जवानी में पास किया था एग्जाम, बुढ़ापे में उम्र निकल जाने पर मिला नियुक्ति पत्र! सरकारी तंत्र की सुस्ती ने छीन लिया एक उम्मीदवार का सपना
केरल। भारत में सरकारी नौकरी लाखों युवाओं का सपना होती है। लोग वर्षों तक मेहनत करते हैं, प्रतियोगी परीक्षाएं पास करते हैं और नियुक्ति की उम्मीद में इंतजार करते हैं। लेकिन यदि किसी उम्मीदवार को नौकरी का नियुक्ति पत्र ही तब मिले, जब वह सेवा में शामिल होने की उम्र पार कर चुका हो, तो यह केवल एक व्यक्ति की विडंबना नहीं बल्कि व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। केरल के मलप्पुरम जिले के कलिकवु निवासी अब्दुल मजीद के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। उन्होंने वर्ष 2005 में केरल लोक सेवा आयोग (PSC) की परीक्षा पास की थी। पार्ट-टाइम जूनियर अरबी शिक्षक पद के लिए आयोजित भर्ती में उनका नाम मेरिट सूची में शामिल हुआ। परिवार और समाज में खुशी का माहौल था, लेकिन नौकरी की प्रतीक्षा वर्षों तक खत्म नहीं हुई।
रैंक सूची की वैधता 2008 में समाप्त हो गई और अन्य उम्मीदवारों की तरह मजीद ने भी यह मान लिया कि अब सरकारी नौकरी का सपना अधूरा ही रह जाएगा। उन्होंने जीवन में आगे बढ़ने का फैसला कर लिया। लेकिन करीब दो दशक बाद ऐसा मोड़ आया जिसने सबको हैरान कर दिया। अप्रैल 2026 में केरल लोक सेवा आयोग ने उसी भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा एक एडवाइस मेमो जारी कर दिया। यानी जिस भर्ती प्रक्रिया की रैंक सूची 18 वर्ष पहले समाप्त हो चुकी थी, उससे संबंधित नियुक्ति का पत्र अब्दुल मजीद तक पहुंचा। तब तक परीक्षा दिए हुए 21 वर्ष बीत चुके थे। विडंबना यह रही कि जब यह पत्र उनके हाथ में पहुंचा, तब तक वह सरकारी सेवा में प्रवेश की अधिकतम आयु सीमा पार कर चुके थे। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 27 मई 2026 को उनकी आयु 60 वर्ष हो गई, जिसके बाद वह कानूनी रूप से नौकरी जॉइन करने के पात्र नहीं रहे।
यह मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि रिक्त पद वर्षों तक खाली पड़ा था तो उसे भरने की प्रक्रिया समय रहते क्यों पूरी नहीं की गई? यदि उम्मीदवार का चयन योग्य पाया गया था तो उसे नियुक्ति के लिए दो दशक तक क्यों इंतजार करना पड़ा? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या किसी प्रशासनिक चूक या सुस्त व्यवस्था की कीमत एक उम्मीदवार को अपने पूरे करियर के सपने से हाथ धोकर चुकानी चाहिए? मजीद का कहना है कि उनके स्कूल रिकॉर्ड में जन्म वर्ष 1966 दर्ज है जबकि वास्तविक जन्म वर्ष 1967 है। उनका दावा है कि रिकॉर्ड में सुधार होने पर वह अभी भी सेवा के लिए पात्र हो सकते हैं। इसी उम्मीद में उन्होंने राज्य के शिक्षा मंत्री और संबंधित अधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग की है। फिलहाल यह मामला केवल एक नियुक्ति पत्र के विलंब का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की कार्यशैली का प्रतीक बन गया है जिसमें कभी-कभी फाइलें इतनी देर से चलती हैं कि अवसर तो पहुंचता है, लेकिन उसके उपयोग का समय बीत चुका होता है।