Aug 19, 2026 Login

अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा: PM मोदी को गाली देने वाले कंटेंट क्रिएटर को झटका! त्रिपुरा हाईकोर्ट का FIR रद्द करने से इनकार, लिंक में जानें क्या है पूरा मामला?

Limits of freedom of expression: Setback for content creator who abused PM Modi! Tripura High Court refuses to quash FIR; click the link to learn the full details of the case.

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री के खिलाफ सोशल मीडिया पर कथित तौर पर आपत्तिजनक और मानहानिकारक टिप्पणी करने के मामले में त्रिपुरा हाईकोर्ट ने एक कंटेंट क्रिएटर के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि राजनीतिक आलोचना लोकतंत्र का अहम हिस्सा है, लेकिन सोशल मीडिया पर किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ अपमानजनक, मानहानिकारक या निंदनीय भाषा का इस्तेमाल कानून के दायरे से बाहर नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति टी. अमरनाथ गौड़ और न्यायमूर्ति एस. दत्ता पुरकायस्थ की पीठ कंटेंट क्रिएटर माधबी बिस्वास चक्रवर्ती की ओर से दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन याचिकाओं में पूर्वी अगरतला और पश्चिमी अगरतला पुलिस थानों में दर्ज एफआईआर तथा जांच के बाद दाखिल आरोपपत्रों को रद्द करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रधानमंत्री के अलावा अगरतला के महापौर और माता त्रिपुरेश्वरी को लेकर भी कथित आपत्तिजनक टिप्पणियां करने के आरोप लगाए गए थे। शिकायतों के अनुसार, याचिकाकर्ता ने सोशल मीडिया पर भारत के प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित तौर पर अपशब्दों और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया था। इसके साथ ही अगरतला के महापौर और माता त्रिपुरेश्वरी को लेकर भी आपत्तिजनक टिप्पणियां किए जाने का आरोप लगाया गया। पुलिस ने इन शिकायतों के आधार पर मामले दर्ज किए और याचिकाकर्ता को गिरफ्तार भी किया गया था। बाद में उच्च न्यायालय ने 7 जनवरी को उन्हें अंतरिम जमानत दी। जांच पूरी होने के बाद दोनों मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए गए। इसके बाद 13 फरवरी को अदालत ने उन्हें स्थायी जमानत प्रदान की। जमानत मिलने के बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए एफआईआर और आरोपपत्रों को रद्द करने की मांग की। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उनके बयानों में आपराधिक मानहानि के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं हैं। उन्होंने दावा किया कि सोशल मीडिया पर किए गए बयान उनकी व्यक्तिगत राय और विचारों की अभिव्यक्ति थे, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत संरक्षण हासिल है। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं और उनका उद्देश्य उन्हें परेशान करना है।

राज्य ने किया याचिकाओं का विरोध
राज्य सरकार ने याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर प्रधानमंत्री के खिलाफ अपमानजनक और आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं। इसके अलावा माता त्रिपुरेश्वरी के संबंध में कथित आपत्तिजनक बयान देकर लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का भी आरोप लगाया गया। राज्य की ओर से कहा गया कि पुलिस जांच के दौरान प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री सामने आई है। ऐसे में इस स्तर पर एफआईआर और आरोपपत्र को रद्द करना उचित नहीं होगा। राज्य ने अदालत से कहा कि मामले में सामने आए आरोपों की वास्तविकता का फैसला मुकदमे के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

राजनीतिक आलोचना और मानहानि के बीच अंतर जरूरी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भारत में प्रधानमंत्री एक उच्च संवैधानिक पद पर आसीन हैं। लोकतंत्र में राजनीतिक आलोचना पूरी तरह स्वीकार्य है और सरकार या सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के कामकाज पर सवाल उठाना नागरिकों के अधिकार का हिस्सा है। लेकिन आलोचना के नाम पर सोशल मीडिया पर अपमानजनक, मानहानिकारक या निंदनीय भाषा का इस्तेमाल कानून के दायरे में जांचा जा सकता है। अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया के माध्यम से किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री तेजी से बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकती है। इसलिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर किए गए कथित मानहानिकारक बयानों को केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर स्वतः संरक्षण नहीं दिया जा सकता। पीठ ने कहा कि पुलिस और कानून प्रवर्तन एजेंसियां ऐसी आपत्तिजनक सामग्री पर कार्रवाई कर सकती हैं और भारतीय कानून में मानहानि, सार्वजनिक उपद्रव तथा शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर किए गए अपमान से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं।

