Oct 11, 2026 Login
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उत्तराखंड:आख़िर क्यो पहाड़ों में चीड़ का पेड़ माना जाता है अपवित्र? जानिए अपने पहाड़ों की इस लोककथा को!

Uttarakhand: After all, why is the pine tree in the mountains considered impure? Know this folk tale of your mountains!

आप उत्तराखंड के है तो चीड़ के पेड़ को पहाड़ में अपवित्र मानते है ये आपको पता ही होगा, और अगर उत्तराखंड के नही है तो आज आपको बताते है कि यहाँ पहाड़ों में चीड़ के पेड़ को अपवित्र मानने के पीछे की लोककथा क्या है!
दरअसल उत्तराखंड देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध है यहाँ देवी देवताओं का वास है। चीड़ के पेड़ को अपवित्र मानने की लोककथा भी देवी पार्वती यानी गौरी से जुड़ी है। ऐसा कहा जाता है कि भादौ के महीने में देवी पार्वती जब कैलाश से अपने मायके जा रही थी तब वो रास्ता भटक गई। अपने मायके का सही रास्ता उन्हें कहीं नजर नही आ रहा था। दूर दूर तक कोई भी दिखाई नही दे रहा था,तो उन्होंने अलग अलग पेड़ो से ही रास्ता पूछा,जो पेड़ अच्छी तरह जवाब देता तो देवी पार्वती उसे आशीर्वाद देकर आगे बढ़ती जाती। 
सबसे पहले देवी पार्वती को नींबू का पेड़ दिखा, उन्होंने पेड़ से पूछा"अरे नींबू की डाली,मेरे मैतूड़े का रास्ता कौन सा है? पेड़ ने जवाब दिया दायां रास्ता केदार को और बाँया रास्ता तेरे मायके को"। गौरी पार्वती ने नींबू के पेड़ को आशीर्वचन दिए और कहा तू सफेद रंगों में फूलना नींबू की डाली,लाल रंगों में फलना पकना,तेरे फल मनुष्य खाएं नींबू की डाली।" इस तरह गौरी पार्वती आगे बढ़ती है। रास्ते मे अब नारंगी का पेड़ दिखाई देता है तो देवी नारंगी के पेड़ से पूछती है-" हैं रेँ रास्ते की नारंगी की डाली,मेरे मायके का रास्ता क्या तुझे पता है? पेड़ की डाली झूलती हुई जवाब देती है मानो मुस्कुराते हुए माँ को उनके मायके तक का पता बताने में उसे गर्व महसूस हो रहा हो,डाली कहती है"दायां रास्ता त्रियुगीनारायण को और बायां रास्ता तेरे मायके को"। देवी ये सुनकर प्रसन्न हो जाती है और आशीर्वाद देती है कि तुम नीले रंगों में फूलना पीले रंगों में पकना,तुम्हारे फल देवताओं को चढ़ें नारंगी की डाली"।
इस तरह देवी गौरी और आगे बढ़ती है,रास्ते मे अब उन्हें घिंगारू का पौधा मिलता है तो माँ गौरी पौधे से पूछती है आह रास्ते में की  डाली तेरे को मायके का रास्ता पता है मेरे" डाली कहती है बाया रास्ता बद्रीनाथ को दाया तेरे मायके को" देवी गौरी खुश हो जाती हैं और आशीर्वचन देती हैं और कहती हैं यह डाली तो धुंधले रंगों में फूलना और लाल फलों में पकना, तेरे फल पक्षी खाएं"। इस तरह गौरी आगे बढ़ती हैं और रास्ते में उन्हें किरमोड़े की झाड़ी मिलती है।  गौरी झाड़ी से पूछती है "हां रेँ किरमोड़े की डाली मेरे मायके का रास्ता कौन सा है?" डाली कहती है बाया रास्ता जाएगा सीधे कैलाश को और दाया रास्ता तेरे मायके को"।  गौरी आशीर्वचन देकर कहती हैं किरमोड़े की डाली तू पीले रंगों में फलना और नीले रंगों में पकना, तेरे फल ग्वाले खाएं।  इसके बाद मां गौरी आगे बढ़ती हैं और उन्हें रास्ते में हिसालू की झाड़ी मिल जाती है। और मां गौरी अब इस झाड़ी से अपने मायके का रास्ता पूछती है। झाड़ी कहती है दायां डोटीगढ़ को बायां तेरे मायके को। मां खुश होकर कहती है तू कोंपलों में फूलना और बूंदों की तरह पकना,रेँ प्यारी सी डाली तेरे फल बहु बेटियां खाएं। ये आशीर्वाद देकर मां गौरी आगे बढ़ती है।
अब रास्ते मे मां को चीड़ का पेड़ मिलता है। तो माँ उससे भी अपने मायके का रास्ता पूछती है और कहती है -ओहो धार में खड़ी चीड़ की डाली,मेरे मायके का रास्ता पता है क्या?" चीड़ चिड़चिड़े होकर जवाब देती है मैं अपने ही शोर गुल से परेशान हूँ तेरे मायके का रास्ता मैं क्या जानू?"इस तरह चीड़ के पेड़ का घमंड और ऐंठन देखकर मां को गुस्सा आ जाता है और मां उसे आशीर्वाद देने की जगह कहती है कि" धिक्कार है तुझपर चीड़ की डाली,भटकों को रास्ता नही दिखा सकता,तू एक ही जन्म लेना,हरे फूलों में फूलना,फल सूख जाने के बाद पकना,रेँ चीड़ की डाली तेरे फल खाली जमीन में झड़े और सड़े।"
इस तरह चीड़ के पेड़ को मां का आशीर्वाद नही बल्कि श्राप मिलता है तब से लेकर आज तक उत्तराखंड के पहाड़ों में चीड़ के पेड़ को अपवित्र माना जाता है। 
मां जब आगे बढ़ती है तो उन्हें देवदार के पेड़ भी मिलता है और मां उससे भी मायके का रास्ता पूछती है और कहती है अरे गधेरे में खड़े देवदार मेरे मायके का रास्ता कौनसा है? देवदार डालियों को आगे बढ़ाकर हाथ जोड़कर कहता है री लाडली यही तो है तेरा मायका!आ जा मेरी पुत्री कब बिछाए थे तेरे लिए नैन! मां गौरी ये सुनकर भावुक होने के साथ साथ प्रसन्न भी होती है और कहती है कि हमेशा हरे भरे ही रहना देवदार, तेरे पत्ते हमेशा देवी देवताओं को चढ़ाएं जाएं।
इस तरह गौरी मां कैलाश से अपने मायके पहुंचती है जहां उनकी सखियां उन्हें देखकर फुले नही समाती,और खूब गाने गाती है