जागेश्वर धाम में अद्भुत परंपरा!मकर संक्रांति से शुरू होती है ‘घृत गुफा’ की आंखोखी परंपरा, एक माह तक घी में ढके रहते हैं भगवान भोलेनाथ

A unique tradition at Jageshwar Dham! The extraordinary tradition of the 'Ghee Cave' begins on Makar Sankranti, where Lord Shiva remains covered in ghee for a month.

उत्तराखंड के प्रसिद्ध जागेश्वर धाम में भगवान शिव की एक अद्भुत और प्राचीन परंपरा मकर संक्रांति के साथ आरंभ होती है। मान्यता के अनुसार, मकर संक्रांति से लेकर एक माह तक भगवान भोलेनाथ ‘घृत गुफा’ में तपस्या और ध्यान योग में लीन रहते हैं।

 


इस अवधि में जागेश्वर धाम के ज्योतिर्लिंग को लगभग 2.5 क्विंटल शुद्ध गाय के घी से पूरी तरह ढक दिया जाता है। पुजारियों के अनुसार, इस घी को पहले खौलते पानी में उबालकर शुद्ध किया जाता है, जिसके बाद ज्योतिर्लिंग पर लेप कर उसे गुफा के समान स्वरूप दिया जाता है। इसी स्वरूप को ‘घृत गुफा’ कहा जाता है।

 


एक माह पश्चात, संक्रांति के दिन विशेष विधि-विधान और पूजन के साथ घृत गुफा को खोलकर शिवलिंग को पुनः श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए उपलब्ध कराया जाता है। धाम के पुजारियों का कहना है कि इस अवधि में भगवान शिव गुफा में विराजमान होकर साधना करते हैं और यह स्वरूप अत्यंत पुण्यदायी एवं शुभ फल प्रदान करने वाला माना जाता है।
मान्यता है कि घृत गुफा में विराजमान भगवान शिव के दर्शन करने से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
इस पावन अवसर पर महामंडलेश्वर कैलाशानंद, धाम के पंडित नवीन भट्ट, आचार्य गोकुल भट्ट, शुभम भट्ट, ललित भट्ट, भगवान भट्ट, तारा भट्ट, गिरीश भट्ट, शेखर भट्ट सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु और भक्तजन उपस्थित रहे। पूरे विधि-विधान के साथ पूजन कार्यक्रम संपन्न कराया गया।