नैनीताल अवैध निर्माण:एक ही दिन में खड़े नही हुए अवैध मकान!कैसे लगे बिजली पानी सीवर के कनेक्शन?अवैध निर्माण ध्वस्त करने के साथ साथ क्या भ्रष्ट अधिकारियों पर भी होगी कोई कार्यवाही?

नैनीताल में इनदिनों अवैध निर्माण पर प्राधिकरण का डंडा धड़ाधड़ चल रहा है। नैनीताल कंक्रीट का जंगल न बन जाये इसके लिए नैनीताल के साथ ही सातताल, नौकुचियाताल, भीमताल के संरक्षण के लिए अविभाजित उत्तर प्रदेश में 1986 में झील विकास प्राधिकरण बनाया गया। विकास प्राधिकरण के बाद भी यहां भवन निर्माण में तेजी आती रही। 1901 में नैनीताल में भवनों की संख्या 520 थी, जबकि 1980-81 में 2243 तथा प्राधिकरण बनने के बाद संख्या 2543 हो गई। 2001 में 3950 तथा 2012 में 6800 तक पहुंच गई।अब ये आंकड़ा  और बढ़ चुका है। पिछले 25 सालों में नैनीताल की जितनी दुर्दशा हुई है उतनी पहले कभी नही हुई। आज शहर में मकान ही मकान दिखाई देते है जो किसी भी लिहाज से  सही नही ठहराए जा सकते। 

वर्तमान समय मे जब मीडिया सिर्फ अखबारों और चैनलों तक ही सीमित नही रह गया बल्कि सोशल मीडिया में कोई भी घटना तुरंत वायरल हो जाती है। ऐसे में नैनीताल में होने वाले अवैध निर्माण की खबरे, भूस्खलन की वजह से सड़क धंस गयी, नैनीताल खत्म हो रहा है, शहर खतरे की जद में है जैसी खबरे वायरल हुई तब कुमाऊं कमिश्नर भी नींद से जागे और उन्होंने जगह जगह खुद जाकर निरीक्षण करना शुरू कर दिया।

कमिश्नर ने अवैध निर्माणों की भरमार देखकर नाराज़गी जताई, जिस पर सचिव प्राधिकरण पंकज उपाध्याय ने भोले भाले बच्चे की तरह ये कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की कि इन अवैध निर्माणों की जानकारी उन्हें नही है। इसके बाद कमिश्नर के आदेश पर अब प्राधिकरण अवैध निर्माण को सील कर रहा है,और ध्वस्त कर रहा है। प्राधिकरण की यह कार्रवाई अनेक प्रश्न चिंह खड़े कर रही है जिस जगह भी मकानों को प्राधिकरण अवैध बता रहा है , क्या वे एक ही दिन में बन गए? तीन - तीन मंजिले भवन,अंडर ग्राउंड भवन को बनने में सालों लग जाते है।

नैनीताल के स्थानीय लोगों का साफ कहना है कि पहले तो प्राधिकरण के इंजीनियरों ने रिश्वत खा कर भवन खड़े कर दिए जब कमिश्नर ने सख्ती दिखाई तो प्राधिकरण का दस्ता मकानों को ध्वस्त करने निकल पड़ा । जनपद में हजारों भवन बिना मानचित्र के है जिनमें आवासीय व व्यवसायिक दोनों ही शामिल है। प्राधिकरण ने ऐसा जादुई चश्मा लगाया है कि अवैध निर्माण होते समय कुछ दिखाई नही देता बाद में जब उंगलियां उठने लगती है तो फिर निकल पड़ते भवनों को गिराने। सवाल यही खत्म नही होते,बल्कि सवालों की तो लंबी फेहरिस्त है। बिना मानचित्र स्वीकृत किये ग्रीन बेल्ट में जमीनों की रजिस्ट्री कैसी हो जाती है? सीधी सी बात है ये खेल बिना पैसों के लेनदेंन तो होता ही नही होगा। फिर जब उस जमीन पर अवैध निर्माण शुरू किया जाता है तो कामधेनु बन चुका प्राधिकरण सील बंद करने पहुंच जाता है। सील होने के बाद अवैध निर्माण कुछ दिन थम जाता है फिर न जाने ऐसी कौन सी घुट्टी प्राधिकरण पी लेता है कि सील बंद मकान के अंदर अवैध निर्माण पूरा हो जाता है। फिर वहां बिजली पानी सीवर के कनेक्शन तक लग जाते है और लोग आराम से उन मकानों में रहने भी लगते है। ये लोग बाकायदा हाउस टैक्स,सीवर टैक्स,बिजली पानी के पक्के बिल भी जमा करते है। और ये सब तो वैध मकानों में ही लागू होता है अवैध मकानों में नही। तो क्या प्राधिकरण और नगर पालिका इन अवैध मकानों को वैध  मानती है?  
नैनीताल के पर्यावरण प्रेमियों का आरोप है कि प्राधिकरण के अधिकारियों,इंजीनियरों को पैसा दिए बगैर कोई व्यक्ति एक कमरे का निर्माण बालकानी का निर्माण ,लकड़ी के दरवाजे के स्थान पर शटर या लोहे अथवा स्टील का गेट नहीं लगा सकता तो फिर कई - कई मंजिल भवन का निर्माण कैसे सम्भव है । स्पष्ट है कि अवैध भवनों के निर्माण में प्राधिकरण के रिश्वतखोर अधिकारियों का हाथ है , इसलिए अवैध भवन निर्माण को प्रोत्साहन देने वाले भ्रष्ट अधिकारियों के घरों पर भी छापामारी करके कार्रवाई होनी चाहिए,उन पर भी जांच बैठनी चाहिए।

 

आपको बता दें  नैनीताल झील विकास प्राधिकरण हटाने के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन हुआ हो चुका है। नैनीताल  बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले नब्बे के दशक में आंदोलन चला। पर्यावरण प्रेमियों का आरोप है कि प्राधिकरण बनने से आम आदमी का घर बनाना, मरम्मत करना मुश्किल हो गया जबकि रसूखदार आलीशान कोठियां बना रहे हैं,प्राधिकरण अपना ज़ोर केवल आम जनता पर चलाता है उन्हीं के आशियाने तबाह करने पर तुला है जबकि बड़े बिजनेसमैन हो या रसूखदार उन पर कार्यवाही नही करता।संवेदनशील व ग्रीन बेल्ट घोषित क्षेत्र में तक व्यावसायिक निर्माण किये गए हैं। जानकारों के अनुसार प्राधिकरण ने आम आदमी के घर का सपना तोड़ दिया जबकि रसूखदार रातों रात अवैध निर्माण करते हैं, प्राधिकरण उसे सील करता है। बाद में जुर्माना भरने के बाद अवैध को वैध कर दिया जाता है। जो अवैध निर्माण यहां से कम्पाउंड नहीं होता, वो शासन से हो जाता है।