हनुमान अंश: न आंखों की रोशनी, न बड़े मंच की तलाश! तंबूरे की धुन और भक्ति की आवाज ने बना दिया स्टार, एक भजन से चमकी सुनील लोधी की किस्मत
नई दिल्ली। कहते हैं कि हुनर को किसी पहचान की जरूरत नहीं होती, उसे बस एक मौके की तलाश होती है। ऐसा ही कुछ बुंदेलखंड के एक छोटे से गांव से निकलकर संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बना रहे नेत्रहीन गायक सुनील लोधी के साथ हुआ है। जन्म से आंखों की रोशनी नहीं होने के बावजूद सुनील ने कभी इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने संगीत और भक्ति को ही अपनी दुनिया बनाया और आज उनकी आवाज बड़े पर्दे तक पहुंच चुकी है। फिल्म ‘हनुमान अंश’ में सुनील लोधी की आवाज में गाया गया भजन ‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान’ दर्शकों के बीच खूब पसंद किया जा रहा है। न कोई बड़ा फिल्मी नाम, न कोई चमक-दमक और न ही बड़े मंच से शुरुआत... बल्कि एक तंबूरा और भक्ति में डूबी आवाज ने सुनील को लोगों के बीच पहचान दिला दी है। फिल्म के भजन को मिल रहे प्यार के बाद सुनील की कहानी भी चर्चा में आ गई है। सुनील लोधी का जन्म बुंदेलखंड के एक छोटे से गांव में एक साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में हुआ। उनका परिवार खेती-किसानी के जरिए अपना जीवन यापन करता था। सुनील जन्म से ही नेत्रहीन थे। परिवार ने उनकी आंखों की रोशनी लौटाने के लिए इलाज भी कराया, लेकिन उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो सका। आर्थिक तंगी और आंखों की रोशनी न होने के कारण उनकी पढ़ाई भी पूरी नहीं हो पाई। जिंदगी में मुश्किलें कम नहीं थीं, लेकिन सुनील ने परिस्थितियों के सामने हार मानने के बजाय संगीत को अपना सहारा बनाया। धीरे-धीरे भजन और लोकगीत उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गए। गांव की चौपाल हो या धार्मिक आयोजन, सुनील अपनी आवाज और पारंपरिक तंबूरे के साथ लोगों के बीच पहुंच जाते। बुंदेली लोकगीत और भक्ति गीत उनकी पहचान बनते गए। उनके पास न कोई बड़ा मंच था और न ही किसी फिल्मी दुनिया से जुड़ा सहारा। फिर भी उनकी आवाज सुनने वालों के दिल तक पहुंचती रही।
तंबूरा बना साथी, भक्ति बनी पहचान
सुनील की गायकी की सबसे खास बात उनकी सादगी है। पारंपरिक तंबूरा हाथ में लेकर जब वह भक्ति गीत गाते हैं तो उनकी आवाज में बुंदेलखंड की मिट्टी, लोक संस्कृति और भक्ति की गहराई सुनाई देती है। उन्होंने स्थानीय धार्मिक कार्यक्रमों और गांव-कस्बों में गाकर अपनी कला को निखारा। कई बार ट्रेनों और छोटे स्थानीय आयोजनों में भी उन्होंने भजन गाए। उनकी जिंदगी लंबे समय तक इसी तरह चलती रही। वह गाते रहे और लोग सुनते रहे। लेकिन सुनील की आवाज को गांव और आसपास के इलाकों से बाहर पहचान मिलने की शुरुआत सोशल मीडिया के जरिए हुई।
2019 में बदली कहानी, यूट्यूबर ने दुनिया तक पहुंचाई आवाज
