उत्तराखंड:बड़ी खबर!उत्तराखंड में मुस्लिम महिलाओं के आने वाले हैं अच्छे दिन!UCC के तहत मुस्लिम महिलाओं को भी पैतृक संपत्ति में समान अधिकार देने जा रही है धामी सरकार!बहु विवाह पर लग सकता है बैन!
उत्तराखंड में UCC यानी समान नागरिक संहिता लागू होने पर मुस्लिम महिलाओं के लिए अच्छे दिन आ सकते हैं,क्योंकि उन्हें पैतृक संपत्ति में बराबर का अधिकार मिल सकता है। जी हां धामी सरकार अगर ऐसा कर देती है तो मुस्लिम महिलाओं को उनका हक दिलवाने में बीजेपी की एक और जीत मानी जाएगी।
दरअसल उत्तराखंड में सभी धर्मों में महिलाओं के लिए पैतृक संपत्ति का अधिकार दिए जाने पर गंभीरता से विचार हो रहा है। समान नागरिक संहिता (यूसीसी) बनाने के लिए गठित विशेषज्ञ समिति इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रही है। मुस्लिम पर्सनल लॉ में मुस्लिम महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबरी का अधिकार नहीं दिया गया है।
विशेषज्ञ समिति लैंगिक समानता के आधार पर महिलाओं को मुख्य रूप से केंद्र में रखकर रिपोर्ट तैयार कर रही है, इसलिए यह माना जा रहा है कि राज्य की मुस्लिम महिलाओं को भी पैतृक संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिल सकता है। हालांकि इस मसले को लेकर पेच भी फंसने से भी इन्कार नहीं किया जा सकता।
वर्ष 2005 से पहले हिंदू महिलाओं को माता-पिता की संपत्ति में कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। उन्हें यह अधिकार वर्ष 2005 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मिला। अब वे पैतृक संपत्ति पर पुरुषों के समान अधिकार रखती हैं। लेकिन मुस्लिम महिलाओं के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ है जिसमें उन्हें पैतृक संपत्ति में बराबरी का अधिकार नहीं है। लेकिन राज्य में यदि सभी महिलाओं को संपत्ति में अधिकार की विधिक व्यवस्था होगी, तो इसके दायरे में मुस्लिम महिलाएं भी आएंगी।
बहरहाल, समान नागरिक संहिता पर काम कर रही विशेषज्ञ समिति अब ड्राफ्ट तैयार करने के निर्णायक मोड पर है। समिति के सदस्य व पूर्व मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह कहते हैं, समिति गठन के समय ही साफ कर चुकी है कि वह लैंगिंक समानता के आधार पर काम करेगी, जिसमें महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने की बात शामिल है।
यूसीसी के लिए गठित विशेषज्ञ समिति राज्य में उन अभिभावकों के लिए सामाजिक सुरक्षा पर गहनता से विचार कर रही है, जिन्हें कायदे-कानून में कुछ बदलाव करके राहत दी जा सकती है। सैन्य और अर्द्धसैनिक बहुल राज्य में यह समस्या खासतौर पर उन परिवारों में देखने में आती है, जहां दुर्भाग्य से जवान या अफसर शहीद हो जाते हैं। ऐसे मामलों में मिलने वाला बीमा व अन्य लाभ विधवा पत्नी को मिलते हैं। लेकिन कतिपय मामलों में विधवा पत्नी के पुनर्विवाह कर लेने से माता-पिता वित्तीय सुरक्षा से वंचित हो गए।
रिपोर्ट के अनुसार मुसलमानों में जो कुछ परिस्थितियों में बहुविवाह और बहुपतित्व (polyandry) प्रथा है, उसे नकारे जाने की भी संभावना है। कुछ आदिवासियों में भी ऐसी परंपरा रही हैं। लेकिन,आंकड़ें बताते हैं कि आधुनिक समय में ऐसे मामले कम हो रहे हैं। इसी तरह हिंदू संयुक्त परिवार में पुरुष उत्तराधिकरी के coparcenary अधिकार (जन्म से पैतृक संपत्ति पर अधिकार) को भी अलग रखा जा सकता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह पहले ही तय हो चुका है।
सूत्रों की माने तो इन सभी मसलों पर जनता से भी राय जुटाई गई है और उनके मजबूत समर्थन के बाद ही इसे पैनल अपने ड्राफ्ट में शामिल कर सकता है। जस्टिस (रिटायर्ड) रंजना देसाई की अध्यक्षता वाला पांच-सदस्यीय पैनल अब संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के तहत सबको समान अधिकार देने की ड्राफ्ट योजना को तैयार करने के लिए आखिरी दौर की बैठकें कर रहा है।
इस पैनल के पास निराश्रित माता-पिता के अधिकारों का मामला भी विचाराधीने है। क्योंकि, उत्तराखंड में यह एक बड़ी समस्या है, जो कि सश्स्त्र सेना में योगदान देने वाले अनेकों जवानों का घर है। कई बार होता ये है कि किसी तरह की अनहोनी होने पर सारी सरकारी और बीमा सहायता उनकी पत्नियों को मिल जाता है। कई मामलों में वह विधवाएं दूसरा विवाह कर लेती हैं।
बहरहाल उत्तराखंड में मुस्लिम महिलाओं के फेवर में धामी सरकार का ये निर्णय आने वाले समय मे बीजेपी के लिए शायद पॉजिटिव साबित होगा।