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हिंदी सिनेमा का बुलंद सितारा खामोश: 'एक मच्छर' से 'क्रांतिवीर' तक... बेबाक अंदाज और कड़क संवादों के लिए हमेशा याद किए जाएंगे नाना पाटेकर

A towering star of Hindi cinema falls silent: From 'Ek Machhar' to 'Krantiveer'... Nana Patekar will always be remembered for his outspoken style and powerful, hard-hitting dialogues.

नई दिल्ली। अपनी कड़क आवाज, स्वाभाविक अभिनय और संवाद अदायगी के अलग अंदाज से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर (विश्वनाथ पाटेकर) का गुरुवार सुबह गोवा में निधन हो गया। वे 75 वर्ष के थे। तड़के सीने में तेज दर्द की शिकायत के बाद उन्हें बेहोशी की हालत में गोवा स्थित मणिपाल अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने सुबह 5:20 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया। डॉक्टरों की टीम ने उन्हें बचाने के लिए घर पर और अस्पताल में लगातार कार्डियक मसाज (CPR) दिया, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, मामला मेडिको-लीगल (MLC) होने के कारण मौत की सही वजहों के लिए पोस्टमार्टम कराया जाएगा।

नाना पाटेकर के 10 कालजयी और मशहूर संवाद 
यशवंत (1997):
"एक मच्छर, साला आदमी को हिजड़ा बना देता है... सुबह घर से निकलो, भीड़ का हिस्सा बनो, शाम को घर जाओ, दारू पिओ, बच्चे पैदा करो और सुबह फिर एक बार मर जाओ... क्योंकि अंदर का इंसान मर चुका है।"
क्रांतिवीर (1994): "आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने... तुम्हारी ये नामर्दानगी, बुजदिली एक दिन इस देश की मौत का तमाशा इसी खामोशी से देखेगी।"
क्रांतिवीर (1994): "ये मुसलमानों का खून, ये हिंदू का खून... बता इसमें मुसलमान का कौन सा, हिंदू का कौन सा है?"
क्रांतिवीर (1994): "ये धनिया, इधर मत मार.. समझा क्या? इधर छोटा दिमाग होता है, आदमी मर जाता है।"
गुलाम-ए-मुस्तफा (1997): "15 सौ की नौकरी करने वाला, एक दिन तुझे डेढ़ सौ का कफन पहनाएगा।"
तिरंगा (1993): "मराठा या तो मरता है या तो मारता है..."
परिंदा (1989): "ये दुख नाम की बीमारी का इलाज किसी डॉक्टर के पास नहीं है... इसका इलाज खुद ही ढूंढना पड़ता है, दुख को भूलना पड़ता है।"
राजनीति (2010): "राजनीति में फैसले सही या गलत नहीं होते, फैसले होते हैं। उन्हें वक्त और हालात के हिसाब से लिया जाता है।"
प्रहार (1991): "तू शेर है, शेर की तरह दहाड़... वरना कुत्तों की तरह भौंकते रह जाओगे।"
अब तक छप्पन (2004): "इस दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं... एक वो जो खुद के लिए जीते हैं और दूसरे वो जो दूसरों के लिए जीते हैं।"

संघर्ष और बेबाकी से भरा जीवन: विश्वनाथ से 'नाना' बनने का सफर
13 की उम्र में 35 रुपये के लिए पोस्टर पेंटिंग: नाना का बचपन तंगहाली में बीता। मात्र 13 साल की उम्र में वे स्कूल के बाद 8 किलोमीटर पैदल चलकर जाते थे और फिल्मों के पोस्टर पेंट करते थे। इसके लिए उन्हें महीने के 35 रुपये और एक वक्त का खाना मिलता था। उनका असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। बचपन में बहन प्यार से उन्हें 'नाना' कहती थी, जो बाद में उनकी पहचान बन गया। उनके सरकारी पहचान पत्रों पर भी 'नाना पाटेकर' दर्ज था। वर्ष 1978 में उन्होंने थियेटर कलाकार नीलकंती से शादी की। शादी में कुल 750 रुपये खर्च हुए थे। शुरुआती दिनों में नीलकंती बैंक में 2500 रुपये की नौकरी करती थीं, जबकि नाना को एक शो के मात्र 50 रुपये मिलते थे। नाना पाटेकर के बड़े बेटे का बचपन में ही निधन हो गया था, जिससे वे बुरी तरह टूट गए थे। बाद में उनके छोटे बेटे मल्हार पाटेकर के जन्म से परिवार में खुशियाँ वापस आईं।

सेना से अटूट लगाव और जान जोखिम में डालकर अभिनय, खेत की मिट्टी से जुड़ाव
फिल्म 'प्रहार' के निर्देशन और अभिनय के लिए नाना ने भारतीय सेना के साथ बाकायदा कठिन सैन्य प्रशिक्षण लिया था। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से अनुमति लेकर नाना जवानों का हौसला बढ़ाने के लिए करीब 60 दिनों तक सेना के साथ अग्रिम मोर्चे पर रहे थे। फिल्म 'परिंदा' के क्लाइमैक्स में असली आग के दृश्य के दौरान वे बुरी तरह झुलस गए थे। उनकी दाढ़ी, मूंछ और त्वचा जल गई थी और उन्हें 6 महीने आराम करना पड़ा था। अभिनय के शिखर पर रहने के बावजूद नाना पाटेकर बेहद सादा जीवन जीते थे। फिल्मों से दूर वे अपने फार्महाउस पर खुद हल चलाते थे और मवेशियों की देखभाल करते थे। उन्हें खाना बनाने का बेहद शौक था और वे अक्सर मजाक में कहते थे कि वे अभिनेता से बेहतर बावर्ची हैं। अपने शानदार अभिनय और बेबाक व्यक्तित्व के बल पर उन्होंने भारतीय सिनेमा पर जो छाप छोड़ी है, वह सदियों तक याद रखी जाएगी।