ऊधम सिंह नगर में शिक्षा का काला बाज़ार! अवैध स्कूलों और मान्यता प्राप्त विद्यालयों का गठजोड़,नौनिहालों के भविष्य की सरेआम नीलामी,शिक्षा विभाग मौन

The black market for education in Udham Singh Nagar! A nexus between illegal schools and recognized ones, the future of children is openly auctioned, and the education department remains silent.

शिक्षा,जिसे समाज का सबसे पवित्र स्तंभ और भविष्य निर्माण का आधार माना जाता है, जनपद ऊधम सिंह नगर में वह अब महज एक 'मुनाफे का सौदा' बनकर रह गई है। जिले के गली-कूचों में कुकुरमुत्तों की तरह उगे अवैध स्कूल न केवल नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, बल्कि मासूम बच्चों के भविष्य को भी अंधकार में धकेल रहे हैं। ताज़ा मामला जिला मुख्यालय के ट्रांजिट कैंप क्षेत्र से सामने आया है, जिसने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और अवैध स्कूलों के सिंडिकेट की पोल खोलकर रख दी है।

हैरानी की बात यह है कि जनपद में कई ऐसे स्कूल संचालित हो रहे हैं जिनके पास न तो भवन के मानक हैं और न ही योग्य शिक्षक। कम पढ़े-लिखे और रसूखदार लोग इन 'शिक्षा की दुकानों' को चला रहे हैं। इन अवैध केंद्रों को संरक्षण मिल रहा है उन मान्यता प्राप्त विद्यालयों से, जो चंद रुपयों के लालच में अपना नाम और पंजीकरण इन माफियाओं को 'किराए' पर दे देते हैं। इसका जीवंत उदाहरण ट्रांजिट कैंप स्थित 'मॉडर्न पब्लिक स्कूल' में देखने को मिला। यह स्कूल पूरी तरह अवैध रूप से चल रहा है, लेकिन इसके पास 'कागजी कवच' किसी और का है। मामला तब खुला जब एक जागरूक अभिभावक ने अपने बच्चे का दाखिला किसी अन्य प्रतिष्ठित विद्यालय में कराना चाहा। स्कूल ने बच्चे का रिजल्ट तो 'मॉडर्न पब्लिक स्कूल' के नाम से थमाया, लेकिन जब ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC) की बारी आई, तो वह दिनेशपुर के 'न्यू ऑक्सफोर्ड जूनियर हाई स्कूल के नाम से जारी की गई।

अभिभावकों का आरोप है कि अवैध रूप से चल रहे इस स्कूल ने महीनों तक उन्हें टीसी के लिए चक्कर कटवाए। मानसिक उत्पीड़न का यह दौर तब खत्म हुआ जब अभिभावक से 1500 रुपये की अवैध वसूली की गई। सवाल यह उठता है कि रुद्रपुर के ट्रांजिट कैंप में पढ़ने वाले बच्चे की टीसी दिनेशपुर का स्कूल कैसे जारी कर रहा है? सूत्रों की मानें तो यह एक बड़ा रैकेट है,जहां रुद्रपुर के अवैध स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों का नाम कागजों में दिनेशपुर या अन्य दूरस्थ क्षेत्रों के मान्यता प्राप्त स्कूलों में दर्ज दिखाया जाता है। परीक्षा के समय ये मान्यता प्राप्त स्कूल मोटी रकम लेकर रिजल्ट और सर्टिफिकेट बेचते हैं। इस पूरे प्रकरण में सबसे संदिग्ध भूमिका जिला शिक्षा विभाग की है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब भी किसी अवैध स्कूल की शिकायत होती है, विभाग एक नोटिस जारी कर अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री कर लेता है। कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति की जाती है, लेकिन कभी भी इन 'अवैध दुकानों' पर ताला नहीं जड़ा जाता। भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि विश्वसनीय सूत्रों का दावा है कि पिछले दिनों कई ऐसे स्कूलों को मान्यता दे दी गई जो मानकों के आसपास भी नहीं भटकते। चर्चा है कि शिक्षा महकमे के कुछ 'कर्महीनों' ने मोटी लेनदेन के आधार पर इन अवैध संस्थानों को अभयदान दिया है। यह विभाग की ही शह है कि आज अनपढ़ लोग भी शिक्षाविद बनकर बच्चों के भविष्य की नीलामी कर रहे हैं।

यदि समय रहते इस 'नेटवर्क' को ध्वस्त नहीं किया गया,तो ऊधम सिंह नगर की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी। हजारों बच्चों के दस्तावेजों की वैधता पर भविष्य में तलवार लटक सकती है। अभिभावक ठगे जा रहे हैं और विभाग 'कुंभकर्णी नींद' में सोया है। आखिर कब तक रसूख और पैसों के दम पर शिक्षा का यह 'काला खेल' चलता रहेगा? क्या ज़िला प्रशासन और शासन के आला अधिकारी इस मामले का संज्ञान लेकर इन अवैध स्कूलों और उनके मददगारों पर कठोर कार्रवाई करेंगे, या फिर नौनिहालों का भविष्य इसी तरह बाज़ार में बिकता रहेगा?  शिक्षा को व्यापार बनने से रोकना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। रुद्रपुर का यह मामला महज़ एक बानगी है, यदि पूरे जिले में निष्पक्ष जांच हो, तो कई सफेदपोश चेहरों से नकाब उतरना तय है।