कच्छ के रण में जब 150 जांबाजों ने झुकाया पाक सेना का सिर: 3500 सैनिकों वाली ब्रिगेड को चटाई धूल,आज सीआरपीएफ मना रहा 'शौर्य दिवस'

When 150 Valiant Soldiers Humbled the Pakistani Army in the Rann of Kutch: A Brigade of 3,500 Troops Was Routed—Today, the CRPF Observes 'Shaurya Diwas' (Valour Day).

नई दिल्ली। 9 अप्रैल 1965 का दिन भारतीय अर्धसैनिक बलों के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उस दिन गुजरात के रण ऑफ कच्छ में स्थित सरदार पोस्ट और टाक पोस्ट पर पाकिस्तानी सेना की पूरी 51वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड ने हमला बोल दिया। लगभग 3500 पाकिस्तानी सैनिकों से लैस इस ब्रिगेड में आर्टिलरी और भारी हथियार थे, लेकिन भारतीय सीमा की रक्षा कर रहे केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ)  की महज दो कंपनियों (करीब 150 जवान) ने अदम्य साहस और रणकौशल से दुश्मन को करारी शिकस्त दी।

पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन डेजर्ट हॉक’ के तहत यह हमला किया था। उनका मकसद भारतीय भू-भाग पर कब्जा करना था। 9 अप्रैल की सुबह करीब 3 बजे पाकिस्तानी ब्रिगेड ने सरदार पोस्ट और टाक पोस्ट पर तीन बार हमले किए। 14 घंटे से अधिक समय तक चले इस भीषण संघर्ष में सीआरपीएफ के जवानों ने सामान्य हथियारों से लड़ते हुए पाकिस्तानी सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। इस लड़ाई में पाकिस्तान के 34 सैनिक मारे गए, जिनमें दो अफसर भी शामिल थे। चार पाक सैनिकों को जिंदा गिरफ्तार कर लिया गया। सीआरपीएफ की दूसरी बटालियन की इन दो कंपनियों ने न सिर्फ अपनी पोस्ट बचाई, बल्कि दुश्मन की पूरी ब्रिगेड को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। यह विश्व युद्ध इतिहास में दुर्लभ उदाहरण है, जिसमें पुलिस बल की छोटी सी टुकड़ी ने दुश्मन की नियमित सेना की पूरी ब्रिगेड को घुटने टेकने पर विवश कर दिया। इस युद्ध में सीआरपीएफ के सात जवान शहीद हो गए, जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। उस समय बीएसएफ की स्थापना नहीं हुई थी। रण ऑफ कच्छ की सीमा की सुरक्षा CRPF और गुजरात राज्य पुलिस के जिम्मे थी। पाकिस्तानी सेना के पास तोपखाना और आधुनिक हथियार थे, जबकि सीआरपीएफ के जवानों के पास बुनियादी हथियार। फिर भी उन्होंने रणनीतिक कौशल, साहस और अटूट इच्छाशक्ति से दुश्मन के मंसूबों को नाकाम कर दिया। दुनिया हैरान रह गई कि अर्धसैनिक बल के जवान इतनी बड़ी ताकत का सामना कैसे कर सके। इस अद्वितीय बहादुरी को याद रखने के लिए हर साल 9 अप्रैल को सीआरपीएफ शौर्य दिवस मनाया जाता है। इस दिन पूरे देश में सीआरपीएफ के शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है और उनके शौर्य की गाथा सुनाई जाती है। यह दिन न सिर्फ सीआरपीएफ बल्कि समूचे देश के लिए गर्व का प्रतीक है। सीआरपीएफ आज देश का सबसे बड़ा केंद्रीय अर्धसैनिक बल है। 1965 की इस लड़ाई ने साबित कर दिया कि हथियारों से ज्यादा महत्वपूर्ण जज्बा, अनुशासन और देशभक्ति होती है। सरदार पोस्ट की लड़ाई ने बाद में बीएसएफ जैसी विशेष सीमा सुरक्षा बल की नींव रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज जब देश सुरक्षा की चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब सरदार पोस्ट के उन 150 जांबाजों की कहानी नई पीढ़ी को प्रेरणा देती है। उन्होंने दिखाया कि संख्या में कम होने पर भी सही मकसद और साहस के साथ कोई भी लड़ाई जीती जा सकती है। सीआरपीएफ के महानिदेशक और बल के अधिकारी हर साल इस दिन विशेष कार्यक्रम आयोजित करते हैं। शहीदों के परिवारों को सम्मानित किया जाता है। यह शौर्य दिवस हमें याद दिलाता है कि हमारी सीमाओं की रक्षा में अर्धसैनिक बल कितना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।