Aug 19, 2026 Login

स्पोर्ट्स इन इंडिया:ऐसा क्यों होता है कि ओलम्पिक्स में ही अन्य खेलों की याद आती है? भारत मे खेलो की ऐसी दुर्दशा आखिर क्यों?

Sports in India: Why does it happen that other sports are remembered in the Olympics itself? Why such plight of sports in India?

भारत का राष्ट्रीय खेल हॉकी है लेकिन भारत में क्रिकेट को ही ज़्यादा तवज्जो दी जाती है बाकी खेलो में भारत काफी पिछड़ा हुआ है।जब जब ओलम्पिक्स होते है बाकी खेलो की तरफ तभी ध्यान जाता है।यहाँ तक राष्ट्रीय खेल हॉकी की भी तभी याद आती है।भारत अन्य खेलों में शीर्ष पर कही नही दिखाई देता,ऐसा भी नही है कि हमारे देश में बेहतरीन खिलाड़ी नही है।इसीलिए यहां विचार करने वाली बात है कि भारत में खेलो की ऐसी दुर्दशा आखिर क्यों है?
हमारे देश में योग्यता की कोई कमी नही है,फिर भी युवा खेलो में आगे नही बढ़ पाते इसके पीछे फंड की कमी,सरकार की उदासीनता और कुछ हद तक सामाजिक कुरीतियां भी है।ज़्यादातर लोग समझते है कि"खेलोगे कूदोगे तो बनोगे खराब पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब"।इसी सोच की वजह से बच्चों में खेलो के प्रति रूचि होने के बावजूद भी उन्हें आगे नही बढ़ने दिया जाता।
भारत मे खेलो की दुर्दशा के पीछे एक और बड़ी वजह ये भी है कि यहाँ खेलो में राजनीति, दलालों,और नौकरशाहों की दखलंदाजी ज़्यादा होती है।अच्छे खिलाड़ियों को पीछे धकेल दिया जाता है और धांधलेबाजी कर भाई भतीजावाद किया जाता है।यानी जो खिलाड़ी रसूखदार है या आर्थिक रूप से मजबूत है या किसी बड़े नेता अभिनेता से पहचान है तो उसे खेलो में शीर्ष स्थान पर जगह मिल जाती है वही अगर खिलाड़ी किसी गांव से है और उसका प्रदर्शन भी उत्कृष्ट है उसे आगे बढ़ने का मौका नही दिया जाता ,ऐसे खिलाड़ी लाखो की तादात में आज भी मौजूद है जो आर्थिक रूप से मजबूत नही है ।
सरकार खेलो के लिए नए टैलेंट और बेहतर सुविधाएं मुहैया नही करवा पाती, स्पोर्ट्स के लिए बजट तो देती है पर भ्रष्टाचार की वजह से स्पोर्ट्स बजट का दुरुपयोग होता है प्रतिभावान खिलाड़ियों को मौका नही मिल पाता।जितना बजट मिलता है उस धन एवं सुविधाएं पर्याप्त नही होती,जिसकी वजह से वो सफलता का पैमाना नहीं बना पाती,अगर ऐसा होता तो अरब देशों को पदक तालिका में काफी ऊँचा स्थान मिलना था, खेलों में उत्कृष्टता के लिए राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिबद्धता अनिवार्य है। इसके लिए दूरगामी सोच, सक्रिय योजनायें एवं उनके क्रियान्वयन की आवश्यकता होती है। इन सरकारी प्रयासों के साथ खेलों के प्रति लोगों के दृष्टिकोण को बदलने एवं जागरूकता लाने की भी आवश्यकता है।
सरकार को चाहिए कि शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सुविधाओं में धनराशि बढ़ाकर खेल की क्षमता का विकास करे। अगर चीन का उदाहरण लें तो हम देखते हैं कि 1952 के ओलंपिक में उसने एक भी पदक नहीं जीता था। 32 वर्षों तक ओलंपिक से दूर रहने के बाद 1984 में उसने 15 स्वर्ण पदक जीते। इसी प्रकार रियो में गे्रट ब्रिटेन का प्रदर्शन आश्चर्य का विषय बना हुआ है। सन् 1996 में उसने 15 पदकों में मात्र एक ही स्वर्ण जीता था। इन देशों की सरकारों ने खेल को प्राथमिकता में शामिल कर अपनी नीतियों का निर्माण इस प्रकार लक्ष्य बनाकर किया कि वे लगातार पदक तालिका में आगे बढ़ते चले गए।
खेल मंत्रालय की सामाप्ति के साथ ही राष्ट्रीय खेल परिषद का गठन किया जाए। सरकार इसे वित्तीय सहायता दे, परंतु इसे काम करने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया जाए। खेलों में राष्ट्रीय लक्ष्य को पाने के लिए इस परिषद् में स्वास्थ्य फिटनेस एवं दक्षता से जुड़े अनेक विशेषज्ञ हो, जो भारतीय ओलंपिक संघ के साथ कदम से कदम मिलाकर चलें। खेल परिषद् के कार्यों एवं खेल संघ के निरीक्षण के लिए इनका नियमित ऑडिट आवश्यक होगा। प्रत्येक खेल के लिए लक्ष्य निर्धारित कर उसके अनुरूप धनराशि दी जाएं विफलता की स्थिति में उस खेल की धनराशि को कम कर दिया जाए।भारत को खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए चाहे सालों लग जाएं, लेकिन डोर अगर सही हाथों में रही, तो पतंग को ऊँची उड़ान भरने से कोई नहीं रोक सकता।