शहीद दिवसः भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की अमर गाथा! हंसते-हंसते फांसी चढ़कर लिखी आजादी की सबसे प्रेरणादायक कहानी
भारत में हर साल 23 मार्च को शहीद दिवस मनाया जाता है, जो देश के महान क्रांतिकारियों के बलिदान की याद दिलाता है। इसी दिन भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। लाहौर सेंट्रल जेल की दीवारें आज भी उस क्रांतिकारी जोश की गवाही देती हैं, जब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने न केवल मौत को स्वीकार किया, बल्कि उसे हंसते-हंसते गले लगाया। यह सिर्फ तीन युवाओं की शहादत नहीं थी, बल्कि एक विचार, एक सपना और आजादी की अमर गाथा थी।
भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को बंगा (अब पाकिस्तान) में हुआ। बचपन से ही उनके मन में अन्याय के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी जल रही थी। जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके मन को झकझोर दिया। मात्र 12 साल की उम्र में उन्होंने वहां जाकर मिट्टी उठाई और घर लाकर रख ली, जैसे वादा किया हो कि खून का बदला लिया जाएगा। स्कूल छोड़कर वे क्रांतिकारी संगठनों से जुड़े। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को चुनौती दी। 1928 में लाहौर में पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या और 1929 में सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंकना, ये कदम केवल हिंसा नहीं थे, बल्कि आवाज थे। बम फेंकने के बाद वे भागे नहीं, बल्कि नारे लगाते रहे, इंकलाब जिंदाबाद! वे जानते थे कि यह मौत की ओर ले जाएगा, पर उनका उद्देश्य था, जागरण।
फांसी की सजा सुनाई गई। अदालत में भी वे हंसते रहे। एक बार सरकारी वकील से बहस के दौरान जब वे हंसे तो वकील ने शिकायत की। भगत सिंह ने जवाब दिया, मैं तो हंसने के लिए ही पैदा हुआ हूं। फांसी के तख्ते पर भी मैं हंसता ही मिलूंगा। फांसी से ठीक एक दिन पहले उन्होंने अपने साथियों को खत लिखा। उसमें उन्होंने कहा था, मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है। अगर मैं हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गया तो देश की माताएं अपने बच्चों से भगत सिंह बनने की उम्मीद करेंगी। कुर्बानियों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना नामुमकिन हो जाएगा। 23 मार्च 1931 शाम करीब 7ः33 बजे। अंग्रेजों ने नियम तोड़कर फांसी 11 घंटे पहले दे दी, क्योंकि वे डरते थे कि दिन में फांसी देने पर जनता भड़क सकती है। तीनों क्रांतिकारी जेल के गलियारे से गुजरते हुए नारे लगाते रहे, इंकलाब जिंदाबाद!
भगत सिंह ने फंदा गले में डलवाने से पहले लेनिन की जीवनी पढ़ी। जब जल्लाद आया तो उन्होंने कहा, रुको, पहले एक क्रांतिकारी दूसरे से मिल तो ले। फिर किताब छत की ओर उछालकर बोले, ठीक है, अब चलो। वे हंसते हुए फांसी के तख्ते पर चढ़े। फंदा चूमते हुए भी उनके चेहरे पर मुस्कान थी। मौत को उन्होंने डर नहीं, बल्कि उत्सव बना दिया। उनकी शहादत ने युवाओं में आजादी की लौ जला दी। अंग्रेजों को समझ आ गया कि ये लोग मरकर भी जीत गए। आज शहीद दिवस पर हम उन्हें नमन करते हैं। भगत सिंह हमें सिखाते हैं कि सच्ची आजादी सिर्फ राजनीति की नहीं, बल्कि विचारों की होती है। वे कहते थे, बम और पिस्तौल क्रांति नहीं लाते, क्रांति तो विचार लाते हैं। उनकी हंसी मौत पर विजय थी। भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव अमर रहें।