Oct 02, 2026 Login

बेलगावी में ‘फॉर्म-7’ पर सियासी संग्राम, राहुल गांधी का दावा- 15 हजार वोटरों के नाम हटाने की कोशिश

Political row over ‘Form-7’ in Belagavi; Rahul Gandhi claims attempt to remove 15,000 voters' names.

नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र का सबसे पवित्र और सशक्त स्तंभ 'एक नागरिक, एक वोट' का अधिकार है। निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया केवल मतदान के दिन से तय नहीं होती, बल्कि इसकी असली नीव पारदर्शी और त्रुटिहीन मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) पर टिकी होती है। कर्नाटक के बेलगावी से सामने आया मतदाता सूची विवाद केवल एक क्षेत्रीय या राजनीतिक बयानबाजी का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह देश की चुनावी व्यवस्था की शुचिता, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।

कर्नाटक के बेलगावी में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के बीच फॉर्म-7 को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने दावा किया है कि 22, 23 और 24 सितंबर के दौरान करीब 15 हजार मतदाताओं के नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 आवेदन सामने आए। उन्होंने इस पूरे मामले को मतदाता सूची में कथित हेरफेर से जोड़ते हुए भाजपा और चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठाए हैं। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में सामने आए अलग-अलग स्थानों के आवेदन और राहुल गांधी द्वारा बताए गए करीब 15 हजार के आंकड़े को एक ही संख्या मानना अभी उचित नहीं है। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट में आरोप लगाया कि कथित तौर पर बड़ी संख्या में फॉर्म-7 आवेदन एक साथ जमा किए गए और इनमें मुस्लिम, एससी, एसटी तथा ओबीसी मतदाताओं के नाम निशाने पर होने का दावा किया गया। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए कथित तौर पर संगठित तरीके से आवेदन किए गए, तो इसकी जांच और जिम्मेदारी तय करने के लिए चुनाव आयोग की ओर से क्या कार्रवाई होगी। उन्होंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी दोहराई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ जांच की मांग की। राहुल गांधी ने एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि तकनीक और सॉफ्टवेयर के माध्यम से मतदाता सूची में बड़े स्तर पर बदलाव संभव हो सकते हैं। ये आरोप राजनीतिक दावे हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि जांच के निष्कर्षों से ही हो सकेगी। बेलगावी में विवाद की शुरुआत एक मतदान केंद्र पर करीब 200 फॉर्म-7 आवेदन पहुंचने की घटना से हुई। रिपोर्टों के मुताबिक, दो लोग कथित तौर पर इन आवेदनों को लेकर बूथ लेवल अधिकारी के पास पहुंचे और हस्ताक्षर करने का दबाव बनाया। संबंधित बीएलओ ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। अधिकारी का कहना था कि जिन मतदाताओं के नाम पर आपत्ति की गई थी, उनका मैपिंग कार्य पहले ही किया जा चुका था। मामले में बेलगावी प्रशासन की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि इन आपत्तियों के आधार पर किसी मतदाता का नाम हटाया नहीं गया था। वहीं, कुछ रिपोर्टों में अलग-अलग मतदान केंद्रों पर पहले से भरे हुए फॉर्म-7 आवेदन मिलने की बात सामने आई है। कुछ बूथ लेवल अधिकारियों ने कथित दबाव की बात कही है। एक बूथ लेवल एजेंट ने अपने परिवार और आसपास के लोगों के नाम भी ऐसे आवेदनों में होने का दावा किया। इन आरोपों की जांच अभी महत्वपूर्ण है। विवाद के बीच बेलगावी दक्षिण के भाजपा विधायक अभय पाटिल ने करीब 2,500 मतदाताओं को लेकर उठे आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने नाम हटाने की मांग नहीं की थी, बल्कि संदिग्ध मतदाताओं से संबंधित आपत्तियों की जांच का अनुरोध किया था। चुनाव अधिकारियों ने भी कथित तौर पर बड़े पैमाने पर एक साथ मतदाता नामों की जांच या हटाने के लिए कोई कानूनी प्रावधान नहीं होने की बात कही है। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। फॉर्म-7 दाखिल होना अपने आप में मतदाता का नाम हट जाना नहीं है। किसी नाम को हटाने से पहले निर्धारित प्रक्रिया, सत्यापन और निर्वाचन अधिकारी के स्तर पर निर्णय आवश्यक होता है। चुनाव आयोग ने SIR से जुड़ी प्रक्रियाओं में कुछ बदलाव करते हुए ऐसे मतदाताओं के घर जाकर दस्तावेज जुटाने की व्यवस्था भी घोषित की है, जिन्हें नोटिस जारी हुआ है। बेलगावी का विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियादी कड़ी है। किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटना गंभीर विषय है, लेकिन दूसरी ओर केवल आपत्ति या फॉर्म दाखिल होने को अंतिम विलोपन मान लेना भी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। ऐसे में राजनीतिक आरोपों के बजाय प्रत्येक आवेदन की जांच, उसके स्रोत, दस्तावेजों की सत्यता और अधिकारियों की कार्रवाई को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना जरूरी है। फिलहाल बेलगावी में फॉर्म-7 को लेकर आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। राहुल गांधी के 15 हजार नाम हटाने के दावे, अलग-अलग बूथों पर सामने आए बड़ी संख्या में आवेदनों और प्रशासन की ओर से नाम नहीं हटाए जाने के स्पष्टीकरण—इन सभी को अलग-अलग तथ्यों के रूप में देखना होगा। पूरे मामले की निष्पक्ष जांच ही यह स्पष्ट कर सकेगी कि कितने आवेदन वास्तव में दाखिल हुए, किसने दाखिल किए, किन मतदाताओं को लेकर आपत्ति की गई और क्या किसी पात्र मतदाता को प्रभावित करने का प्रयास हुआ।