प्रधानमंत्री मोदी की 'गोल्ड अपील' का बड़ा असर: दिल्ली के सराफा बाजारों में छाई मायूसी, खरीदारी में भारी गिरावट
नई दिल्ली। देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई एक अपील ने देश के स्वर्ण बाजार की चूलें हिला दी हैं। प्रधानमंत्री की 'एक साल तक सोना न खरीदने' की सलाह का असर अब जमीन पर दिखने लगा है। देश की राजधानी दिल्ली के सबसे व्यस्त और प्रतिष्ठित सराफा बाजारों चांदनी चौक, कूचा महाजनी और करोल बाग में पिछले दो दिनों से ग्राहकों की आवाजाही में भारी कमी दर्ज की गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में देशवासियों से आग्रह किया था कि वे राष्ट्रीय हित में कम से कम एक वर्ष तक सोने के गहनों की खरीदारी से बचें। इस अपील का मनोवैज्ञानिक असर इतना गहरा हुआ है कि शादी-ब्याह के सीजन के बावजूद ग्राहकों ने बाजारों से दूरी बना ली है।
दिल्ली के ज्वैलरी कारोबारियों के अनुसार, जो ग्राहक आने वाले पारिवारिक समारोहों के लिए एडवांस बुकिंग कराने वाले थे, उन्होंने फिलहाल अपनी योजना टाल दी है। बाजारों में एक अजीब सी 'असमंजस' की स्थिति है। ग्राहकों को लग रहा है कि यदि मांग में इसी तरह गिरावट रही, तो भविष्य में सोने की कीमतों में और बड़ी कमी आ सकती है, जिससे उन्हें फायदा होगा। बाजार में आई इस अचानक सुस्ती ने छोटे और बड़े दोनों तरह के व्यापारियों की चिंता बढ़ा दी है। कई आभूषण विक्रेताओं का कहना है कि ग्राहकों के मन में एक प्रकार का 'डर' बैठ गया है। हालत यह है कि जो लोग मासिक किस्तों के जरिए निवेश कर रहे थे, वे भी अब अगली किस्त जमा करने से कतरा रहे हैं। व्यापारियों का तर्क है कि सोने की कीमतों में पिछले साल दिवाली से मार्च तक जो तेजी थी, उसमें पहले ही 25 प्रतिशत तक की नरमी आ चुकी है। ऐसे में कीमतों में और बड़ी गिरावट की संभावना कम है। लेकिन प्रधानमंत्री की अपील के बाद बाजार में जो अनिश्चितता बढ़ी है, उसका सीधा असर छोटे सुनारों के चूल्हे पर पड़ रहा है। सराफा बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में खेती का सीजन भी बाजार की सुस्ती का एक कारण है। आमतौर पर होली से लेकर मानसून आने तक किसान खेती के कामों में व्यस्त रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सोने की असली मांग फसल कटने और बिकने के बाद आती है। व्यापारियों को उम्मीद थी कि इस बार अच्छी फसल के बाद मांग बढ़ेगी, लेकिन प्रधानमंत्री के संबोधन ने बाजार के समीकरण बदल दिए हैं। भारत में सोने की खपत और आयात के आंकड़े चौंकाने वाले हैं, जो प्रधानमंत्री की चिंता को जायज ठहराते हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (IIM) के 'इंडिया गोल्ड पॉलिसी सेंटर' की प्रमुख प्रोफेसर सुंदरावल्ली के अनुसार भारत हर साल लगभग 600 से 700 टन सोने का आयात करता है, जबकि हमारा घरेलू उत्पादन मात्र 1 से 2 टन ही है। चूंकि हम अपनी जरूरत का लगभग पूरा सोना बाहर से खरीदते हैं, इसलिए हमें डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार कम होता है और रुपया कमजोर होता है। अनुमान है कि भारतीय परिवारों के पास लगभग 25,000 से 27,000 टन सोना पहले से ही जमा है, जो दुनिया में सबसे अधिक है। प्रो. सुंदरावल्ली का मानना है कि यदि लोग एक साल तक खरीदारी रोक देते हैं, तो इससे डॉलर की मांग घटेगी और भारतीय रुपया वैश्विक बाजार में अधिक मजबूत होकर उभरेगा। बाजार में मिले कुछ ग्राहकों ने मिश्रित प्रतिक्रिया दी। करोल बाग में मिले एक ग्राहक ने कहा, "प्रधानमंत्री ने देशहित में अपील की है, तो हम इसका समर्थन करेंगे। हम केवल उतनी ही खरीदारी करेंगे जितनी अत्यंत आवश्यक है।" वहीं, कुछ मध्यमवर्गीय परिवारों का मानना है कि शादियों के लिए सोना खरीदना एक सामाजिक जरूरत है, जिसे पूरी तरह बंद करना मुश्किल है, लेकिन वे अब भारी गहनों के बजाय हल्के वजन के आभूषणों पर विचार कर रहे हैं। फिलहाल, दिल्ली का सराफा बाजार 'इंतजार करो और देखो' की नीति पर चल रहा है। व्यापारियों को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में स्थिति सामान्य होगी, लेकिन प्रधानमंत्री की इस अपील ने निवेश के नजरिए से सोने की चमक को फिलहाल तो फीका कर ही दिया है। अब देखना यह होगा कि यह सुस्ती केवल एक तात्कालिक प्रतिक्रिया है या आने वाले महीनों में भारतीय स्वर्ण उद्योग के स्वरूप को पूरी तरह बदल देगी।