उत्तराखंड:महावारी/पीरियड्स!महिलाओं को क्यों रखा जाता है अलग?ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को डब्बा घरों,रजस्वला केंद्रों और गोठ में रहने को किया जाता है मजबूर!क्या ये महिलाओं के अधिकारों का हनन नहीं?
महिलाओं के उत्थान की कितनी भी बात क्यो न होती हो लेकिन एक मुद्दा आज भी ऐसा है जिसपर महिलाओं के साथ अन्याय होता है। ये मुद्दा है महिलाओं की महावारी का! शहरी इलाकों में तो काफ़ी कुछ बदल गया है लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी महिलाओं की माहवारी के ढिंढोरा पीट दिया जाता है उन्हें परिवार से अलग थलग रहने को मजबूर किया जाता है।
उत्तराखंड में महिलाओं की महावारी पर रूढ़िवादी परंपरा आज भी देखी जाती है। जब भी कोई नई नवेली दुल्हन ससुराल जाती है उसकी पहली माहवारी पर अजीब सा माहौल बना दिया जाता है। दुल्हन की पहली माहवारी को यहां लोक भाषा मे धींगाड़ होना,छूत होना,अलग होना,जैसे नामों से जानते है।
जैसे ही महावारी शुरू होती है वैसे ही उस महिला को इन रूढ़िवादी नियमो को जबरन मानना पड़ता है। अपना असहनीय दर्द भुला कर आज भी उत्तराखंड के कई इलाकों में महिलाएं ऐसी परंपरा को जीवित रखने के लिए मजबूर की जाती है।
मिली जानकारी के मुताबिक उत्तराखंड के चंपावत जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में 'डब्बा घर' बना हुआ है,जहाँ महिलाओं को अपने मासिक धर्म के दौरान रहना पडता है। पूरे 5 दिन महिलाओं को अपनी थाली,ग्लास,लोटा,ओढ़ने के कपड़े,जैसे रजाई गद्दा,इत्यादि सब कुछ अलग रखने पड़ते है। कई जगह महिलाओं को उनकी महावारी के दिनों में डब्बा घर में रखा जाता है कई जगह गोठ में। यहां महावारी के दौरान इस्तेमाल किये गए कपड़ो को गोठ के पीछे किसी जगह छुपाया जाता है ताकि किसी की नज़र न पड़े।
कई बार महावारी के लिए अध सूखे कपड़े ही इस्तेमाल करने पड़ते है,क्योंकि उन कपड़ो को खुले में सुखा भी नही सकते वरना ग्रामीण महिला को निर्लज्ज स्त्री कहते है। 5 दिन बाद जब महावारी खत्म हो जाती है तो महिला को महावारी के दौरान इस्तेमाल किये गए सारे कपड़ो को धोकर, उस जगह को गोबर से लीपकर,फिर सारे घर को उसी तरह गोबर से लीपकर गौमूत्र छिड़ककर पवित्र किया जाता है। महावारी से निबटने के बाद महिला भी गौमूत्र पीती है तभी उसे शुद्ध माना जाता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में ये महिलाओं के अधिकारों का हनन करने वाली ये परंपरा डब्बा घर या रजस्वला केंद्र या गोठ में निभाई जाती है।गोठ वह स्थान होता है जहां जानवरों को रखा जाता है। वहां ओढ़ने-बिछाने के लिए ज्यादा बिस्तर नहीं मिलता था।वही उत्तराखंड के कुछ शहरी इलाकों में जहाँ अलग से महिलाओं के लिए महावारी के दिनों में रहने के लिए कोई डब्बा घर नही होता तो वहाँ उन्हें घर के भीतर ही अलग चारपाई दे दी जाती है। जहां से उसे सिर्फ बाथरूम तक जाने की ही इजाज़त मिलती है घर मे किसी और जगह न तो महिला बैठ सकती है न ही अपने बच्चे को पकड़ सकती है। रसोई घर मे प्रवेश पर पूर्णतः प्रतिबंध लग जाता है। खाने के बर्तन अलग कर दिए जाते है।
हैरानी तब होती है जब जिन दिनों महिला को पोषक आहार की बहुत जरूरत होती और मन भी करता कि कुछ गरम-गरम और बढ़िया सा खाने को मिले उन्हीं दिनों में उससे कहा जाता था कि माहवारी के चार से पांच दिन तक बिल्कुल सादा और बाकी दिनों की अपेक्षा थोड़ा कम मात्रा में भोजन खाना पड़ेगा। और भोजन उसे सबसे अलग बैठकर उसी स्थान पर करना होता जहां उसे लगभग चार से पांच दिन रहना है। यानी ग्रामीण क्षेत्रों में डब्बा घरों,रजस्वला केंद्र,या गोठ में और शहरी इलाकों में घर के अंदर ही एक कोने में पड़ी चारपाई में। उन चार से पांच दिनों तक घर के अंदर महिला का प्रवेश वर्जित रहता, क्योंकि घर में देवी देवताओं को किसी भी प्रकार से छू कर छुत्याना (छूत फैलाना) नहीं होता है।
माना जाता कि इससे सारे घर में अघोर हो जाएगा. घर के किसी सदस्य को भी छूना नहीं है, अगर गलती से छू लिया तो उसको किसी सदस्य द्वारा गो मूत्र छिड़क कर ही अंदर आने दिया जाता. माना तो यह भी जाता है कि यदि इस तरह से घर का कोई भी सदस्य उस महिला को छू लेता है तो सारे घर में अघोर फैल जाएगा. जिससे घर के सदस्य के शरीर में अवतरित होने वाले देवी-देवता नाराज हो जाएंगे या कुछ विघ्न हो जाएगा. इससे घर के कुछ लोग, खासकर बुजुर्ग, बीमार भी हो सकते हैं. इस मान्यता के प्रति अंधविश्वास इतना अधिक होता कि वास्तव में लोग बीमार होने लगते. शायद तीव्र मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कारण ऐसा होता है.
माहवारी के दौरान अलग बैठने और सोने का ये मतलब भी नहीं होता है कि महिला को काम से छुट्टी मिल गई है. ऐसा बिल्कुल नहीं है क्योंकि उसको अन्दर के काम नहीं करने होते हैं तो घर में उसकी उतनी जरूरत भी नहीं होती है. लेकिन उस दौरान वह जंगल में घास-फूस, लकड़ी-पतड़ी लाना, जानवरों को नहलाना-धुलाना आदि सभी बाहरी काम किया करती है. घर की कोई बड़ी महिला पुराने बक्से से या कभी किसी ओने-कोने से तलाश कर कुछ मैले, पुराने कपड़े के टुकड़े उसकी ओर उछाल जाती ताकि अगर वह चाहे तो माहवारी में उन कपड़े के टुकड़ों का इस्तेमाल कर ले। इन्हें सेन्टरी पैड्स उपलब्ध नही होते। कई संस्थाएं आजकल गांव गांव जाकर सेन्टरी पैड्स उपलब्ध करवाने लगी है। लेकिन आज की इस इक्कीसवीं सदी मे इस तरह की सामाजिक कुरीतियाँ मानव अधिकारों का हनन हैं। इस कुरीति को आज का युवा बिल्कुल भी पसंद नहीं करता।