Sep 04, 2026 Login

समीक्षाः ‘हनुमान अंश’ में दिखी नीब करौरी बाबा की अद्भुत आध्यात्मिक यात्रा! चमत्कारों से आगे बढ़कर भक्ति, करुणा और मानव सेवा का संदेश देती है फिल्म

Review: ‘Hanuman Ansh’ reveals the extraordinary spiritual journey of Neem Karoli Baba! Going beyond miracles, the film conveys a message of devotion, compassion, and service to humanity.

यूं तो भारतीय सिनेमा में संतों और आध्यात्मिक व्यक्तित्वों पर फिल्में बनती रही हैं, लेकिन अक्सर ऐसी फिल्मों के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है कि आध्यात्मिक जीवन और उसके अनुभवों को पर्दे पर इस तरह पेश किया जाए कि कहानी उपदेश न लगे और दर्शक उससे भावनात्मक रूप से जुड़ सके। निर्देशक विशाल चतुर्वेदी की फिल्म ‘हनुमान अंश’ इसी चुनौती को काफी हद तक पार करती नजर आती है। नीब करौरी बाबा के जीवन, उनकी आध्यात्मिक यात्रा, भक्ति, करुणा और निस्वार्थ सेवा के दर्शन से प्रेरित यह फिल्म सिर्फ एक संत की जीवनी बताने की कोशिश नहीं करती, बल्कि यह सवाल भी सामने रखती है कि आखिर इंसान ईश्वर को कहां खोजे, मंदिरों और जंगलों में या फिर जरूरतमंद इंसान की सेवा में। फिल्म की खासियत यह है कि यह बाबा से जुड़े चमत्कारों को कहानी का केंद्र नहीं बनाती। इसके बजाय उनकी जीवन यात्रा के जरिए यह बताने का प्रयास करती है कि अध्यात्म का अंतिम पड़ाव मानव सेवा और प्रेम हो सकता है। यही वजह है कि फिल्म भव्यता के बजाय अपने भावनात्मक और आध्यात्मिक प्रसंगों से प्रभाव छोड़ती है। फिल्म की शुरुआत भोसले नाम के किरदार से होती है, जिसकी भूमिका चंदन आनंद ने निभाई है। वह अपने पोते को नीब करौरी बाबा से जुड़ी अपनी पहली मुलाकात का किस्सा सुनाते हैं। कहानी 1942 के उस दौर में पहुंचती है, जब देश अंग्रेजी हुकूमत के अधीन था और स्वतंत्रता आंदोलन अपने उफान पर था। भोसले तब क्रांतिकारी हुआ करते थे और पुलिस से बचने के दौरान उनकी मुलाकात बाबा से होती है। यहीं से फिल्म धीरे-धीरे बाबा की जीवन यात्रा की ओर बढ़ती है। कहानी का केंद्र बनता है 12 वर्षीय लक्ष्मी नारायण, जो अपनी मां की मृत्यु के बाद भीतर से पूरी तरह टूट जाता है। मां को दोबारा पाने और ईश्वर को खोजने की उम्मीद में वह अपना घर छोड़ देता है। इसके बाद शुरू होती है एक ऐसी यात्रा, जिसमें मंदिर हैं, जंगल हैं, नदियां हैं, गांव हैं और लगातार चलती एक आध्यात्मिक तलाश है। लेकिन जैसे-जैसे लक्ष्मी नारायण आगे बढ़ते हैं, उनकी तलाश का अर्थ भी बदलता जाता है।

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष यही है कि लक्ष्मी नारायण की यात्रा सिर्फ ईश्वर को खोजने की कहानी नहीं रह जाती। धीरे-धीरे उन्हें समझ आता है कि अध्यात्म केवल संसार से दूरी बनाने का नाम नहीं है। भूखे को भोजन कराना, जरूरतमंद की सहायता करना, लोगों के साथ बिना भेदभाव प्रेम करना और निस्वार्थ भाव से सेवा करना उनके जीवन का हिस्सा बनने लगता है। यही वह मोड़ है जहां फिल्म की कहानी व्यक्तिगत दुख से निकलकर व्यापक मानवीय संवेदना की कहानी बन जाती है। बाबा के जीवन से जुड़े कई प्रचलित प्रसंगों को भी फिल्म में जगह दी गई है। बाल्यकाल में उनका पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों के प्रति लगाव, मठ की जिम्मेदारी स्वीकार न कर आगे बढ़ जाना, अंग्रेज अफसर द्वारा उन्हें ट्रेन से उतार दिया जाना और बाद में उसी घटना को लेकर अफसर का क्षमा मांगना जैसे प्रसंग कथा को रोचक बनाते हैं। लेखक और निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने बाबा की कहानी को जरूरत से ज्यादा भारी बनाने के बजाय सहज रखने की कोशिश की है। यही फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। निर्देशक ने बाबा की हनुमान भक्ति को कहानी की भावभूमि बनाया है। रिसर्च के दौरान नीब करौरी गांव में मिले लोगों से मिली जानकारी और बाबा को ‘आंशिक हनुमान’ अवतार के रूप में मानने की लोकधारणा से ‘हनुमान अंश’ की अवधारणा को आधार मिला। फिल्म में आध्यात्मिकता को बड़े-बड़े संवादों के बजाय घटनाओं और भावनाओं के माध्यम से समझाने की कोशिश की गई है। कई जगह यह तरीका प्रभावी भी साबित होता है।

