कारगिल विजय दिवस: दुश्मन की हर नापाक साजिश को ध्वस्त कर भारत ने लिखा था शौर्य का स्वर्णिम इतिहास! उत्तराखंड के 75 वीर सपूतों ने दिया था सर्वोच्च बलिदान, लिंक में पढ़ें खास रिपोर्ट

Kargil Vijay Diwas: India scripted a golden history of valor by thwarting every nefarious plot of the enemy! 75 brave sons of Uttarakhand made the supreme sacrifice; read the special report at the li

हर वर्ष 26 जुलाई को पूरा देश कारगिल विजय दिवस मनाकर उन अमर वीरों को नमन करता है, जिन्होंने वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध में मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। यह दिन भारतीय सेना के अदम्य साहस, अटूट संकल्प और सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है। कारगिल विजय दिवस केवल एक सैन्य जीत का स्मरण नहीं, बल्कि यह देश की एकता, अखंडता और राष्ट्रभक्ति का ऐसा पर्व है, जो हर भारतीय के मन में अपने सैनिकों के प्रति सम्मान और गर्व की भावना को और प्रबल करता है। कारगिल युद्ध का इतिहास भारत-पाकिस्तान के लंबे सीमा विवाद से जुड़ा है। वर्ष 1971 के युद्ध के बाद जहां पूर्वी पाकिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र बांग्लादेश के रूप में अस्तित्व में आया, वहीं दोनों देशों के बीच सीमा और कश्मीर को लेकर तनाव लगातार बना रहा। वर्ष 1998 में दोनों देशों द्वारा परमाणु परीक्षण किए जाने के बाद हालात और संवेदनशील हो गए। हालांकि, तनाव कम करने के उद्देश्य से फरवरी 1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच लाहौर घोषणा (Lahore Declaration) पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें कश्मीर सहित सभी विवादों का शांतिपूर्ण समाधान खोजने का संकल्प लिया गया। लेकिन पाकिस्तान ने इस भरोसे को तोड़ते हुए भारतीय सीमा में घुसपैठ की साजिश रची। पाकिस्तानी सैनिकों और आतंकवादियों ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार कर कारगिल, द्रास, बटालिक और मशकोह सेक्टर की ऊंची चोटियों पर कब्जा जमा लिया। उनका उद्देश्य श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग को बाधित करना और जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख के बीच संपर्क को तोड़ना था। मई 1999 में भारतीय सेना को इस घुसपैठ की जानकारी मिली, जिसके बाद सेना ने 'ऑपरेशन विजय' शुरू किया। लगभग दो महीने तक बर्फ से ढकी दुर्गम पहाड़ियों पर भीषण युद्ध चला। अत्यंत विषम परिस्थितियों, कठिन मौसम और दुश्मन की ऊंची चौकियों के बावजूद भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय दिया। उन्होंने एक-एक चोटी पर तिरंगा फहराते हुए टाइगर हिल, तोलोलिंग सहित कई महत्वपूर्ण रणनीतिक चोटियों पर दोबारा कब्जा कर लिया। आखिरकार 26 जुलाई 1999 को भारत ने निर्णायक विजय प्राप्त की और पाकिस्तानी घुसपैठियों को पूरी तरह खदेड़ दिया। इसी ऐतिहासिक जीत की स्मृति में हर वर्ष 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है।

वीरभूमि उत्तराखंड ने निभाई सबसे बड़ी जिम्मेदारी
कारगिल विजय की इस गौरवगाथा में उत्तराखंड का योगदान स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। सैनिक परंपरा और राष्ट्रसेवा के लिए प्रसिद्ध इस वीरभूमि ने युद्ध में अपने 75 वीर सपूतों को खोया, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। उत्तराखंड के जवानों ने दुश्मन के कब्जे वाली दुर्गम चोटियों को वापस लेने के अभियान में अद्वितीय साहस दिखाया। उन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना दुश्मन का सामना किया और तिरंगे की आन-बान-शान को कायम रखा। प्रदेश के सीमांत गांवों से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक अनेक परिवार ऐसे हैं, जिनकी कई पीढ़ियां भारतीय सेना में सेवा देकर देश की रक्षा करती रही हैं। यही गौरवशाली सैन्य परंपरा कारगिल युद्ध में भी देखने को मिली। युद्ध में भारतीय सेना के 526 जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया था, जिनमें उत्तराखंड के 75 वीर जवान शामिल थे। गढ़वाल राइफल्स और कुमाऊं रेजीमेंट के सैनिकों ने द्रास, बटालिक, मशकोह और कारगिल सेक्टर की दुर्गम चोटियों पर दुश्मन के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी। कारगिल युद्ध में गढ़वाल राइफल्स के 47 जवान वीरगति को प्राप्त हुए, जिनमें 41 उत्तराखंड के थे। वहीं कुमाऊं रेजीमेंट के 16 जवानों ने भी मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। युद्ध में अद्वितीय पराक्रम के लिए प्रदेश के सैनिकों को 39 वीरता पदकों से सम्मानित किया गया, जो उत्तराखंड की सैन्य परंपरा और वीरता का जीवंत प्रमाण हैं।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का पर्व
कारगिल विजय दिवस केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि यह नई पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम, कर्तव्यनिष्ठा और बलिदान का संदेश देने वाला प्रेरणादायी दिवस है। इस युद्ध ने यह साबित किया कि जब देश की संप्रभुता और सम्मान की बात आती है, तो भारतीय सैनिक किसी भी चुनौती के सामने अडिग रहते हैं। देशभर में इस अवसर पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है, स्मारकों पर पुष्पचक्र अर्पित किए जाते हैं और वीर परिवारों का सम्मान किया जाता है। स्कूलों, कॉलेजों और विभिन्न संस्थानों में देशभक्ति कार्यक्रम आयोजित कर युवाओं को सैनिकों के अदम्य साहस और राष्ट्रसेवा की भावना से परिचित कराया जाता है। कारगिल विजय दिवस उन अमर शहीदों के प्रति पूरे राष्ट्र की कृतज्ञता का प्रतीक है, जिन्होंने अपने आज को देश के कल के लिए समर्पित कर दिया। विशेष रूप से उत्तराखंड के वीर सपूतों का त्याग और पराक्रम आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा। उनका बलिदान भारतीय इतिहास में सदैव अमर रहेगा और तिरंगे की शान के साथ हमेशा याद किया जाएगा।