भेदभाव से सम्मान तक: बदल रही है ट्रांसजेंडर समुदाय की तस्वीर!तालियों और नाच-गाने की रूढ़ छवि से आगे बढ़कर पुलिस,प्रशासन,कानून और चिकित्सा में हासिल किए महत्वपूर्ण मुकाम!
भारत।
कभी समाज ने ट्रांसजेंडर पहचान को कुछ तयशुदा भूमिकाओं और रूढ़ धारणाओं के दायरे में कैद कर दिया था। शादी-ब्याह में तालियां बजाते, नाचते-गाते या दूसरों से मदद मांगते लोग ही उनकी पूरी पहचान मान ली गई,और उन्हें हीन दृष्टि से देखा जाता रहा। पढ़ाई, नौकरी, करियर और सम्मान के साथ जीने के उनके सपनों को अक्सर परिवार और समाज की अस्वीकार्यता के बीच जगह ही नहीं मिल पाती थी। लेकिन वक्त बदल रहा है और उसके साथ यह तस्वीर भी। आज वही ट्रांसजेंडर समुदाय शिक्षा हासिल कर रहा है, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दर्ज कर रहा है और पुलिस, प्रशासन, कानून व चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में जिम्मेदार पदों तक पहुंच रहा है। ये कहानियां सिर्फ सफलता की नहीं, बल्कि उस बदलती सोच की भी गवाही हैं जो कहती है कि किसी इंसान की पहचान उसके सपनों की सीमा नहीं हो सकती,उसे भी परिवार का साथ, शिक्षा का अवसर, सम्मान के साथ जीने और अपनी काबिलियत के दम पर मुकाम हासिल करने का पूरा अधिकार है। ट्रांसजेंडर समुदाय के सामने सामाजिक स्वीकार्यता की चुनौतियां अलग रही हैं, लेकिन देश में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जिन्होंने शिक्षा और पेशेवर योग्यता के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई। किसी ने राज्य सिविल सेवा परीक्षा पास कर सरकारी अधिकारी की जिम्मेदारी संभाली तो किसी ने पुलिस भर्ती प्रक्रिया के बाद वर्दी पहनी। कुछ ने लोक अदालत में सदस्य के रूप में जिम्मेदारी संभाली, जबकि चिकित्सा और अकादमिक क्षेत्र में भी ट्रांसजेंडर पेशेवरों ने अपनी जगह बनाई।
आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ लोगों के बारे में जिन्होंने बरसों पुराने मिथ को तोड़कर अपनी एक अलग पहचान बनाई और आज गर्व से इसी समाज में जी रहे हैं।

ऐश्वर्या ऋतुपर्णा प्रधान की कहानी सरकारी सेवा से जुड़ी महत्वपूर्ण मिसाल है। ओडिशा के कंधमाल जिले की ऐश्वर्या ने 2010 में Odisha Financial Service में प्रवेश किया। उस समय वह पुरुष पहचान के साथ सरकारी सेवा में आई थीं और Commercial Tax Officer के रूप में तैनात हुईं। 2014 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद उन्होंने अपनी ट्रांसजेंडर पहचान सार्वजनिक रूप से अपनाई और सरकारी रिकॉर्ड में नाम और जेंडर बदलने की प्रक्रिया शुरू की। ऐश्वर्या का उपलब्ध रिकॉर्ड उन्हें Odisha की राज्य वित्तीय सेवा से जोड़ता है। उनकी कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी सेवा में रहते हुए उन्होंने अपनी पहचान को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया और जिम्मेदार पद पर काम जारी रखा।

