उत्तराखंडः विधानसभा सचिवालय से बर्खास्त कर्मचारियों का मामला! दोनों पक्षों ने रखी अपनी-अपनी बात, अब 16 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
नैनीताल। उत्तराखण्ड हाईकोर्ट ने विधान सभा सचिवालय से बर्खास्त कर्मचारियों के मामले में सुनवाई की। सुनवाई के दौरान बर्खास्त कर्मचारियों की तरफ से कहा गया कि उनकी नियुक्ति वैध है। विधानसभा के अध्यक्ष को नियुक्ति करने का अधिकार है। विधान सभा सचिवालय की ओर से कहा गया कि जितनी भी अवैध नियुक्तियां की गई थी विधानसभा ने उन्हें नियमों के तहत हटाया है। जो नियुक्तियां की गई, वो बिना नियमावली को ध्यान में रखते हुए की गई थी। विधानसभा के अध्यक्ष को नियुक्ति करने का कोई अधिकार नही है। बिना विज्ञप्ति जारी किए 228 कर्मचारियों को सचिवालय में नौकरी दे दी। जिसपर कोर्ट ने सुनवाई को जारी रखते हुए अगली सुनवाई हेतु 16 जुलाई की तिथि नियत की है। आज बर्खास्त कर्मचारियों की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता देव दत्त कामत, वरिष्ठ अधिवक्ता वीबीएस नेगी, वरिष्ठ अधिवक्ता केपी उपाध्याय और रविन्द्र बिष्ठ ने पैरवी की। बता दें कि अपनी बर्खास्तगी के आदेश को बबिता भंडारी, भूपेंद्र सिंह बिष्ट, कुलदीप सिंह व 225 अन्य ने एकलपीठ में चुनौती दी है। याचिकाओं में कहा गया है कि विधानसभा अध्यक्ष के द्वारा लोकहित को देखते हुए उनकी सेवाएं 27, 28 व 29 सितम्बर 2022 को समाप्त कर दी। बर्खास्तगी आदेश में उन्हें किस आधार पर किस कारण की वजह से हटाया गया, कहीं इसका उल्लेख नही किया गया, न ही उन्हें सुना गया। जबकि उनके द्वारा सचिवालय में नियमित कर्मचारियों की भांति कार्य किया है। एक साथ इतने कर्मचारियों को बर्खास्त करना लोकहित नही है। यह आदेश विधि विरुद्ध है। विधान सभा सचिवालय में 396 पदों पर बैक डोर नियुक्तियां 2001 से 2015 के बीच में भी हुई हैं जिनको नियमित किया जा चुका है। याचिकाओं में कहा गया है कि 2014 तक हुई तदर्थ नियुक्त कर्मचारियों को चार वर्ष से कम की सेवा में नियमित नियुक्ति दे दी गई। किन्तु उन्हें 6 वर्ष के बाद भी नियमित नहीं किया, अब उन्हें हटा दिया गया। पूर्व में उनकी नियुक्ति को 2018 में जनहित याचिका दायर कर चुनौती दी गयी थी, जिसमें कोर्ट ने उनके हित में आदेश देकर माना था कि उनकी नियुक्ति वैध है। जबकि नियमानुसार छः माह की नियमित सेवा करने के बाद उन्हें नियमित किया जाना था।