तीन बेटियों को पढ़ा-लिखाकर बनाया काबिल, मगर आखिरी सफर में रह गए अकेले! वीडियो कॉल पर हुई पिता की अंतिम विदाई, रिश्तों को झकझोर देने वाली कहानी
सोनीपत। हरियाणा के सोनीपत से सामने आई एक घटना ने बदलते पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक मूल्यों पर नई बहस छेड़ दी है। कभी कपड़ों के बड़े कारोबारी रहे शिवचरण रामरतन गुप्ता ने अपनी तीनों बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलाई, उन्हें आत्मनिर्भर बनाया और जीवनभर उनके बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष किया। लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव में उन्हें वृद्धाश्रम का सहारा लेना पड़ा। सबसे भावुक और चर्चा का विषय बनने वाला पहलू यह रहा कि उनके निधन के बाद अंतिम संस्कार में उनकी कोई भी बेटी शामिल नहीं हो सकी और पिता की अंतिम विदाई उन्होंने वीडियो कॉल के माध्यम से देखी। हालांकि, इस पूरे मामले में बेटियों की ओर से सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत पक्ष सामने नहीं आया है। इसलिए उनके निर्णय के पीछे की वास्तविक परिस्थितियां अभी स्पष्ट नहीं हैं। 'अपना घर' आश्रम की संचालिका सारिका कालरा के अनुसार, शिवचरण रामरतन गुप्ता मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले थे। कपड़ों के व्यवसाय में लंबे समय तक सफल रहने के बाद उन्हें भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा। कारोबार ठप होने के साथ ही पारिवारिक और आर्थिक कठिनाइयां बढ़ती चली गईं। इन्हीं परिस्थितियों के बीच वर्ष 2024 में वे सोनीपत के ककरोई गांव पहुंचे, जहां उनके कुछ रिश्तेदार रहते थे। बाद में उन्होंने अपनी इच्छा से 'अपना घर' आश्रम में रहने का निर्णय लिया। आश्रम प्रबंधन ने उनकी परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें रहने की अनुमति दे दी।
पत्नी भी पहुंचीं आश्रम, यहीं हो गया निधन
कुछ समय बाद शिवचरण अपनी पत्नी मीना गुप्ता को भी आश्रम लेकर आए। आश्रम प्रबंधन के अनुसार, मीना गुप्ता लंबे समय से मानसिक तनाव से गुजर रही थीं। कारोबार बंद होने और पारिवारिक परिस्थितियों ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी थी। दोनों पति-पत्नी आश्रम में एक-दूसरे का सहारा बनकर रहने लगे। लेकिन 12 अक्टूबर 2024 को आश्रम में ही मीना गुप्ता का निधन हो गया। आश्रम प्रबंधन ने तत्काल तीनों बेटियों को सूचना दी और अंतिम संस्कार में आने का अनुरोध किया। प्रबंधन के अनुसार उस समय भी कोई बेटी अंतिम संस्कार में नहीं पहुंची। इसके बाद शिवचरण ने स्वयं आश्रम के कर्मचारियों के साथ मिलकर अपनी पत्नी का अंतिम संस्कार किया और बाद में हरिद्वार जाकर उनकी अस्थियों का विसर्जन भी किया।
तीनों बेटियों से रोज होती थी बात
आश्रम संचालिका सारिका कालरा बताती हैं कि शिवचरण अपनी तीनों बेटियों से बेहद स्नेह करते थे। उनकी एक बेटी नेपाल में, दूसरी गुजरात के सूरत में और तीसरी उत्तर प्रदेश में रहती है। दो बेटियां शिक्षिका हैं, जबकि एक निजी बैंक में कार्यरत है। आश्रम के अनुसार, शिवचरण दिन में दो-तीन बार अपनी बेटियों से वीडियो कॉल पर बातचीत करते थे। वे उनकी हर छोटी-बड़ी उपलब्धि पर खुश होते थे और हमेशा उम्मीद रखते थे कि एक दिन पूरा परिवार फिर से साथ बैठेगा। सारिका कालरा के अनुसार, बड़ी बेटी समय-समय पर पिता की जरूरतों के बारे में जानकारी लेती थीं। वर्ष 2025 में वह आश्रम भी आई थीं और कुछ समय तक अपने पिता के साथ रहीं। जरूरत पड़ने पर दवाइयों, कपड़ों और अन्य सामान की व्यवस्था कराने की भी बात करती थीं।
