छात्रसंघ चुनाव: Gen-Z ने दिखाया अलग चुनावी मूड! कुमाऊं में 25 निर्दलीय जीते, ABVP को 16 और NSUI को 7 सीटें मिलीं, MBPG-DSB जैसे बड़े कॉलेजों में भी युवाओं ने चुने अपने पसंदीदा चेहरे
रुद्रपुर। उत्तराखंड के छात्रसंघ चुनाव में इस बार जेन जी का मूड साफ नजर आया। कुमाऊं में पहाड़ से लेकर तराई तक हुए चुनावों में युवाओं ने पारंपरिक छात्र संगठनों के साथ-साथ निर्दलीय उम्मीदवारों को भी जमकर मौका दिया। कुमाऊं के 51 कॉलेजों में अध्यक्ष पद के नतीजों पर नजर डालें तो 25 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की, जबकि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) को 16 और NSUI को 7 सीटों पर जीत मिली। रामगढ़ और देवीधुरा कॉलेज में अध्यक्ष पद के लिए नामांकन ही नहीं हुआ। इन नतीजों में सबसे बड़ा सिग्नल यह रहा कि कैंपस की राजनीति में जेन जी ने किसी एक संगठन के साथ पूरी तरह खड़े होने के बजाय कई जगह स्थानीय चेहरे और व्यक्तिगत पकड़ को प्राथमिकता दी। यही वजह है कि कुमाऊं के कई चर्चित कॉलेजों में संगठन के अधिकृत प्रत्याशियों के सामने निर्दलीय उम्मीदवारों ने बाजी मार ली।
जेन जी का फॉर्मूला- संगठन अपनी जगह, पसंद का चेहरा अपनी जगह
छात्रसंघ चुनावों को आगामी विधानसभा चुनाव से पहले युवाओं के मूड को समझने के एक महत्वपूर्ण अवसर के तौर पर देखा जा रहा था। चुनाव प्रचार में ABVP और NSUI के झंडे-बैनर जरूर दिखाई दिए, लेकिन कई जगह मुकाबला संगठन से ज्यादा कैंडिडेट की अपनी लोकप्रियता, कैंपस कनेक्शन और स्थानीय समीकरणों पर टिकता नजर आया। कुमाऊं में 25 निर्दलीय अध्यक्षों की जीत ने इसी तस्वीर को मजबूत किया है। इनमें कई ऐसे चेहरे भी हैं, जिनका किसी न किसी छात्र संगठन से पुराना जुड़ाव रहा है। टिकट नहीं मिलने या संगठन के अधिकृत प्रत्याशी से मतभेद के बाद कुछ नेताओं ने निर्दलीय मैदान में उतरकर अपनी ताकत आजमाई और जीत हासिल की। कुमाऊं में जीत दर्ज करने वाले 25 निर्दलीय प्रत्याशियों में कई ऐसे हैं, जो पहले ABVP की राजनीति से जुड़े रहे हैं। नैनीताल जिले के एमबीपीजी कॉलेज में अध्यक्ष पद जीतने वाले आर्यन बेलवाल इसका प्रमुख उदाहरण हैं। बेलवाल को ABVP की पृष्ठभूमि वाला प्रत्याशी बताया जा रहा है, लेकिन चुनाव में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान संभाला और जीत दर्ज की। यानी कैंपस में जेन जी का संदेश कई जगह ऐसा दिखाई दिया, पार्टी या संगठन का टैग जरूरी नहीं, उम्मीदवार की अपनी पहचान भी मायने रखती है।
MBPG और DSB में संगठन को बड़ा झटका
कुमाऊं के दो सबसे चर्चित कैंपसों, हल्द्वानी के एमबीपीजी कॉलेज और नैनीताल के डीएसबी परिसर के नतीजों ने भी छात्र राजनीति में चर्चा छेड़ दी। एमबीपीजी कॉलेज में निर्दलीय आर्यन बेलवाल ने ABVP के धीरज बिष्ट को शिकस्त दी। वहीं नैनीताल के डीएसबी परिसर में निर्दलीय भानूप्रताप सिंह चौहान ने ABVP के शुभम कुमार को बड़े अंतर से हराया। दोनों नतीजों ने यह दिखाया कि बड़े कैंपसों में भी संगठन का नाम अपने आप जीत की गारंटी नहीं बना। उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ और कैंपस के भीतर उसकी स्वीकार्यता निर्णायक कारक बन सकती है।
SSJ में पांच साल बाद ABVP की वापसी
अल्मोड़ा के सोबन सिंह जीना परिसर में ABVP ने पांच साल बाद अध्यक्ष पद पर वापसी की। ABVP के रोहित कुमल्टा ने NSUI के अमित बिष्ट को 294 मतों से हराया। यह परिणाम ABVP के लिए महत्वपूर्ण रहा, जबकि NSUI के लिए यह सीट बचा पाना चुनौती साबित हुआ। वहीं चौखुटिया के गोपाल बाबू गोस्वामी कॉलेज में उत्तराखंड क्रांति दल से जुड़े छात्र संगठन USF ने सभी पदों पर जीत दर्ज कर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।
क्या 2027 से पहले जेन जी ने दे दिया सिग्नल?
छात्रसंघ चुनाव के नतीजों के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह जेन जी के राजनीतिक मूड का संकेत है? कुमाऊं के आंकड़े बताते हैं कि 25 निर्दलीय जीत सबसे बड़ा आंकड़ा है। इसके बाद ABVP के 16 और NSUI के 7 अध्यक्ष पद आते हैं। लेकिन इन नतीजों को सीधे विधानसभा चुनाव का पूर्वानुमान मानना जल्दबाजी होगी। छात्रसंघ चुनावों में कैंपस के मुद्दे, स्थानीय समीकरण, प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि और छात्र हितों से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फिर भी एक बात जरूर सामने आई है, कैंपस की जेन जी राजनीति में अब मुकाबला सिर्फ दो छात्र संगठनों के बीच नहीं रह गया है। कई जगह छात्रों ने संगठन से बाहर के चेहरों को भी मौका दिया है। बड़े कॉलेजों में निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत और अलग-अलग जिलों में अलग-अलग संगठनों के प्रदर्शन ने छात्र राजनीति की तस्वीर को बहुकोणीय बना दिया है। यही वजह है कि उत्तराखंड के छात्रसंघ चुनाव के नतीजे अब सिर्फ कॉलेज कैंपस तक सीमित चर्चा नहीं हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के लिए जेन जी के इस कैंपस मूड को समझना भी एक अहम चुनौती बन गया है।