दिल्ली में सीजेपी प्रदर्शन पर उबाल: 7000 से अधिक प्रदर्शनकारी हिरासत में, पुलिसकर्मियों पर हमले के आरोप से बढ़ा विवाद
नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के विरोध में तृणमूल कांग्रेस और अन्य दलों द्वारा किया गया उग्र प्रदर्शन शनिवार को बड़े पैमाने पर राजनीतिक संघर्ष और धरपकड़ का गवाह बना। दिल्ली पुलिस ने कानून-व्यवस्था और निषेधाज्ञा का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों पर सख्त कार्रवाई की, जिसके तहत अब तक 7000 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जा चुका है। प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसक झड़पों और पथराव में कई पुलिसकर्मियों के घायल होने की भी खबर है, जिसके बाद पुलिस अब आरोपियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की तैयारी कर रही है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरोध में राजधानी दिल्ली में हुए प्रदर्शन के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है। प्रदर्शन के दौरान 7,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई है। अधिकारियों के मुताबिक, पुलिसकर्मियों के साथ कथित मारपीट और पथराव की घटनाओं को लेकर प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है। वहीं, तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हिरासत से रिहा होने के बाद दिल्ली की स्थिति पर सवाल उठाते हुए इसे आपातकाल से भी आगे की स्थिति बताया। प्रदर्शन को लेकर विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार की कार्रवाई की आलोचना की है, जबकि पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए थे। मुख्य चुनाव आयुक्त और एसआईआर के विरोध में आयोजित प्रदर्शन के दौरान ममता बनर्जी तथा तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं को हिरासत में लिया गया था। शनिवार को हिरासत से छोड़े जाने के बाद ममता बनर्जी ने अपनी कार्रवाई की तुलना अपहरण जैसी स्थिति से की। उन्होंने कहा कि पहली बार उन्हें जेल वैन में बैठाकर ले जाया गया। उन्होंने दिल्ली के हालात पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि स्थिति आपातकाल से भी आगे निकल गई है। तृणमूल कांग्रेस और उसके समर्थक मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सवाल उठा रहे हैं। विपक्षी दलों की मांग है कि मतदाता सूची में हुए बदलावों से संबंधित आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। इसी मुद्दे पर चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन का आह्वान किया गया था। पुलिस के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने की कार्रवाई के दौरान छह पुलिसकर्मी घायल हुए। इनमें पिंक फोर्स की एक महिला पुलिसकर्मी भी शामिल हैं। महिला पुलिसकर्मी सुमन ने आरोप लगाया कि कनॉट प्लेस स्थित हनुमान मंदिर के पास प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेते समय कुछ महिलाओं ने उनकी उंगली मोड़ दी, जिससे फ्रैक्चर हो गया। वहीं, आकाशवाणी भवन के पास इम्तियाज अली मार्ग पर बैरिकेडिंग गिराने और पुलिस पर पत्थर फेंकने की घटना की जानकारी भी सामने आई है। अधिकारियों के अनुसार, इन घटनाओं की जांच की जा रही है और पुलिसकर्मियों पर कथित हमले के मामले में प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है। हालांकि, घटना से जुड़े आरोपों और जिम्मेदार लोगों की भूमिका की पुष्टि जांच के बाद ही होगी। प्रदर्शन के मद्देनजर दिल्ली पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की थी। पुलिस ने निषेधाज्ञा और कानून-व्यवस्था की स्थिति का हवाला देते हुए प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी। इसके बावजूद बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जुटे, जिसके बाद हिरासत की कार्रवाई की गई। सुरक्षा व्यवस्था के तहत नई दिल्ली जिले को 20 जोन में बांटा गया था। संवेदनशील स्थानों पर पुलिस बल तैनात किया गया और ड्रोन के माध्यम से निगरानी की गई। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कार्रवाई का उद्देश्य राजधानी में शांति बनाए रखना था। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने के तरीके और विरोध प्रदर्शन के अधिकार को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कार्रवाई को लेकर महाराष्ट्र के विपक्षी नेताओं ने केंद्र सरकार की आलोचना की है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की सांसद सुप्रिया सुले, शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत और आदित्य ठाकरे तथा कांग्रेस नेता नाना पटोले ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने पर सवाल उठाए। सुप्रिया सुले ने प्रदर्शन को शांतिपूर्ण बताते हुए सरकार की कार्रवाई की आलोचना की और मतदाता सूची में हुए बदलावों के आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग की। संजय राउत ने इसे जनता का विद्रोह बताते हुए तुषार गांधी को हिरासत में लिए जाने की निंदा की। आदित्य ठाकरे ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि मौजूदा स्थिति को आपातकाल कहने की भी हिम्मत नहीं दिखाई जा रही है। दिल्ली की घटना ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण, चुनावी पारदर्शिता और विरोध प्रदर्शन के अधिकार से जुड़े सवालों को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। एक ओर विपक्षी दल मतदाता सूची में बदलावों का विवरण सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर पुलिस कानून-व्यवस्था और कथित हिंसक घटनाओं को कार्रवाई का आधार बता रही है। अब मामले में पुलिस की जांच, संभावित प्राथमिकी और हिरासत में लिए गए लोगों से जुड़ी आगे की कार्रवाई पर नजर रहेगी। इस पूरे घटनाक्रम में आरोपों की निष्पक्ष जांच और मतदाता सूची से संबंधित सवालों पर पारदर्शी जवाब राजनीतिक विवाद को समझने के लिए महत्वपूर्ण होंगे।