फिर से कारोबार शुरू करने का था सपना
आर्थिक संकट के बावजूद शिवचरण ने उम्मीद नहीं छोड़ी थी। आश्रम में रहने के दौरान वे अक्सर कहते थे कि यदि थोड़ा सहयोग मिल जाए तो वे फिर से एक छोटी कपड़ों की दुकान खोलना चाहते हैं। उनका विश्वास था कि मेहनत के दम पर वे दोबारा आत्मनिर्भर बन सकते हैं। हालांकि उन्होंने अपने कारोबार में हुए नुकसान का जिक्र तो किया, लेकिन उसके पीछे की पूरी वजह कभी सार्वजनिक नहीं की। उन्होंने आश्रम प्रबंधन से यह भी अनुरोध किया था कि उनकी निजी जिंदगी को सोशल मीडिया पर साझा न किया जाए। 12 मार्च 2026 को शिवचरण आश्रम से यह कहकर गए कि उन्हें दिल्ली में कुछ लोगों से पैसे लेने हैं और अपनी कुछ संपत्तियों से जुड़े मामलों का निपटारा करना है। उन्होंने आश्रम प्रबंधन से कहा था कि इसके बाद वे वापस लौटेंगे और सोनीपत में एक छोटी कपड़ों की दुकान शुरू करेंगे। बाद में आश्रम को जानकारी मिली कि वे किसी अन्य आश्रम में रहने लगे हैं। आश्रम प्रबंधन ने उनसे संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन बात नहीं हो सकी।
बीमारी की सूचना के बाद भी नहीं पहुंचा कोई
आश्रम प्रबंधन के अनुसार, शिवचरण की तबीयत बिगड़ने पर करीब 20 दिन पहले उनकी तीनों बेटियों को सूचना दी गई थी। चार दिन पहले भी उन्हें बताया गया कि उनके पिता गंभीर रूप से बीमार हैं और उनसे मिलना चाहते हैं। प्रबंधन का कहना है कि इसके बावजूद कोई भी बेटी उनसे मिलने नहीं पहुंची।
वीडियो कॉल पर हुई अंतिम विदाई
मंगलवार देर रात शिवचरण रामरतन गुप्ता का निधन हो गया। इसके बाद एक बार फिर तीनों बेटियों को सूचना देकर अंतिम संस्कार में शामिल होने का अनुरोध किया गया। आश्रम प्रबंधन के अनुसार, उन्होंने दूरी और समय की बाधाओं का हवाला देते हुए आने में असमर्थता जताई। बड़ी बेटी ने ऑनलाइन 5100 रुपये भेजते हुए पिता का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार करने का अनुरोध किया। हालांकि आश्रम प्रबंधन ने वह राशि वापस लौटा दी और अपने स्तर पर अंतिम संस्कार की पूरी व्यवस्था की। सबसे भावुक दृश्य तब सामने आया जब तीनों बेटियों ने वीडियो कॉल के माध्यम से अपने पिता की अंतिम विदाई देखी। बाद में उन्होंने अंतिम संस्कार का वीडियो और अस्थि विसर्जन की जानकारी भी मांगी तथा आग्रह किया कि आश्रम ही विसर्जन की प्रक्रिया पूरी कर दे।
समाजसेवी बोले- पहली बार देखा ऐसा दृश्य
आश्रम से जुड़े एक समाजसेवी ने बताया कि अपने जीवन में उन्होंने पहली बार ऐसा मामला देखा, जब किसी परिवार को वीडियो कॉल पर अंतिम संस्कार दिखाना पड़ा। उनके अनुसार यह अनुभव बेहद भावुक और दुखद था। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी घटना को केवल एक पक्ष के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। बेटियों की ओर से अब तक विस्तृत प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं आई है, इसलिए उनके निर्णय के पीछे की परिस्थितियों को जाने बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।