न्यायिक क्षेत्र में जॉयिता मंडल का नाम उल्लेखनीय है। 2017 में पश्चिम बंगाल के इस्लामपुर में उन्हें Lok Adalat में सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया और उन्होंने मामलों की सुनवाई में हिस्सा लिया। उन्हें व्यापक रूप से भारत की पहली ट्रांसजेंडर Lok Adalat judge कहा गया, हालांकि उस समय की रिपोर्ट में खुद जॉयिता ने कहा था कि देश में इससे पहले किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति की ऐसी नियुक्ति हुई थी या नहीं, इसका निश्चित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। जॉयिता का सफर आसान नहीं था। सामाजिक और आर्थिक मुश्किलों के बीच उन्होंने शिक्षा जारी रखी और बाद में कानून के क्षेत्र से जुड़ीं। Lok Adalat में उनकी नियुक्ति इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण रही कि एक ट्रांसजेंडर सामाजिक कार्यकर्ता को उसकी योग्यता और सामाजिक कार्य के अनुभव के आधार पर ऐसी जिम्मेदारी मिली।

पुलिस सेवा में के. प्रिथिका यशिनी ने अलग रास्ता बनाया। तमिलनाडु में Sub-Inspector की भर्ती प्रक्रिया में उनके जेंडर को लेकर समस्या सामने आई थी। मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा। कोर्ट के रिकॉर्ड में उनके Sub-Inspector पद की भर्ती प्रक्रिया और उनसे जुड़े विवाद का उल्लेख है। बाद में वह तमिलनाडु पुलिस में Sub-Inspector के रूप में नियुक्त हुईं।
प्रिथिका की कहानी इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने केवल सामाजिक पहचान के स्तर पर नहीं, बल्कि सरकारी भर्ती प्रक्रिया में अपनी जगह बनाने के लिए कानूनी लड़ाई भी लड़ी। उनकी नियुक्ति को भारत में ट्रांसजेंडर लोगों के पुलिस सेवा में प्रवेश की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है।

असम में स्वाति बिधान बरुआ ने Lok Adalat के माध्यम से न्यायिक प्रक्रिया में भागीदारी की। 2018 में उन्हें Assam में Lok Adalat का conciliator नियुक्त किया गया। यह पद सदस्य-जज के समकक्ष भूमिका के रूप में रिपोर्ट किया गया था। Lok Adalat में conciliator का काम पक्षकारों के बीच विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान में मदद करना होता है। स्वाति की नियुक्ति उस समय इसलिए महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि वह ट्रांसजेंडर समुदाय से आने वाली ऐसी पहली व्यक्ति थीं जिन्हें Assam में Lok Adalat की इस भूमिका में जगह मिली।

महाराष्ट्र में विद्या कांबले को 2018 में Nagpur में Lok Adalat का member judge बनाया गया। उस समय की रिपोर्ट के मुताबिक वह महाराष्ट्र की पहली ट्रांसजेंडर Lok Adalat judge और देश में ऐसी नियुक्ति पाने वाली शुरुआती ट्रांसजेंडर व्यक्तियों में शामिल थीं। इससे पहले वह Sarthi Trust के साथ counsellor और pre-educator के रूप में काम कर रही थीं।
विद्या की कहानी में शिक्षा की कठिनाइयां भी सामने आती हैं। उन्होंने 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी और कम उम्र में परिवार से अलग होना पड़ा। बाद में सामाजिक क्षेत्र में काम करते हुए उन्होंने Lok Adalat की जिम्मेदारी संभाली।

चिकित्सा और अकादमिक क्षेत्र में डॉ. अक्सा शेख ने अलग पहचान बनाई है। Hamdard Institute of Medical Sciences and Research, Jamia Hamdard के आधिकारिक प्रोफाइल के अनुसार वह MBBS और MD (Community Medicine) हैं और वर्तमान में Community Medicine की Professor हैं। संस्थान उन्हें भारत की शुरुआती ट्रांसजेंडर डॉक्टरों में शामिल करता है। कोविड-19 महामारी के दौरान डॉ. अक्सा ने Hamdard Institute के COVID Vaccination Centre में Nodal Officer के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली। India Science के आधिकारिक प्रोफाइल में उन्हें अकादमिशियन, रिसर्चर और स्वास्थ्य क्षेत्र में ट्रांसजेंडर समुदाय की भागीदारी से जुड़े काम करने वाली डॉक्टर के रूप में दर्ज किया गया है।