सोशल मीडिया पर गलत जानकारी तेजी से फैलने पर चिंता
अदालत ने आधुनिक समय में सोशल मीडिया की बढ़ती भूमिका का भी उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि सोशल मीडिया लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। इसके माध्यम से लोग संवाद करते हैं, जानकारी साझा करते हैं और एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। हालांकि इसके साथ ही गलत या भ्रामक जानकारी के तेजी से प्रसारित होने का खतरा भी बढ़ा है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के बारे में गलत जानकारी या आरोप सोशल मीडिया पर बहुत कम समय में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकते हैं और उसकी प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि आज बड़ी संख्या में लोग विभिन्न मुद्दों पर सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं, लेकिन इसी माध्यम का इस्तेमाल साइबर मानहानि के लिए भी किया जा रहा है।

अभिव्यक्ति की आजादी प्रतिष्ठा खत्म करने का अधिकार नहीं
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के तहत मौलिक अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर मानहानिकारक, दुर्भावनापूर्ण या अपमानजनक सामग्री प्रकाशित करने के बाद कानून से संरक्षण का दावा कर सकता है। अदालत ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नष्ट करने का लाइसेंस नहीं है। यदि कोई व्यक्ति झूठे दावे प्रकाशित करता है, किसी के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण अभियान चलाता है या बिना पुष्टि के आरोप सोशल मीडिया पर साझा करता है, तो परिस्थितियों के अनुसार उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। पीठ ने यह भी कहा कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर किए गए ऐसे कृत्यों के लिए दीवानी कार्रवाई के साथ-साथ कानून के तहत आपराधिक कार्यवाही भी संभव हो सकती है, यदि संबंधित अपराध के आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया मौजूद हों।

प्रधानमंत्री और महापौर की प्रतिष्ठा को नुकसान का आरोप
अदालत ने एफआईआर में लगाए गए आरोपों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता ने प्रधानमंत्री और राज्य के महापौर के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। पीठ ने कहा कि कथित बयानों में उनके नाम और उपनाम का मजाक उड़ाने तथा उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री होने का आरोप है। अदालत ने यह भी माना कि माता त्रिपुरेश्वरी के संबंध में कथित टिप्पणियों से उनकी पूजा करने वाले लोगों की भावनाओं पर भी असर पड़ने की बात शिकायत में कही गई है। पीठ के मुताबिक, एफआईआर में लगाए गए आरोपों को इस स्तर पर पूरी तरह निराधार नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ताओं को कानून के तहत उपलब्ध उचित उपाय अपनाने का अधिकार है और मामले की सुनवाई के दौरान आरोपों तथा साक्ष्यों का परीक्षण किया जा सकता है।

एफआईआर रद्द करने से हाईकोर्ट का इनकार
हाईकोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर उपलब्ध सामग्री को देखते हुए आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह समाप्त करना उचित नहीं होगा। अदालत ने याचिकाकर्ता की उन दलीलों को स्वीकार नहीं किया, जिनमें कहा गया था कि उनके बयान केवल विचारों की अभिव्यक्ति थे और उन्हें संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत संरक्षण हासिल है। पीठ ने माना कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर संविधान में उचित प्रतिबंध भी निर्धारित हैं और किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा की रक्षा भी कानून का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति के खिलाफ कथित मानहानिकारक सामग्री प्रकाशित किए जाने के मामले में कानून के अनुसार जांच और मुकदमे की प्रक्रिया को केवल मौलिक अधिकार का हवाला देकर रोका नहीं जा सकता। अदालत ने इसी आधार पर कंटेंट क्रिएटर के खिलाफ दर्ज दोनों मामलों की एफआईआर और आरोपपत्रों को रद्द करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया पर राजनीतिक विचार और आलोचना व्यक्त करने का अधिकार बना हुआ है, लेकिन किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली कथित सामग्री के लिए कानूनी जवाबदेही से पूरी तरह छूट नहीं मिल सकती।