आखिर क्योंः सोशल मीडिया कंटेंट ब्लॉकिंग पर घिरी मोदी सरकार! 5 महीनों में 1.95 लाख ब्लॉकिंग ऑर्डर भेजने का दावा, सवाल- तो क्या Gen Z आंदोलन के दौरान बढ़े ब्लॉकिंग ऑर्डर?
नई दिल्ली। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कंटेंट हटाने और ब्लॉकिंग को लेकर केंद्र सरकार एक बार फिर विपक्ष के निशाने पर है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मार्च से जुलाई 2026 के बीच केंद्र सरकार और विभिन्न सरकारी एजेंसियों की ओर से इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब को करीब 1.95 लाख ब्लॉकिंग ऑर्डर भेजे गए। रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर सोशल मीडिया सेंसरशिप बढ़ाने और लोगों की आवाज दबाने का आरोप लगाया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार सवाल पूछने, जवाबदेही तय करने और अपनी जिम्मेदारी निभाने से डर रही है। पार्टी का कहना है कि लोकतांत्रिक देश में सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में कंटेंट ब्लॉक किए जाने की प्रक्रिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करती है। कांग्रेस ने कहा कि जनता सरकार के इस रवैये को याद रखेगी। कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि 2024-25 में जहां 2312 ब्लॉकिंग ऑर्डर जारी किए गए थे, वहीं मार्च से जुलाई 2026 के महज पांच महीनों में यह संख्या बढ़कर करीब 1.95 लाख हो गई। उन्होंने सवाल उठाया कि इनमें आधे से अधिक आदेश इंस्टाग्राम से जुड़े होने का दावा किया जा रहा है, जबकि यह युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है। कांग्रेस ने इसी आधार पर केंद्र सरकार पर Gen Z की आवाज से डरने का आरोप लगाया है।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च से जुलाई 2026 के बीच इंस्टाग्राम को करीब एक लाख ब्लॉकिंग ऑर्डर भेजे गए। वहीं फेसबुक को लगभग 80 हजार और यूट्यूब को करीब 15 हजार आदेश भेजे जाने का दावा किया गया है। इस तरह इन तीन प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भेजे गए आदेशों की कुल संख्या करीब 1.95 लाख बताई गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन आंकड़ों में अचानक हुई बढ़ोतरी ने सोशल मीडिया कंटेंट मॉडरेशन और सरकारी निगरानी को लेकर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट में आरटीआई के जरिए पहले सामने आए रिकॉर्ड का भी हवाला दिया गया है। इसके अनुसार अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच पूरे एक साल में 19 ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को कुल 2312 ब्लॉकिंग ऑर्डर भेजे गए थे। इसके मुकाबले मार्च से जुलाई 2026 के सिर्फ पांच महीनों में तीन प्रमुख प्लेटफॉर्म को करीब 1.95 लाख आदेश भेजे जाने का दावा किया गया है। इस अंतर को लेकर विपक्ष ने सरकार की कंटेंट ब्लॉकिंग नीति पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों और उनकी तुलना को लेकर सरकार की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसलिए इन आंकड़ों के आधार और प्रत्येक आदेश की प्रकृति को लेकर अंतिम तस्वीर सरकारी स्पष्टीकरण के बाद ही स्पष्ट होगी।
छात्र आंदोलन के दौरान बढ़े ब्लॉकिंग ऑर्डर?
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इसी अवधि में दिल्ली के जंतर-मंतर पर परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का आंदोलन चल रहा था। रिपोर्ट ने एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के हवाले से दावा किया है कि बड़ी संख्या में ब्लॉकिंग ऑर्डर इसी दौरान जारी हुए, खासकर इंस्टाग्राम पर मौजूद सामग्री के संबंध में। सोशल मीडिया यूजर्स की शिकायतों के आधार पर रिपोर्ट में दावा किया गया कि हटाई गई सामग्री में छात्र आंदोलन के समर्थन वाले पोस्ट, सरकार की इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति की आलोचना, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से जुड़ी सामग्री, डीपफेक और अन्य विवादित पोस्ट शामिल थे। हालांकि सरकार ने आधिकारिक तौर पर यह स्पष्ट नहीं किया है कि किन पोस्ट या किस तरह की सामग्री के खिलाफ कार्रवाई की गई थी। यही वजह है कि कंटेंट हटाने की प्रक्रिया, उसके आधार और सरकारी आदेशों की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
'सहयोग' पोर्टल से भेजे जाते हैं सरकारी निर्देश
रिपोर्ट के अनुसार, गृह मंत्रालय का 'सहयोग' पोर्टल विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों को सोशल मीडिया कंपनियों को कंटेंट ब्लॉक करने या हटाने के निर्देश भेजने की सुविधा देता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सरकार की ओर से तय दो से तीन घंटे की समय-सीमा में कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए मेटा ने अपने सिस्टम को गृह मंत्रालय के 'सहयोग' पोर्टल से जोड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, इस व्यवस्था के तहत पोर्टल के जरिए आने वाले सरकारी निर्देशों पर संबंधित कंटेंट को अलग से मानवीय समीक्षा के बिना स्वतः हटाए जाने की व्यवस्था हो सकती है। इस व्यवस्था को लेकर डिजिटल अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने भी सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि यदि सरकारी निर्देशों के आधार पर कंटेंट तेजी से हटाया जाता है, तो सोशल मीडिया कंपनियों के पास उन आदेशों की वैधता और उचित प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच करने का समय और अवसर सीमित हो सकता है।
IT Act की धाराओं के तहत कंटेंट ब्लॉक करने का प्रावधान
रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी एजेंसियां सोशल मीडिया कंपनियों को कंटेंट हटाने या ब्लॉक करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की विभिन्न धाराओं के तहत निर्देश जारी कर सकती हैं। इनमें धारा 79(3)(b) का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा धारा 69A के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता, सार्वजनिक व्यवस्था समेत कानून में निर्धारित आधारों पर ऑनलाइन कंटेंट को ब्लॉक करने का प्रावधान है। यानी कंटेंट ब्लॉक करने की सरकारी प्रक्रिया पूरी तरह नई नहीं है, लेकिन मार्च से जुलाई 2026 के दौरान आदेशों की संख्या में कथित तेज वृद्धि ने इसके पैमाने और पारदर्शिता पर नई बहस खड़ी कर दी है।