स्क्रीनप्ले में भावनाओं की पकड़ मजबूत
‘हनुमान अंश’ का स्क्रीनप्ले उन प्रसंगों में ज्यादा प्रभावी नजर आता है, जहां बाबा के व्यक्तित्व और उनके भीतर हो रहे बदलाव को घटनाओं के जरिए दिखाया गया है। मां को खोने के बाद एक बच्चे की पीड़ा से शुरू हुई यात्रा जब मानव सेवा तक पहुंचती है, तो दर्शक बाबा के व्यक्तित्व को केवल एक चमत्कारी संत के रूप में नहीं बल्कि एक संवेदनशील और करुणामय व्यक्ति के रूप में देखना शुरू करता है। फिल्म का यह दृष्टिकोण खासा महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि कहानी केवल चमत्कारों पर निर्भर होती तो इसका भावनात्मक असर सीमित हो सकता था। लेकिन यहां चमत्कारों के साथ सेवा और करुणा को बराबर महत्व दिया गया है। फिल्म का भक्तिमय गीत-संगीत इसके वातावरण को और मजबूत करता है। भक्ति से जुड़े गीत कहानी की गति के साथ चलते हुए दर्शक को फिल्म की आध्यात्मिक दुनिया में ले जाने का काम करते हैं। अच्छी बात यह है कि संगीत कहानी पर हावी नहीं होता। बल्कि कई जगह वह दृश्य के भाव को गहरा करता है। फिल्म देखने के दौरान इसका आध्यात्मिक माहौल लगातार बना रहता है।

कलाकारों ने संभाली कहानी की जिम्मेदारी
नीब करौली बाबा की भूमिका में शोभिनव डब्‍लू सत्या का अभिनय फिल्म की प्रमुख उपलब्धियों में शामिल है। उन्होंने बाबा के बेफिक्र स्वभाव, हठ, सहजता और भक्ति भाव को अपने अभिनय में उतारने का प्रयास किया है। बाल कलाकार विहान एस हेगड़े भी लक्ष्मी नारायण के किरदार में प्रभाव छोड़ते हैं। विशेषकर मां की मृत्यु के बाद उनके किरदार में दिखाई गई भावनात्मक टूटन और उसके बाद शुरू होने वाली आध्यात्मिक तलाश कहानी को आगे बढ़ाती है। बाबा की पत्नी की भूमिका में पूर्णिमा तिवारी का काम भी प्रभावी है। वहीं सीमित स्क्रीन टाइम में महंत के किरदार में अनिल रस्तोगी अपनी छाप छोड़ते हैं।

बॉक्स ऑफिस पर भी दिखा ‘हनुमान अंश’ का असर
फिल्म की चर्चा केवल कहानी और अभिनय तक सीमित नहीं है। बॉक्स ऑफिस पर भी इसकी यात्रा खासा दिलचस्प रही है। आंकड़ों के मुताबिक, फिल्म ने शुरुआत में बेहद धीमी रफ्तार पकड़ी। शुरुआती दौर में इसकी कमाई लाखों में रही और इसे सीमित संख्या में शो मिले। कुछ समय बाद इसके शो घटकर 30 से 60-65 के आसपास तक पहुंच गए और कमाई भी कुछ लाख रुपये प्रतिदिन तक सिमट गई। लेकिन इसके बाद फिल्म ने अचानक रफ्तार पकड़नी शुरू की। Sacnilk के आंकड़ों के हवाले से दिए गए विवरण के अनुसार, फिल्म ने 22वें दिन करीब 6.25 करोड़ रुपये की कमाई की, जबकि 25वें दिन यह आंकड़ा 12.75 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसके बाद भी फिल्म की कमाई करोड़ों में बनी रही। करीब 2 करोड़ रुपये के बजट वाली फिल्म के लिए यह प्रदर्शन असाधारण माना जा सकता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक फिल्म करीब 61.38 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर चुकी थी और बुधवार को इसे 7,037 शो मिले, जिनसे भारत में करीब 72.32 करोड़ रुपये का ग्रॉस कलेक्शन बताया गया। यानी जिस फिल्म को शुरुआती दिनों में सीमित दर्शक और कम शो मिले, उसने बाद के दिनों में जिस तरह की छलांग लगाई, वह अपने आप में फिल्म की चर्चा और दर्शकों के बीच बने वर्ड ऑफ माउथ की ओर इशारा करती है।

