अल्मोड़ा ने नम आंखों से दी वीर सपूत को विदाई: राजौरी में शहीद हुए लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी सैन्य सम्मान के साथ पंचतत्व में विलीन

Almora bids tearful farewell to its brave son: Lieutenant Bireshwar Goswami, martyred in Rajouri, laid to rest with full military honors.

जम्मू-कश्मीर के राजौरी क्षेत्र में आतंकियों के खिलाफ सैन्य अभियान के दौरान अदम्य साहस का परिचय देते हुए देश पर प्राण न्योछावर करने वाले अल्मोड़ा के वीर सपूत लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी रविवार को पंचतत्व में विलीन हो गए। शहीद का पार्थिव शरीर रविवार को पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनके गृह जनपद अल्मोड़ा लाया गया, जहां पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रहे और हर नागरिक की आंखें नम थीं। विश्वनाथ घाट पर सेना के 'गार्ड ऑफ ऑनर' और गगनभेदी नारों के बीच इस जांबाज सैन्य अधिकारी का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। मात्र 25 वर्ष की अल्पायु में शहादत का जाम पीने वाले लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी सेना के एक बेहद होनहार और चमकीले भविष्य वाले अधिकारी थे। परिवार के आंसुओं के बीच एक ऐसा सच सामने आया जिसने वहां मौजूद हर शख्स का कलेजा चीर दिया। 

परिजनों ने बताया कि सोमवार को ही बीरेश्वर का पदोन्नति (प्रमोशन) आदेश आने वाला था और वे 'कैप्टन' बनने वाले थे। यही नहीं, परिवार को जुलाई के महीने में उनके छुट्टी पर घर आने का बेसब्री से इंतजार था। घरवाले उनकी अगवानी की तैयारियां कर रहे थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था; प्रमोशन के आदेश और खुद बीरेश्वर के आने से पहले उनका पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटकर पांडेखोला पहुंचा। रविवार दोपहर करीब तीन बजे सेना का विशेष हेलिकॉप्टर अल्मोड़ा आर्मी हेलीपैड पर उतरा। तिरंगे में लिपटे वीर सपूत के पार्थिव शरीर को देखते ही वहां मौजूद प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और सेना के जवानों ने सेल्यूट कर श्रद्धांजलि दी। इसके बाद शव को उनके पैतृक आवास पांडेखोला ले जाया गया। अपने लाडले और होनहार बेटे को कफन में लिपटा देख मां सुध-बुध खो बैठीं। परिजनों और ढाढस बंधा रहे लोगों की आंखें भी मां के इस करुण क्रंदन को देखकर छलक उठीं। आसपास के गांवों के हजारों लोग अपने इस नायक को अंतिम सलामी देने उनके घर के बाहर डटे रहे। पैतृक आवास पर अंतिम दर्शन के बाद सेना के विशेष वाहन से शवयात्रा विश्वनाथ घाट के लिए रवाना हुई। पूरी शवयात्रा के दौरान 'जब तक सूरज चांद रहेगा, बीरेश्वर तेरा नाम रहेगा' और 'भारत माता की जय' के नारे गूंजते रहे। घाट पर भारतीय सेना के दस्ते ने हवा में गोलियां दागकर अपने साथी अधिकारी को अंतिम सलामी (गार्ड ऑफ ऑनर) दी। इसके बाद सैन्य परंपराओं के अनुसार, शहीद के दोनों चाचाओं—कैलाश गोस्वामी और जगदीश गोस्वामी ने रोते हुए मुखाग्नि दी। उत्तराखंड के इस लाल ने देश की अखंडता के लिए जो बलिदान दिया है, उसे यह देवभूमि कभी नहीं भूलेगी।