महिला आरक्षणः 30 साल की लड़ाई! एक कानून और राजनीतिक खेल

Women's Reservation: A 30-Year Battle! A Law and a Political Game

महिला आरक्षण बिल की सच्चाई को समझने के लिए भावनाओं से ऊपर उठकर तथ्यों को देखना जरूरी है। मीडिया और राजनीतिक बयानबाजी में विपक्ष को ‘महिलाओं का दुश्मन’ बताने का सिलसिला तेज है, लेकिन हकीकत कुछ और है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम (संविधान 106वां संशोधन, 2023) लोकसभा-राज्यसभा में भारी बहुमत से पास हो चुका था, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर हो चुके थे और 16 अप्रैल 2026 को गजट नोटिफिकेशन के जरिए इसे लागू भी कर दिया गया। फिर 16-18 अप्रैल के विशेष सत्र में जो बिल लोकसभा में गिरा, वह मूल 2023 कानून नहीं था  बल्कि उसमें संशोधन कर लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850 तक करने, 2011 जनगणना के आधार पर परिसीमन करने और आरक्षण को 2029 चुनाव से लागू करने का पैकेज था। यह संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 298 पक्ष में और 230 विरोध में वोट पड़ा, लेकिन दो-तिहाई बहुमत (352 वोट) नहीं मिला। परिणामस्वरूप बिल गिर गया और सरकार ने बाकी दो बिल भी वापस ले लिए। अब मूल 2023 कानून अभी भी अगली जनगणना और उसके बाद परिसीमन का इंतजार कर रहा है, जिससे आरक्षण 2034 या उसके बाद लागू हो सकता है। 

30 साल की यात्राः
नेहरू से मोदी तक महिला आरक्षण की जड़ें आजादी के बाद की हैं। संविधान सभा में महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग पर बहस हुई, लेकिन ज्यादातर सदस्यों (महिलाओं सहित) ने इसे समानता के विरुद्ध माना। 1989 में राजीव गांधी सरकार ने पंचायत-नगरपालिका स्तर पर 33 प्रतिशत आरक्षण की दिशा में कदम उठाया। 1992-93 में पीवी नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार ने 73वें और 74वें संशोधन पास कर पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया। आज देश में लाखों महिला प्रतिनिधि इसी का परिणाम हैं, यह सबसे सफल कदम साबित हुआ। 1996 में एचडी देवेगौड़ा सरकार ने पहला संसदीय आरक्षण बिल (81वां संशोधन) पेश किया, लेकिन ओबीसी सब-कोटा की मांग और राजनीतिक विवाद में फंस गया। अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने 1998, 1999, 2002 और 2003 में चार बार बिल लाया, लेकिन सपा-राजद जैसे दलों के विरोध के कारण सफलता नहीं मिली। 2008-2010 में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने राज्यसभा में 108वां संशोधन पास कराया (भाजपा और वाम दलों का समर्थन मिला), लेकिन लोकसभा में सपा-राजद-बीएसपी के हंगामे के कारण बिल आगे नहीं बढ़ सका और 2014 में लैप्स हो गया। 2023 में  नरेंद्र मोदी सरकार ने विशेष सत्र में 128वां संशोधन (बाद में 106वां) लोकसभा में 454-2 और राज्यसभा में सर्वसम्मति से पास कराया। एससी/एसटी महिलाओं के लिए सब-कोटा भी शामिल था। राहुल गांधी, सोनिया गांधी समेत विपक्ष ने समर्थन किया। लेकिन कानून में स्पष्ट शर्त रखी गईं, यह अगली जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होगा। 

2026 का ड्रामाः आरक्षण या सीट विस्तार? 
16 अप्रैल 2026 को सरकार ने 2023 कानून को नोटिफाई कर दिया, लेकिन साथ में तीन बिल लाए, संविधान 131वां संशोधन, परिसीमन बिल और संघ राज्य क्षेत्र संशोधन। मकसद था लोकसभा सीटें बढ़ाकर 850 तक करना और 2011 जनगणना के आधार पर परिसीमन कर 2029 से आरक्षण लागू करना। सरकार का तर्कः बिना सीटें बढ़ाए आरक्षण लागू करने से कुछ राज्यों की सीटें घट सकती हैं, इसलिए सभी को बढ़ोतरी दें। 

विपक्ष (कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी आदि) का आरोप
यह दक्षिणी राज्यों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक) की सजा है, क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण किया। 2011 जनगणना से उत्तर की आबादी बढ़ी है, इसलिए उनकी सीटें बढ़ेंगी और दक्षिण की ताकत घटेगी। जाति जनगणना छुपाने की कोशिश भी बताई गई। अमित शाह ने आश्वासन दिया कि सभी राज्यों को समानुपातिक बढ़ोतरी मिलेगी, लेकिन विश्वास नहीं जमा। बिल गिर गया। 

सच्चाई क्या है? अब भी इंतजार
2023 का बिल पास हो चुका था। विपक्ष ने उसे रोका नहीं, बल्कि समर्थन किया। मीडिया का नैरेटिव कि विपक्ष ने महिला आरक्षण बिल पास नहीं होने दिया आधा सच है, जो गिरा, वह संशोधन पैकेज था, जिसमें सीट विस्तार और परिसीमन मुख्य थे। महिला सशक्तिकरण जरूरी है, लेकिन लोकसभा सीटों का विस्तार एक बड़ा संवैधानिक बदलाव है, जिसके लिए दो-तिहाई बहुमत और व्यापक सहमति जरूरी है। दक्षिण-उत्तर का क्षेत्रीय असंतुलन असली मुद्दा है। पंचायत स्तर पर 33 प्रतिशत आरक्षण सफल रहा, लेकिन संसद-विधानसभा में 30 साल लगे। अब भी इंतजार है।

यूं तो राजनीति में अच्छे इरादों को भी गणित और क्षेत्रीय हितों से समझौता करना पड़ता है। मोदी सरकार ने 2023 में ऐतिहासिक कदम उठाया, लेकिन 2026 में तेजी से लाए गए पैकेज में सहमति नहीं बनी। महिलाओं को इंतजार करना पड़ेगा। सवाल यह है कि क्या अगला कदम सर्वदलीय सहमति से उठेगा, या 2029 चुनाव इसी मुद्दे पर लड़ा जाएगा? महिला आरक्षण कोई पार्टी का एजेंडा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जरूरत है। इसे राजनीतिक हथियार बनाने के बजाय, सभी दलों को मिलकर रास्ता निकालना चाहिए। ताकि आधी आबादी को उसकी सही भागीदारी मिल सके। इतिहास गवाह है कि जब इच्छाशक्ति और समझौता साथ देते हैं, तो बाधाएं टूटती हैं। 1993 में पंचायतों में टूटीं, 2023 में संसद में टूटीं। अब बारी बाकी बाधाओं की है।