बिहार के बांका की रहने वालीं मानवी मधु कश्यप देश की पहली ट्रांसजेंडर दारोगा बनकर एक अलग मुकाम हासिल कर चुकी है। उस परीक्षा में तीन ट्रांसजेंडरों में दो ट्रांसमेन थे और मनु अकेली ट्रांसवुमेन थी जो दारोगा बनी।यहां तक पहुंचने में उनको काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उनकी प्रारंभिक शिक्षा एसएस संपोषित हाई स्कूल पंजवारा से हुई है। जबकि प्लस टू सीएनडी कॉलेज से और सत्र 2018-21 में तिलकामांझी यूनिवर्सिटी से राजनीति शास्त्र में स्नातक किया है। उन्होंने बताया कि एक छोटे से गांव से निकलकर यहां तक का सफर बहुत ही कठिन रहा है। खासकर ट्रांसजेंडर होने की वजह से कई जगहों पर ट्रोलिंग जैसी बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ा।
ऐसी और कई मिसालें हैं जो ये साबित करती है कि इनके रास्ते अलग हैं, परीक्षाएं और चयन प्रक्रियाएं अलग हैं और पद भी अलग-अलग हैं। लेकिन एक बात समान है वो है इनकी ट्रांसजेंडर पहचान जो इन लोगों की पेशेवर योग्यता का विकल्प नहीं बनी, उन्होंने शिक्षा, परीक्षा, कानूनी प्रक्रिया और अपने काम के जरिए जिम्मेदारियां हासिल कीं।
यह बदलाव सिर्फ सरकारी सेवा, पुलिस, कानून या चिकित्सा तक सीमित नहीं है। मनोरंजन की दुनिया में भी ट्रांसजेंडर कलाकारों ने अपनी अलग पहचान बनाई है। भारत में बॉबी डार्लिंग, अंजली अमीर, तिस्ता दास, गजल धालीवाल और साइशा शिंदे जैसे नाम सामने आते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लावर्न कॉक्स, इलियट पेज, हंटर शेफर और माइकेला जे रोड्रिग्ज जैसे कलाकारों ने अभिनय और सार्वजनिक जीवन में अपनी जगह बनाई है,जो ये बताने में काफी है कि ट्रांसजेंडर पहचान किसी एक पेशे या सामाजिक भूमिका तक सीमित नहीं है,प्रतिभा और अवसर मिलने पर वे मनोरंजन से लेकर प्रशासन और चिकित्सा तक अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बना सकते हैं।
इन उदाहरणों को केवल संघर्ष की कहानियों के रूप में देखने के बजाय शिक्षा और रोजगार में ट्रांसजेंडर समुदाय की बढ़ती भागीदारी के उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है,क्योंकि ट्रांसजेंडर व्यक्ति भी इसी समाज का ही हिस्सा हैं,वो भी इस दुनिया में अपनी मर्जी से नहीं आए, उन्हें भी सम्मान के साथ जीने, पढ़ने, काम करने और अपनी पहचान के साथ जीवन चुनने का उतना ही अधिकार है जितना किसी और इंसान को। जन्म के साथ मिली पहचान और उसके बाद समाज की उपेक्षा दोनों ही स्तरों पर उन्हें लंबे समय तक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। अब वक्त उस सोच को बदलने का है, जिसमें किसी बच्चे को उसकी लैंगिक पहचान के कारण परिवार, शिक्षा और समाज से दूर कर दिया जाए।
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के ऐतिहासिक NALSA फैसले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता देते हुए समानता, गरिमा और पहचान के अधिकार को संवैधानिक संरक्षण दिया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को भी समान अधिकार और गरिमापूर्ण जीवन का हक है। उनकी पहचान का सम्मान करना केवल सामाजिक संवेदनशीलता का विषय नहीं, बल्कि उनके मौलिक अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। बदलते समय की असली तस्वीर यही है कि परिवार और समाज उन्हें हाशिये पर धकेलने के बजाय उनकी प्रतिभा, शिक्षा और सपनों के लिए बराबर अवसर दें।