजनिक नहीं होगी, तब तक हर अगला हादसा एक दुर्घटना से अधिक, सिस्टम की विफलता के रूप में देखा जाता रहेगा। लोकतंत्र में शोक का स्थान है, लेकिन चुप्पी का नहीं। और जब सवाल आसमान से गिरते हों, तो ज़मीन पर जवाबदेही तय करना ही असली उड़ान सुरक्षा है।