नैनीताल: 15 से 30 दिनों के अंदर घर बैठे डिग्री देने का दावा! आज भी यूनिवर्सिटी के चक्कर काट रहे छात्र, सवाल उठा तो कुलपति ने छात्रों पर फोड़ा ठीकरा
नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को समय पर डिग्री उपलब्ध कराने के कुलपति के दावों पर आज हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में तीखे सवाल उठे। खास तौर पर घर बैठे विद्यार्थियों को डिग्री उपलब्ध कराने और 15 दिन में डिग्री देने की लिखित जानकारी के बावजूद कई विद्यार्थियों को अब तक डिग्री नहीं मिलने का मुद्दा पत्रकारों ने उठाया। सवाल किया गया कि कुलपति ने दावा किया था कि विद्यार्थियों को घर बैठे डिग्री उपलब्ध कराई जाएगी, लेकिन कई विद्यार्थियों की शिकायत है कि ऑनलाइन आवेदन करने और व्यक्तिगत रूप से विश्वविद्यालय के चक्कर लगाने के बावजूद उन्हें डिग्री नहीं मिली। इस पर कुलपति ने पहले कहा कि संभव है विद्यार्थियों ने डिग्री की फीस जमा नहीं की होगी। जब पत्रकार ने सवाल किया कि विद्यार्थी परीक्षा फॉर्म भरते समय ही परीक्षा, परीक्षाफल और डिग्री संबंधी फीस जमा कर चुके हैं, तो कुलपति ने जवाब बदलते हुए कहा कि विद्यार्थियों के पते उपलब्ध नहीं थे या गलत पते थे। इस पर पत्रकार ने सवाल किया कि एडमिशन और परीक्षा फॉर्म के दौरान विद्यार्थियों से पता समेत तमाम जानकारी ली जाती है, ऐसे में डिग्री नहीं भेज पाने के लिए पता उपलब्ध नहीं होने या गलत होने का तर्क कितना उचित है? कुलपति ने जवाब दिया कि उन्होंने अपनी वेबसाइट पर स्पष्ट किया है कि जिस विद्यार्थी को कोई समस्या है, वह उन्हें सीधे WhatsApp या ईमेल के माध्यम से अपनी समस्या बता सकता है।
जब सामने रखी छात्र की शिकायत तो बोले- “बच्चा बहुत कुछ कहता है...”
प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकार ने कुलपति के सामने एक ऐसे विद्यार्थी का मामला भी रखा, जो हाल ही में उनसे व्यक्तिगत रूप से मिला था और डिग्री नहीं मिलने की शिकायत कर चुका था। इतना ही नहीं, एक अन्य विद्यार्थी का मामला भी सामने रखा गया, जिसके बारे में दावा किया गया कि डिग्री नहीं मिलने के कारण वह रेलवे भर्ती परीक्षा में शामिल नहीं हो पाया। इस पर कुलपति ने कहा कि बच्चा बहुत कुछ कहता है, जरूरी है कि बच्चा सच बोल रहा है या नहीं।” कुलपति के इस जवाब ने डिग्री वितरण व्यवस्था को लेकर सवाल और गंभीर कर दिए। सवाल यह है कि अगर विद्यार्थी ऑनलाइन आवेदन करने के बाद भी डिग्री के लिए विश्वविद्यालय के चक्कर लगा रहे हैं, तो आखिर जिम्मेदारी किसकी है?
राष्ट्रपति को दी गई रिपोर्ट पर भी उठ सकता है सवाल
सबसे बड़ा सवाल अब उस लिखित जानकारी को लेकर खड़ा हो रहा है, जिसमें विश्वविद्यालय की ओर से विद्यार्थियों को 15 दिन में डिग्री उपलब्ध कराने की बात कही गई थी। यदि विश्वविद्यालय ने यह जानकारी राष्ट्रपति कार्यालय को भी दी थी और दूसरी ओर आज भी विद्यार्थी डिग्री के लिए भटक रहे हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या विश्वविद्यालय की ओर से राष्ट्रपति को दी गई रिपोर्ट जमीनी स्थिति से मेल खाती है? हालांकि, केवल विद्यार्थियों की शिकायतों और आज प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए जवाबों के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि रिपोर्ट झूठी थी। लेकिन रिपोर्ट में किए गए दावे और विद्यार्थियों की मौजूदा शिकायतों के बीच अंतर जरूर सवाल खड़े करता है। अब सवाल सिर्फ डिग्री मिलने या न मिलने का नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय द्वारा दी गई लिखित जानकारी और वास्तविक स्थिति के बीच कथित अंतर का भी है।