भारत पर 100% टैरिफ का खतरा! रूसी तेल खरीद पर अमेरिकी सीनेट का बड़ा कदम, व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ी चिंता
नई दिल्ली। यूक्रेन युद्ध और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंधों में एक नया तनाव पैदा हो गया है। अमेरिकी सीनेट ने रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले एक कड़े विधेयक को आगे बढ़ाने की मंजूरी दे दी है। इस विधेयक के प्रावधानों के तहत भारत सहित पांच देशों पर 100 फीसदी तक आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने का बड़ा खतरा मंडराने लगा है।
रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत पर एक बार फिर अमेरिकी दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी सीनेट ने रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने वाले एक महत्वपूर्ण विधेयक को आगे बढ़ाने की मंजूरी दे दी है। इस प्रस्तावित कानून में भारत सहित पांच देशों पर 100 फीसदी तक आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने का प्रावधान है। यदि यह विधेयक अंतिम रूप से लागू होता है, तो भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों और ऊर्जा सुरक्षा पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है। यह प्रतिबंध विधेयक दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम द्वारा तैयार किया गया था। मंगलवार को सीनेट में इसे आगे बढ़ाने के पक्ष में 86 सांसदों ने मतदान किया, जबकि 12 सांसदों ने इसका विरोध किया। संयोग से इसी दौरान यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की भी अमेरिकी संसद भवन पहुंचे थे। विधेयक का घोषित उद्देश्य यूक्रेन युद्ध के बीच रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और उसकी ऊर्जा आय से होने वाली कमाई को सीमित करना है।प्रस्तावित कानून के तहत भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे उन देशों पर भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान है, जो रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा आयात कर रहे हैं। इसके अलावा रूस के अधिकारियों और उससे जुड़े आर्थिक तंत्र पर भी अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए जाने की बात कही गई है।
भारत वर्तमान में चीन के बाद रूस से कच्चा तेल खरीदने वाला दूसरा सबसे बड़ा आयातक है। पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधित समुद्री आवाजाही के कारण भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए रूसी तेल का महत्व काफी बढ़ गया है। पहले भारत के कुल तेल आयात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों से आता था, लेकिन आपूर्ति प्रभावित होने के बाद भारतीय तेल कंपनियों ने रूस को प्रमुख विकल्प के रूप में अपनाया। इस विधेयक की पृष्ठभूमि भी अहम है। अप्रैल 2025 में इसे पहली बार पेश किया गया था। इसके बाद अगस्त 2025 में तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन ने भारत के रूस के साथ ऊर्जा व्यापार पर आपत्ति जताते हुए अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। उस फैसले के बाद भारत पर कुल अमेरिकी टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ा और वार्ताओं की गति भी प्रभावित हुई। हालांकि, बाद में पश्चिम एशिया में ऊर्जा संकट गहराने और वैश्विक आपूर्ति प्रभावित होने के बाद अमेरिका ने रूसी तेल खरीद को लेकर कुछ छूट दी थी। इस राहत के बाद भारत ने रूस से तेल आयात बढ़ाया। ऊर्जा एवं स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र के अनुसार, जून 2026 में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात 34 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इन आयातों का मूल्य 4.5 अरब यूरो रहा, जो रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात राजस्व का लगभग 36 प्रतिशत हिस्सा था। अब अमेरिकी सीनेट में इस विधेयक के आगे बढ़ने से भारत के सामने नई कूटनीतिक और आर्थिक चुनौती खड़ी हो सकती है। एक ओर भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करनी है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों को भी संतुलित बनाए रखना होगा। आने वाले दिनों में इस विधेयक पर आगे की प्रक्रिया और अमेरिकी प्रशासन का अंतिम रुख भारत की ऊर्जा नीति और द्विपक्षीय व्यापारिक संबंधों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।