Oct 10, 2026 Login
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फिर कांपी देवभूमि: उत्तराखंड में एक ही दिन में दो बार आए भूकंप के झटके,उत्तरकाशी में 4.2 और बागेश्वर में 2.8 तीव्रता

'Devbhoomi' Trembles Again: Uttarakhand Hit by Two Earthquakes in a Single Day—Magnitude 4.2 in Uttarkashi and 2.8 in Bageshwar.

देहरादून। उत्तराखंड के संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में एक बार फिर भूगर्भीय हलचल तेज हो गई है। राज्य में शनिवार को एक ही दिन में दो बार भूकंप के झटके महसूस किए गए। रात 8:08 बजे उत्तरकाशी जिले में 4.2 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया, जिसने लोगों को दहशत में डाल दिया। इससे ठीक पहले आज दिन में बागेश्वर में भी 2.8 तीव्रता का भूकंप महसूस किया गया था। लगातार आ रहे इन झटकों से राज्य के पहाड़ी और मैदानी इलाकों में भूगर्भीय गतिविधियों को लेकर चिंता गहरा गई है।

हिमालयी राज्य उत्तराखंड में एक ही दिन में दो बार भूकंप के झटके दर्ज किए जाने से लोगों का ध्यान एक बार फिर भूगर्भीय गतिविधियों की ओर गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, रात 8 बजकर 8 मिनट पर उत्तरकाशी में 4.2 तीव्रता का भूकंप आया, जबकि इससे पहले बागेश्वर में 2.8 तीव्रता के झटके दर्ज किए गए। पिछले कुछ दिनों में प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में भूकंप की घटनाएं सामने आने के बीच लोगों में सतर्कता बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है। हालांकि, केवल बार-बार झटके महसूस होने के आधार पर किसी बड़े भूकंप की आशंका जताना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। उत्तराखंड का गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र हिमालयी भूगर्भीय पट्टी का हिस्सा है, जहां भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के बीच लगातार टकराव होता है। इसी प्रक्रिया से पृथ्वी की सतह के नीचे तनाव जमा होता रहता है और समय-समय पर भूकंपीय गतिविधियां सामने आती हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र को भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। इससे पहले 6 अक्टूबर को चमोली जिले में 4.9 तीव्रता का भूकंप दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई थी। राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के मुताबिक, उस समय भूकंप रात 10 बजकर 23 मिनट पर आया था और इसका केंद्र जमीन से करीब 13 किलोमीटर की गहराई पर था। उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने भी भूकंप का समय और केंद्र चमोली जिले में होने की जानकारी दी थी। उस घटना के दौरान उत्तराखंड के कई हिस्सों में झटके महसूस किए जाने की खबरें आई थीं। देहरादून में भी लोगों के घरों से बाहर निकलने की सूचना सामने आई थी। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में भी धरती हिलने का एहसास होने की खबरें थीं। हालांकि, किसी भी भूकंप के प्रभाव का आकलन उसकी तीव्रता के साथ-साथ केंद्र की गहराई, दूरी, स्थानीय भूगर्भीय स्थिति और इमारतों की संरचना पर भी निर्भर करता है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार, भारतीय प्लेट लगातार उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है। इस टकराव के कारण हिमालय क्षेत्र में भूगर्भीय दबाव बनता है। जब चट्टानों में जमा तनाव अचानक मुक्त होता है, तो भूकंपीय तरंगें पैदा होती हैं और धरती में कंपन महसूस होता है। उत्तराखंड की प्रमुख भूगर्भीय संरचनाओं में मेन सेंट्रल थ्रस्ट भी शामिल है, जो लघु हिमालय और उच्च हिमालय के बीच एक महत्वपूर्ण भूगर्भीय सीमा है। शोध में इस क्षेत्र की कई भूकंपीय घटनाओं का संबंध हिमालय की सक्रिय भूगर्भीय संरचनाओं से जोड़ा गया है। हालांकि, किसी विशेष भूकंप के लिए कौन-सा भ्रंश सक्रिय हुआ, इसका निर्धारण विस्तृत वैज्ञानिक आंकड़ों और विश्लेषण के बाद ही किया जा सकता है। उत्तराखंड का इतिहास विनाशकारी भूकंपों का साक्षी रहा है। वर्ष 1991 में उत्तरकाशी और 1999 में चमोली में आए भूकंपों ने जान-माल को नुकसान पहुंचाया था। इन घटनाओं ने पहाड़ी क्षेत्रों में भूकंपरोधी निर्माण, सुरक्षित भवनों और आपदा के समय त्वरित प्रतिक्रिया की अहमियत को उजागर किया था। हालांकि, 4.2 या 4.9 तीव्रता के भूकंप के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कोई बड़ा भूकंप आने वाला है। वैज्ञानिक अभी तक भूकंप के सटीक समय, स्थान और तीव्रता की विश्वसनीय भविष्यवाणी नहीं कर सकते। इसलिए हालिया घटनाओं को लेकर अफवाहों से बचना और आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करना जरूरी है। भूकंप के दौरान झटके महसूस हों तो घबराने के बजाय सुरक्षित कदम उठाना चाहिए। घर के भीतर हों तो मजबूत मेज के नीचे बैठकर सिर और गर्दन को ढकें तथा खिड़कियों और भारी सामान से दूर रहें। झटके रुकने के बाद सीढ़ियों से सावधानीपूर्वक बाहर निकलें और लिफ्ट का इस्तेमाल न करें। पहले से आपातकालीन किट, जरूरी दस्तावेज और प्राथमिक उपचार सामग्री तैयार रखना भी उपयोगी है। उत्तरकाशी और बागेश्वर में दर्ज झटकों के बाद राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र तथा आपदा प्रबंधन एजेंसियों की आधिकारिक जानकारी पर नजर रखना महत्वपूर्ण है। हिमालयी क्षेत्र की भूकंपीय संवेदनशीलता को देखते हुए जागरूकता, सुरक्षित निर्माण और तैयारी ही नुकसान कम करने के सबसे प्रभावी उपाय हैं।