हरेला: जी रयै, जागी रयै, यो दिन बार भेटन रयै! हरियाली, आस्था और संस्कारों का जीवंत उत्सव! जब डाक से भेजे जाते थे हरेले के तिनके
रुद्रपुर। उत्तराखंड को देवभूमि केवल इसलिए नहीं कहा जाता कि यहां चारधाम, प्राचीन मंदिर और ऋषि-मुनियों की तपोभूमि है, बल्कि इसलिए भी कि, यहां की संस्कृति में प्रकृति को देवतुल्य माना गया है। 'पर्वत, नदियां, जंगल, खेत, पशु-पक्षी और धरती', सभी यहां के लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। इन्हीं जीवन मूल्यों और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की भावना का सबसे सुंदर प्रतीक है 'हरेला पर्व'। हराऊ (हरेला) आज 16 जुलाई 2026 को पूरे प्रदेश में श्रद्धा, उल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है। सावन मास के आगमन के साथ मनाया जाने वाला हरेला केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि, पर्यावरण और पारिवारिक संस्कारों का ऐसा महापर्व है, जो सदियों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान बना हुआ है। यह पर्व हरियाली, नई फसल, समृद्धि और सुख-शांति का संदेश देता है। मान्यता है कि भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन की स्मृति में भी इस पर्व को विशेष रूप से मनाया जाता है। हरेला पर्व की तैयारियां नौ दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं। घर के मंदिर या पूजा स्थल पर बांस की टोकरी या पात्र में गेहूं, जौ, धान, मक्का, तिल, उड़द, सरसों समेत विभिन्न प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। इन अंकुरों की हरियाली केवल बीजों के उगने का संकेत नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार के सुख, समृद्धि और आने वाली अच्छी फसल का शुभ संकेत मानी जाती है। मान्यता है कि जितने घने और हरे अंकुर निकलते हैं, उतनी ही बेहतर कृषि और खुशहाली का वर्ष माना जाता है। हरेला के दिन सबसे पहले देवी-देवताओं को पारंपरिक व्यंजनों और पकवानों का भोग लगाया जाता है। पूजा-अर्चना के बाद मंदिर में उगे हरेला को विधि-विधान से काटा जाता है और परिवार के प्रत्येक सदस्य के सिर पर रखकर मंगलकामना की जाती है। इस दौरान बड़े-बुजुर्ग अपने आशीर्वाद में कहते हैं, 'जी रयै, जागी रयै, यो दिन बार भेटन रयै।' इन शब्दों में केवल शुभकामना नहीं, बल्कि लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य, समृद्ध जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना समाहित होती है। यही लोकभाषा और लोकसंस्कार उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत बनाए हुए हैं। हरेला को उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा लोकपर्व भी माना जाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। इसलिए हरेला के अवसर पर प्रदेशभर में पीपल, आम, आंवला, बांज, बुरांश, देवदार और अन्य पौधों का रोपण किया जाता है। स्कूलों, सामाजिक संस्थाओं और ग्राम सभाओं द्वारा वृक्षारोपण अभियान चलाकर लोगों को हरियाली बचाने का संदेश दिया जाता है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कटाई और पर्यावरण संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब सदियों पुराना यह लोकपर्व आधुनिक समाज के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गया है। तेजी से बदलती जीवनशैली और आधुनिकता के दौर में युवा पीढ़ी अपनी लोक परंपराओं से दूर होती जा रही है। ऐसे समय में हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपने पूर्वजों की जीवन शैली से जुड़ने का माध्यम बन रहा है। यह पर्व बच्चों को खेती, प्रकृति, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण का महत्व सहज रूप से समझाता है। हरेला हमें यह भी सिखाता है कि समृद्धि केवल आर्थिक नहीं होती, बल्कि हरे-भरे जंगल, स्वच्छ जल, उपजाऊ धरती और परिवार की एकता ही वास्तविक संपन्नता है। हरेला केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक संस्कृति है। यह पर्व बताता है कि जहां प्रकृति की पूजा होती है, वहां समृद्धि स्वयं आती है। उत्तराखंड की लोक परंपराएं आज भी दुनिया को यह संदेश देती हैं कि विकास और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं। यदि आने वाली पीढ़ियां भी हरेला जैसे पर्वों की भावना को आत्मसात करें, तो हमारी सांस्कृतिक विरासत, खेती, जंगल और पर्यावरण आने वाले वर्षों तक सुरक्षित रहेंगे।