काशीपुर किसान सुसाइड केसः मित्र पुलिस की कार्यप्रणाली फिर सवालों में? वीडियो में एसएसपी के नाम का जिक्र! विपक्ष बोला- जिसपर आरोप, वही गठित कर रहा एसआईटी
रुद्रपुर। ऊधमसिंह नगर के काशीपुर क्षेत्र के किसान सुखवंत सिंह की आत्महत्या ने न सिर्फ एक परिवार को उजाड़ा है, बल्कि उत्तराखंड पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह कोई सामान्य आत्महत्या नहीं, बल्कि एक ऐसा मामला है जिसमें खुद मृतक ने मरने से पहले फेसबुक लाइव आकर चौकी से लेकर जिले के कप्तान तक पर संगीन आरोप लगाए। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सिस्टम इतना असंवेदनशील हो गया है कि पीड़ित की आखिरी आवाज भी उसे झकझोर नहीं पा रही? घटना 10-11 जनवरी की है, जब पेंगा निवासी किसान सुखवंत सिंह ने हल्द्वानी के काठगोदाम थाना क्षेत्र स्थित एक होटल में खुद को गोली मार ली। आत्महत्या से पहले किए गए फेसबुक लाइव वीडियो में सुखवंत ने काशीपुर के कुछ कथित प्रॉपर्टी डीलरों पर करोड़ों की ठगी का आरोप लगाया, साथ ही ऊधमसिंह नगर पुलिस पर भी गंभीर सवाल उठाए। उसने साफ कहा कि जमीन के नाम पर उससे तीन करोड़ रुपये नगद और एक करोड़ रुपये खाते में लिए गए, लेकिन जमीन के नाम पर उसके साथ फर्जीवाड़ा किया गया। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि उसने जिले के एसएसपी मणिकांत मिश्रा समेत कई पुलिस अधिकारियों के नाम लेकर खुद को प्रताड़ित किए जाने की बात कही।इस घटना के बाद पूरे प्रदेश में हड़कंप मच गया। विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष से जुड़े नेताओं ने भी पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य समेत पार्टी के कई विधायक काशीपुर पहुंचे, मृतक के परिजनों से मुलाकात की और फिर रुद्रपुर में पत्रकार वार्ता कर सरकार और पुलिस पर तीखा हमला बोला। कांग्रेस ने सीधे तौर पर ऊधमसिंह नगर जिले के एसएसपी को इस मामले का सबसे बड़ा दोषी ठहराया।
कांग्रेस का आरोप है कि जिस सिस्टम की वजह से सुखवंत को आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा, उसी सिस्टम के कथित आरोपित आज जांच और कार्रवाई कर रहे हैं। कांग्रेस नेताओं ने सवाल उठाया कि जब मृतक ने अपने वीडियो में एसएसपी का नाम लिया है, तो फिर वही एसएसपी थानाध्यक्षों को सस्पेंड कर रहे हैं और एसआईटी गठित कर रहे हैं। क्या यह न्याय की प्रक्रिया के साथ मजाक नहीं है? कांग्रेस का कहना है कि दोषी ही अगर दूसरों को सजा देगा, तो जनता भरोसा कैसे करे? गणेश गोदियाल ने यह भी दावा किया कि सुखवंत के पिता ने उन्हें बताया कि चौकी स्तर पर ठगी करने वालों से समझौता होने वाला था, लेकिन बड़े अधिकारियों के हस्तक्षेप से मामला उलझा दिया गया। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि आईटीआई थानाध्यक्ष, एसएसपी का करीबी है और पहले भी उस पर आरोप लग चुके हैं। इसके बावजूद उसे मलाईदार थाने की जिम्मेदारी दी गई। कांग्रेस ने मांग की है कि सबसे पहले एसएसपी को निलंबित किया जाए, उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज हो और पूरे मामले की सीबीआई जांच कराई जाए। चेतावनी दी गई है कि यदि 15 जनवरी तक कार्रवाई नहीं हुई तो डीजीपी कार्यालय का घेराव किया जाएगा।
महज विपक्ष ही नहीं, बल्कि भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधायक अरविंद पांडे ने भी इस प्रकरण में पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से एसएसपी को तत्काल निलंबित कर निष्पक्ष जांच कराने की मांग की थी। हालांकि, इसके बाद पुलिस की ओर से कुछ कर्मियों को निलंबित किया गया और चौकी के स्टाफ को लाइन हाजिर कर दिया गया। मुख्यमंत्री ने मजिस्ट्रेट जांच के आदेश देकर मामले की जिम्मेदारी कुमाऊं आयुक्त को सौंपी है और मण्डलायुक्त ने इसकी जांच भी शुरू कर दी है। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि जब मृतक ने खुद एसएसपी पर आरोप लगाए हैं, तो क्या ख़ुद एसएसपी द्वारा गठित एसआईटी निष्पक्ष जांच कर पाएगी? जब इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री द्वारा मजिस्ट्रेट जांच के आदेश देते हुए जांच की पूरी प्रक्रिया कुमाऊं आयुक्त को सौंपी गई तो आखिरकार आनन-फानन में खुद इस मामले में आरोपी होते हुए एसएसपी को एसआईटी जांच टीम क्यों गठित करनी पड़ी। ऐसे कुछ और भी सवाल है, जो आज उत्तराखंड की जनता के मन में कौंध रहे हैं और पुलिसिया सिस्टम की विश्वसनीयता पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा रहा हैं।