संपादकीयः एथेनॉल पर बहस! क्या भारत ने ब्राज़ील का मॉडल अपनाया या केवल उसका नारा?

Editorial: The Debate on Ethanol! Did India Adopt Brazil's Model or Merely Its Slogan?

-सुनील मेहता-

भारत में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20) को लेकर बहस लगातार तेज होती जा रही है। एक ओर सरकार इसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता, विदेशी मुद्रा की बचत, किसानों की आय बढ़ाने और प्रदूषण कम करने का माध्यम बता रही है, वहीं दूसरी ओर लाखों वाहन मालिक यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या इस नीति का बोझ उन नागरिकों पर डाला गया है जिन्होंने वर्षों पहले अपनी मेहनत की कमाई से ऐसी गाड़ियाँ खरीदी थीं, जो E20 के लिए बनाई ही नहीं गई थीं।

हाल में कुछ समाचार पत्रों और सरकारी बयानों में ब्राज़ील का उदाहरण देकर यह साबित करने का प्रयास किया गया कि यदि ब्राज़ील में 27 प्रतिशत तक एथेनॉल मिश्रण सफल है तो भारत में भी इसका विरोध अनुचित है, लेकिन यह तुलना जितनी सरल दिखाई जाती है, वास्तविकता उतनी ही जटिल है। ब्राज़ील का मॉडल केवल "27 प्रतिशत एथेनॉल" नहीं है। वहाँ दशकों पहले से वाहन उद्योग, ईंधन वितरण प्रणाली, फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक और उपभोक्ता विकल्पों का विकास साथ-साथ हुआ। अधिकांश वाहन उसी मिश्रण के अनुरूप बनाए गए। अनेक स्थानों पर उपभोक्ता के पास अलग-अलग प्रकार का ईंधन चुनने का विकल्प भी उपलब्ध है। अर्थात पहले व्यवस्था तैयार हुई, फिर नीति लागू हुई।

भारत ने इसके विपरीत पहले ईंधन बदल दिया और बाद में वाहन उद्योग से कहा कि अब गाड़ियाँ उसके अनुरूप बनाई जाएँ। यही वह मूल प्रश्न है, जिसका उत्तर सरकार और नीति निर्माताओं को देना चाहिए।सरकार का दावा है कि E20 से तेल आयात कम होगा, किसानों की आय बढ़ेगी और प्रदूषण घटेगा। इन उद्देश्यों पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। ऊर्जा सुरक्षा हर देश की आवश्यकता है। लेकिन क्या किसी अच्छी नीति को लागू करने का तरीका भी उतना ही अच्छा था?

देश में करोड़ों दोपहिया और चारपहिया वाहन ऐसे हैं जिन्हें E5 या E10 के अनुरूप डिजाइन किया गया था। अनेक वाहन निर्माता स्वयं अपनी पुरानी गाड़ियों के लिए सीमित एथेनॉल मिश्रण की सलाह देते रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पुराने वाहनों में अधिक एथेनॉल मिश्रण से ईंधन दक्षता में कमी, रबर और प्लास्टिक के पुर्जों पर प्रभाव तथा दीर्घकालिक रखरखाव संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। सरकार और वाहन निर्माता इन आशंकाओं को सीमित बताते हैं, जबकि अनेक उपभोक्ता माइलेज घटने और प्रदर्शन प्रभावित होने की शिकायत कर रहे हैं। यह विवाद अभी भी सार्वजनिक बहस का विषय बना हुआ है।

यदि सरकार को अपनी नीति पर इतना विश्वास था तो सबसे पहले देश में E20-अनुकूल वाहनों की पर्याप्त संख्या सुनिश्चित की जानी चाहिए थी। उसके बाद धीरे-धीरे एथेनॉल मिश्रण बढ़ाया जाता। इससे उपभोक्ताओं पर अचानक बोझ नहीं पड़ता। दूसरा बड़ा प्रश्न है—विकल्प का। यदि कोई नागरिक अपनी पुरानी कार या मोटरसाइकिल के लिए बिना एथेनॉल वाला पेट्रोल खरीदना चाहता है तो उसके पास विकल्प क्यों नहीं है? दुनिया के कई देशों में अलग-अलग मिश्रण उपलब्ध हैं ताकि उपभोक्ता अपनी आवश्यकता के अनुसार चुनाव कर सके। भारत में यह विकल्प लगभग समाप्त हो चुका है। नीति का उद्देश्य चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, लोकतांत्रिक व्यवस्था में उपभोक्ता की पसंद भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