चमत्कार से ज्यादा इंसानियत की फिल्म
‘हनुमान अंश’ को सिर्फ बाबा नीम करौली के जीवन पर बनी बायोपिक कह देना इसके दायरे को सीमित कर देगा। यह फिल्म दुख, तलाश, अध्यात्म और सेवा के बीच संबंध स्थापित करने का प्रयास करती है। एक बच्चा मां को खोता है और ईश्वर को खोजने निकलता है। लेकिन उसकी यात्रा उसे वहां पहुंचाती है जहां ईश्वर की तलाश मानवता की सेवा में बदल जाती है। यही फिल्म का सबसे बड़ा संदेश है। फिल्म यह बताने की कोशिश करती है कि किसी संत का प्रभाव केवल उनके चमत्कारों से नहीं बल्कि उनके विचारों और उनके कर्मों से तय होता है। भूखे को भोजन देना, जरूरतमंद के प्रति करुणा रखना और बिना भेदभाव प्रेम करना—फिल्म इन मूल्यों को बाबा के व्यक्तित्व का केंद्रीय हिस्सा बनाकर पेश करती है।

चमत्कार नहीं, मानव सेवा और अध्यात्म की कहानी
कुल मिलाकर ‘हनुमान अंश’ एक ऐसी आध्यात्मिक फिल्म है जो चमत्कार दिखाने से ज्यादा एक संत के विचारों और मानव सेवा के दर्शन को समझाने की कोशिश करती है। फिल्म की गति कुछ जगह धीमी पड़ती है और कुछ प्रसंगों को और बेहतर तरीके से विकसित किया जा सकता था, लेकिन भावनात्मक कहानी, कलाकारों का अभिनय, भक्तिमय संगीत और सहज निर्देशन इसकी कमियों पर काफी हद तक भारी पड़ते हैं। नीम करौली बाबा के जीवन और उनके विचारों को करीब से जानने की इच्छा रखने वाले दर्शकों के लिए यह फिल्म एक सराहनीय प्रयास है। खासकर उन दर्शकों के लिए, जो संतों की कहानियों में केवल चमत्कार नहीं बल्कि उनके जीवन-दर्शन और समाज के प्रति उनके योगदान को देखना चाहते हैं, ‘हनुमान अंश’ एक सार्थक सिनेमाई अनुभव साबित हो सकती है।

दृष्टिबाधित सिंगर सुनील लोधी की आवाज ने जीता दिल
फिल्म ‘हनुमान अंश’ में गायक सुनील लोधी की आवाज में गाया गया बुंदेली भजन ‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, सागर में नैया डाल दई’ लोगों की जुबान पर चढ़ गया है। जन्म से दृष्टिबाधित सुनील बेहद साधारण परिवार से आते हैं। उनके पिता के पास करीब एक एकड़ जमीन है और चार भाई-बहनों में सुनील सबसे बड़े हैं। उन्होंने बचपन से ही भजन गायन को अपना सहारा बनाया और शुरुआत गांव में कार्यक्रमों से की। बाद में ट्रेनों में गाकर भी उन्होंने अपनी प्रतिभा को लोगों तक पहुंचाया। सुनील का हनुमान भजन ‘मोरे संकट के कटैया’ सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो उनकी आवाज ने संगीत से जुड़े लोगों का ध्यान खींचा। सागर के अंकित पांडे और इंदौर के पंकज पीवीआर की मदद से उनके गाने प्रॉपर रिकॉर्डिंग के साथ सामने आए। इसके बाद सुनील मुंबई के ओम साईं राम स्टूडियो पहुंचे। सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीर देखने के बाद निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने उनसे संपर्क किया और उन्हें ‘हनुमान अंश’ में बुंदेली भजन गाने का मौका मिला। अब फिल्म के भजन की सफलता के बाद सुनील को बॉलीवुड से नए ऑफर मिल रहे हैं और उनके कई शो भी बुक हो चुके हैं। कभी ट्रेनों में गाने वाले सुनील आज प्रशंसकों के साथ सेल्फी लेते नजर आ रहे हैं। उनकी कहानी मेहनत, प्रतिभा और हौसले की मिसाल बन गई है।