सुनील की जिंदगी में बड़ा बदलाव साल 2019 के आसपास आया, जब उनकी मुलाकात यूट्यूबर रोहित साहू से हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, रोहित ने सुनील को भजन और लोकगीत गाते हुए सुना तो उनकी प्रतिभा से प्रभावित हुए। इसके बाद उन्होंने सुनील की गायकी को रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया और यूट्यूब पर साझा करना शुरू किया। देखते ही देखते सुनील की देसी और भावपूर्ण आवाज लोगों तक पहुंचने लगी। उनके बुंदेली गीतों और भजनों को इंटरनेट पर बड़ी संख्या में लोगों ने सुना। जिस आवाज को अब तक गांव की चौपालों और धार्मिक आयोजनों तक सीमित समझा जाता था, वही आवाज धीरे-धीरे सोशल मीडिया के जरिए हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचने लगी। सुनील लोधी की लोकप्रियता को सबसे बड़ा उछाल उनके पारंपरिक हनुमान भजन ‘ओ मोरे संकट के कटैया हनुमान’ से मिला। तंबूरे की सादगी और सुनील की देसी आवाज में रिकॉर्ड किए गए इस भजन को सोशल मीडिया पर लोगों का जबरदस्त प्यार मिला। भजन के वीडियो को बड़ी संख्या में लोगों ने देखा और सुना। उनकी आवाज लोगों को इतनी पसंद आई कि सोशल मीडिया पर सुनील लोधी को लेकर उत्सुकता बढ़ने लगी। लोग उस गायक के बारे में जानना चाहते थे, जिसकी आवाज में बिना किसी बड़े संगीत संयोजन के भी इतनी गहराई और अपनापन सुनाई देता था। यही वायरल पहचान आगे चलकर सुनील के लिए फिल्मी दुनिया का दरवाजा खोलने वाली साबित हुई।
सोशल मीडिया से सीधे फिल्म तक पहुंची आवाज
सुनील का वायरल भजन फिल्म ‘हनुमान अंश’ के मेकर्स तक पहुंचा। उनकी आवाज और भक्ति संगीत की शैली ने फिल्म निर्माताओं का ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद सुनील को भक्ति गीत रिकॉर्ड करने के लिए मुंबई बुलाया गया। यह उनके लिए किसी सपने से कम नहीं था। जिस व्यक्ति ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा गांव की चौपालों, धार्मिक आयोजनों और स्थानीय मंचों पर तंबूरा बजाते हुए भजन गाकर बिताया, उसकी आवाज अब बड़े पर्दे की फिल्म का हिस्सा बनने जा रही थी। फिल्म में सुनील की आवाज में गाया गया भजन ‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान’ अब दर्शकों के बीच चर्चा में है। भजन को मिल रहे प्यार ने सुनील की पहचान को एक नई ऊंचाई दी है।
न स्टारडम की चाह, न दिखावे की दुनिया
सुनील की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने स्टार बनने के लिए किसी बड़े मंच से शुरुआत नहीं की। उन्होंने अपनी कला को अपने गांव और आसपास के लोगों के बीच जिया। उनकी आवाज सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंची और फिर फिल्म तक जा पहुंची। उनकी सफलता यह भी बताती है कि आज के दौर में प्रतिभा को सामने आने के लिए हमेशा बड़े शहर या बड़े मंच की जरूरत नहीं होती। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने ऐसे कलाकारों के लिए नए रास्ते खोले हैं, जिनकी प्रतिभा कभी स्थानीय सीमाओं में ही सिमटकर रह जाती थी। सुनील लोधी की कहानी में संघर्ष है, आर्थिक कठिनाइयां हैं, आंखों की रोशनी का अभाव है, लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ी चीज है उनका संगीत के प्रति समर्पण। सुनील भले ही दुनिया को आंखों से नहीं देख पाते, लेकिन उन्होंने अपनी आवाज के जरिए लोगों के दिलों में जगह बना ली है। तंबूरे की धुन के साथ उनकी आवाज अब गांव की चौपालों से निकलकर फिल्मी पर्दे तक पहुंच चुकी है। ‘हनुमान अंश’ के भजन ने उन्हें नई पहचान दी है और उनकी जिंदगी में एक नया अध्याय शुरू किया है। कभी जिनकी गायकी कुछ स्थानीय लोगों और धार्मिक आयोजनों तक सीमित थी, आज वही आवाज सोशल मीडिया से लेकर सिनेमा तक सुनी जा रही है।