असम में भाजपा की ऐतिहासिक हैट्रिक तय! शुरुआती रुझानों में एनडीए बहुमत के पार, कांग्रेस फिर पिछड़ी
गुवाहाटी। असम की राजनीति में एक बार फिर 'केसरिया' लहर ने विपक्ष के किलों को ध्वस्त कर दिया है। विधानसभा चुनाव 2026 के शुरुआती रुझानों और नतीजों ने साफ कर दिया है कि असम की जनता ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के विकास और आक्रामक राजनीति के मॉडल पर अपनी मुहर लगा दी है। 126 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा नीत एनडीए ने बहुमत के जादुई आंकड़े को न केवल पार किया, बल्कि 95 सीटों पर अपनी बढ़त और जीत सुनिश्चित कर राज्य में सत्ता की शानदार हैट्रिक लगाई है। मतगणना के शुरुआती घंटों से ही भाजपा और उसके सहयोगियों असम गण परिषद और यूपीपीएल ने बढ़त बना ली थी। ताजा आंकड़ों के अनुसार, एनडीए जहाँ 95 सीटों पर काबिज दिख रहा है, वहीं कांग्रेस नीत गठबंधन मात्र 28 सीटों पर सिमटता नजर आ रहा है। यह परिणाम न केवल हिमंत बिस्वा सरमा के बढ़ते कद को दर्शाता है, बल्कि पूर्वोत्तर में कांग्रेस की वापसी की उम्मीदों को भी बड़ा झटका देता है।
राजनीतिक दृष्टि से सबसे हॉट सीट मानी जाने वाली जालुकबारी से मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भारी मतों से आगे चल रहे हैं। वहीं, कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे और बदलाव की उम्मीद बनकर उभरे गौरव गोगोई जोरहाट सीट पर अपनी बढ़त बनाए हुए हैं, लेकिन उनकी व्यक्तिगत जीत कांग्रेस के सामूहिक पतन को रोकने में नाकाम रही है। चुनाव पूर्व पवन खेड़ा और हिमंत बिस्वा सरमा के बीच हुआ जुबानी जंग और विवाद कांग्रेस के लिए चुनावी मुद्दा नहीं बन सका। कांग्रेस ने जिस ध्रुवीकरण और विवाद को भुनाने की कोशिश की थी, जनता ने उसे सिरे से खारिज कर दिया। विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का गठबंधन (रायजोर दल और एजेपी के साथ) भाजपा के संगठनात्मक ढांचे और जमीनी पकड़ के सामने टिक नहीं पाया। इसके अलावा, बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ के अकेले चुनाव लड़ने से भी विपक्षी वोटों का बिखराव हुआ, जिसका सीधा फायदा भाजपा को दिसपुर और शिबसागर जैसी सीटों पर मिला। असम में इस बार रिकॉर्ड 85.96% मतदान हुआ था, जिसने स्पष्ट कर दिया था कि जनता बदलाव या स्थिरता के लिए बड़े पैमाने पर बाहर निकली है। भाजपा की जीत के पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। 2023 में हुए परिसीमन ने कई सीटों के समीकरण भाजपा के पक्ष में कर दिए। बांग्लादेशी घुसपैठ, सीएए और एनआरसी जैसे मुद्दों पर भाजपा का कड़ा रुख मतदाताओं को भाया। ब्रह्मपुत्र की बाढ़ के स्थाई समाधान के वादे और बुनियादी ढांचे के विकास ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभाव डाला। बेरोजगारी के खिलाफ सरकारी कदमों और कल्याणकारी योजनाओं ने भाजपा के पक्ष में 'साइलेंट वोटर' तैयार किए। क्षेत्रीय दलों के साथ भाजपा का तालमेल कांग्रेस के गठबंधन से कहीं अधिक प्रभावी साबित हुआ। यदि रुझान अंतिम परिणामों में तब्दील होते हैं, तो यह असम के इतिहास में पहली बार होगा कि कोई गैर-कांग्रेसी सरकार लगातार तीसरी बार सत्ता में आएगी। यह जीत न केवल हिमंत बिस्वा सरमा को पूर्वोत्तर का निर्विवाद नेता बनाएगी, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए भी भाजपा की राह आसान कर देगी।