एथेनॉल सामान्यतः पेट्रोल की तुलना में सस्ता उत्पादन माना जाता है। कई देशों में अधिक एथेनॉल मिश्रण के साथ ईंधन मूल्य निर्धारण की अलग व्यवस्था देखने को मिलती है। भारत में उपभोक्ता पूछ रहे हैं कि यदि पेट्रोल में अपेक्षाकृत सस्ता घटक मिलाया जा रहा है तो खुदरा कीमतों में उसका लाभ क्यों दिखाई नहीं देता? यदि माइलेज भी कुछ कम होता है तो उपभोक्ता की वास्तविक लागत और बढ़ जाती है। इस प्रश्न का स्पष्ट और पारदर्शी उत्तर सरकार को देना चाहिए।

इस पूरी बहस में सबसे संवेदनशील विषय हितों के टकराव (Conflict of Interest) का है। विपक्ष और कुछ सामाजिक संगठनों ने समय-समय पर आरोप लगाए हैं कि एथेनॉल उद्योग से जुड़े कुछ निजी व्यावसायिक हितों को इस नीति से लाभ हुआ है तथा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के परिवार से जुड़े व्यावसायिक हितों पर भी सवाल उठाए गए हैं। मंत्री गडकरी ने इन सभी आरोपों को स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया है और कहा है कि सरकार ने किसी को विशेष लाभ नहीं पहुँचाया तथा एथेनॉल नीति किसानों और देशहित में बनाई गई है।

लोकतंत्र में केवल आरोप या केवल खंडन पर्याप्त नहीं होते। आवश्यक यह है कि नीति निर्माण पूरी तरह पारदर्शी हो। यदि किसी मंत्री के परिवार का किसी ऐसे उद्योग से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध हो जिसे सरकारी नीति से लाभ मिल सकता है, तो सरकार को स्वयं आगे बढ़कर सभी तथ्यों को सार्वजनिक करना चाहिए। इससे न केवल सरकार की विश्वसनीयता बढ़ती है बल्कि जनता का विश्वास भी मजबूत होता है। 

अमर उजाला जैसे कई समाचार माध्यमों ने ब्राज़ील का उदाहरण देकर एथेनॉल नीति का समर्थन किया है। लेकिन पत्रकारिता का दायित्व केवल सरकार के तर्क दोहराना नहीं, बल्कि नागरिकों के प्रश्न भी उठाना है। यदि लाखों लोग माइलेज कम होने, इंजन संबंधी आशंकाओं और विकल्प समाप्त होने की शिकायत कर रहे हैं तो उनकी आवाज़ को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए। संपादकीय का उद्देश्य किसी नीति का प्रचार करना नहीं, बल्कि उसके हर पक्ष की निष्पक्ष समीक्षा करना है।

सरकार यह भी कहती है कि एथेनॉल से किसानों की आय बढ़ी है। यह स्वागतयोग्य है। परंतु नीति निर्माण का सिद्धांत यह नहीं हो सकता कि एक वर्ग को लाभ पहुँचाने के लिए दूसरे वर्ग पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया जाए। यदि किसान लाभान्वित हों तो वाहन मालिकों की सुरक्षा और आर्थिक हित भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। आज आवश्यकता किसी पक्ष या विपक्ष की नहीं, बल्कि संतुलित समाधान की है।

सरकार को चाहिए कि जब तक देश का अधिकांश वाहन बेड़ा E20-अनुकूल नहीं हो जाता, तब तक सीमित मात्रा में बिना एथेनॉल वाला पेट्रोल भी उपलब्ध कराया जाए। पुराने वाहनों के लिए स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन सार्वजनिक किए जाएँ। ईंधन मूल्य निर्धारण का पूरा गणित जनता के सामने रखा जाए। यदि एथेनॉल से वास्तव में लागत कम होती है तो उसका लाभ उपभोक्ता तक पहुँचना चाहिए। साथ ही, किसी भी संभावित हितों के टकराव पर पूर्ण पारदर्शिता अपनाई जाए ताकि नीति पर अनावश्यक संदेह समाप्त हो।

ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की समृद्धि और स्वच्छ पर्यावरण—इन तीनों लक्ष्यों का विरोध कोई नहीं करता। प्रश्न केवल इतना है कि क्या इन लक्ष्यों को प्राप्त करने का रास्ता ऐसा होना चाहिए जिसमें करोड़ों उपभोक्ताओं को बिना पर्याप्त तैयारी, बिना विकल्प और बिना स्पष्ट आर्थिक लाभ के नई व्यवस्था स्वीकार करनी पड़े? एक सफल नीति वही होती है जो केवल सरकार को नहीं, बल्कि नागरिकों को भी न्यायपूर्ण और पारदर्शी लगे। एथेनॉल की बहस में आज सबसे अधिक आवश्यकता इसी विश्वास की है।