टिहरी बांध की मंजूरी पर मंडराया संकट! शर्तों के उल्लंघन को लेकर हाईकोर्ट सख्त, धामी सरकार से 2 सप्ताह में मांगा जवाब

Tehri Dam approval faces uncertainty! High Court takes a tough stance on the violation of conditions; seeks a response from the Dhami government within two weeks.

नैनीताल। विश्व के सबसे ऊंचे बांधों में से एक 'टिहरी बांध परियोजना' की पर्यावरण सुरक्षा और उसकी कानूनी शर्तों के उल्लंघन को लेकर उत्तराखंड उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) ने कड़ा रुख अपनाया है। जनपद टिहरी गढ़वाल के प्रतापनगर क्षेत्र से कांग्रेस विधायक विक्रम सिंह नेगी द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर स्थिति स्पष्ट करने के सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए दो हफ्ते बाद की तिथि नियत की है, जिससे धामी सरकार की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। याचिकाकर्ता और विधायक विक्रम सिंह नेगी ने उच्च न्यायालय के समक्ष बेहद गंभीर और चौंकाने वाले तथ्य प्रस्तुत किए हैं। जनहित याचिका में कहा गया है कि वर्ष 1990 के दौरान जब केंद्र सरकार द्वारा टिहरी बांध परियोजना को अंतिम मंजूरी दी जा रही थी, तब यह अनिवार्य शर्त रखी गई थी कि 'भागीरथी रिवर मैनेजमेंट अथॉरिटी' (भागीरथी नदी घाटी प्राधिकरण) का गठन किया जाएगा। इस अथॉरिटी का मुख्य काम समय-समय पर विशाल बांध परियोजना से आस-पास के क्षेत्रों में होने वाले प्राकृतिक, भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक बदलावों का बारीकी से निरीक्षण करना था, ताकि किसी भी बड़े खतरे को टाला जा सके।

जनहित याचिका में यह भी उजागर किया गया है कि वर्ष 2005 में उत्तराखंड सरकार द्वारा इस संबंध में विधानसभा में एक विशेष अधिनियम भी पारित किया गया था। इस अधिनियम की धारा 12 में स्पष्ट रूप से यह कानूनी प्रावधान था कि इस महत्वपूर्ण 'भागीरथी रिवर वैली अथॉरिटी' को सुचारू रूप से चलाने के लिए फंड सीधे सरकार द्वारा मुहैया कराया जाएगा। लेकिन बेहद हैरान करने वाली बात यह है कि उत्तराखंड राज्य गठन के 26 वर्ष बीत जाने के बाद भी इस अथॉरिटी को सरकार की ओर से एक भी रुपया फंड उपलब्ध नहीं कराया गया। बिना बजट के यह महत्वपूर्ण संस्था सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है और इसकी असल कार्यप्रणाली पूरी तरह बाधित है। याचिका में 1990 की भारत सरकार की अनुमति के उस महत्वपूर्ण क्लॉज का भी हवाला दिया गया है, जिसमें यह साफ लिखा है कि अगर पर्यावरणीय, भौगोलिक या अन्य किसी भी दृष्टिकोण से तय शर्तों का उल्लंघन पाया जाता है, तो बांध की गतिविधियों और उसके काम को तुरंत रोका भी जा सकता है। विधायक विक्रम सिंह नेगी का आरोप है कि उन्होंने इस गंभीर मुद्दे को पूर्व में विधानसभा के पटल पर भी पुरजोर तरीके से उठाया था। चूंकि ऊर्जा विभाग का पोर्टफोलियो खुद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के पास है, इसलिए उनसे इस संबंध में सीधे सवाल पूछा गया था। लेकिन मुख्यमंत्री की ओर से इस संवेदनशील विषय पर बेहद गोलमोल जवाब दिया गया और यह साफ नहीं किया गया कि आखिर इस अथॉरिटी को फंड क्यों नहीं मुहैया कराया जा रहा है। सरकार की इसी उदासीनता के कारण अंततः उन्हें न्याय की गुहार लगाने के लिए हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी। अब देखना होगा कि दो हफ्ते बाद सरकार कोर्ट में क्या जवाब दाखिल करती है।