पूर्णिमा के समय आखिर क्यों बढ़ जाती है आत्महत्या की घटनाएं? बुराड़ी कांड याद है? जब एक ही परिवार के 11 लोगों ने की थी सामुहिक आत्महत्या! ज्योतिष शास्त्र, विज्ञान और मनोविज्ञान पूर्णिमा के समय आत्महत्या को लेकर क्या कहते हैं? जानिए लिंक मे

Why do suicide incidents increase during full moon? Remember the Burari incident? When 11 people of the same family committed mass suicide! What does astrology, science and psychology say about suici

पूनम की रात यानी पूर्णिमा की रात! इस रात से आत्महत्याओं का  बड़ा ही गहरा नाता है। और ये बात न सिर्फ ज्योतिष शास्त्र, बल्कि विज्ञान भी मानने लगी है।

गौतम बुद्ध स्वयं पूर्णिमा के दिन ही पैदा हुए थे और पूर्णिमा के दिन ही उनकी मृत्यु भी हुई थी।इसी संयोग से चन्द्रमा बुद्ध का प्रतीक भी माना जाता है।

पूर्णिमा की रात और पूर्णिमा आने से पहले ही चन्द्रमा का प्रभाव इतना अधिक बढ़ जाता है कि लोग आत्महत्या की ओर अग्रसर होने लगते है। इसके पीछे के ज्योतिष शास्त्र और विज्ञान को बताने से पहले आपको कुछ आत्महत्याओं के बारे में बताते है जो खास पूर्णिमा के दिन ही हुई थी।

 

दिल्ली के बुराड़ी कांड को 5 साल हो गए है,जिसने सभी के रौंगटे खड़े कर दिए थे।

 

1 जुलाई 2018 की सुबह देश ही नहीं बल्कि विदेशी मीडिया के लिए उत्तरी दिल्ली का बुराड़ी इलाका चर्चाओं का विषय बन गया था। आज भी इस घटना को याद कर स्थानीय लोग सिहर उठते हैं। वहां एक साथ घर के 10 लोग फंदे से लटके थे, जबकि घर की सबसे बुजुर्ग महिला का शव एक कमरे से बरामद हुआ था। एक साथ इतने लोगों की आत्महत्या को देखकर जांच दल के भी रोंगटे खड़े हो गए थे। सामुहिक आत्महत्या के लिए इस परिवार ने पूर्णिमा का दिन ही चुना था। जांच में खुलासा हुआ था कि बुराड़ी के चूंडावत परिवार ने एक अनुष्ठान के चक्कर में घर के 11 लोगों की जान दांव पर लगा दी, जिसके बाद सभी की मौत हो गई। दो भाइयों को लगता था कि पिता की आत्मा उन्हें अनुष्ठान के निर्देश देती है, ताकि घर में खुशहाली आ जाए,अंधविश्वास में परिवार ने ये मान लिया था कि पिता की आत्मा ने ही पूर्णिमा के दिन सबको आत्महत्या करने का आदेश दे रहे है।

ये सारी बाते एक डायरी में लिखी थी जो जांच में पुलिस को बरामद हुई थी। कैसे एक इंसान अपनी आंख और मुंह को बंद करके डर के आगे जीत पा सकता है. कैसे इंसान को मुक्ति मिलती है. इंसानी शरीर तो अस्थायी है लेकिन आत्मा स्थायी है और वो कभी नहीं मरती.जांच टीम सूत्रों के मुताबिक 27 और 28 जून यानी पूर्णिमा के दिन भाटिया परिवार के घर में भी पूजा और हवन हुआ था,इसके बाद 30 जून मध्य रात्रि के बाद यह हादसा होने के दावा किया गया। डायरी में एक रिचुअल का पालन करने को कहा गया था. लिखा था कि घर के 11 लोग अगर इस रिचुअल का पालन करेंगे तो उनकी सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी. और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी.डायरी में काफी अजीबो-गरीब बातें लिखी थीं. जिनका सार यह निकल रहा था कि आपको अपना शरीर त्यागने की प्रक्रिया करनी है. लेकिन आप उसमें मरेंगे नहीं. बल्कि, घर के मुखिया भोपाल चुंडावत, जिनकी साल 2007 में मौत हो गई थी. वो आपको बचा लेंगे. साथ ही आपको अपने दर्शन भी देंगे।

बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत  14 जून 2020 यानी पूर्णिमा की दोपहर में मुंबई के बांद्रा स्थित उनके आवास पर मृत पाये गये।मुंबई पुलिस के अनुसार उन्होंने पंखे से फंदा लगाकर आत्महत्या की। उनके अनुसार वे पिछले छह महीने से अवसाद में थे।


यूपी के कानपुर में कबड्डी कोच विक्रांत उपाध्याय विक्रांत उपाध्याय ने 3 जुलाई यानी पूर्णिमा के दिन ही अपने घर में फांसी लगाकर जान दे दी. आत्मघाती कदम उठाने से पहले उसने जीत की हवस नहीं किसी पे कोई बस नहीं ... ' गाने पर रील बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट की थी।

करीब तीन माह पहले दिल्ली के डॉक्टर से मारपीट के मामले के बाद चर्चा में आए बिधनू के करौली सरकार के आश्रम के बाहर एक युवक ने गुरु पूर्णिमा के दिन पेड़ से फंदा लगाकर जान दे दी। पश्चिम बंगाल का यह युवक करौली सरकार डॉ. संतोष भदौरिया से इलाज कराने आया था। 

इन आत्महत्याओं के अलावा भी कई आत्महत्यायें और आकस्मिक निधन पूर्णिमा के दिन या इसके आसपास के दिनों में ही हुए है। ज्योतिष शास्त्र पूर्णिमा और आत्महत्या को लेकर क्या कहता है इससे पहले आपको विज्ञान क्या कहता है ये बताते है क्योंकि विज्ञान तर्क के साथ शोध करता है जिस पर यकीन करना आसान हो जाता है।


अमेरिका (US) की इंडियाना यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मेडिसिन के साइकेट्रिस्ट्स ने इस पर गहन रिसर्च की है. उन्होंने पाया है कि पूर्णिमा पर खुदकुशी से होने वाली मौतों की संख्या बढ़ जाती है. रिसर्चर्स के मुताबिक, पूर्णिमा पर बढ़ी हुई रोशनी उस अवधि में आत्महत्याओं में हुई बढ़ोतरी का कारण हो सकती है. रिसर्च में दावा किया गया है कि परिवेश की रोशनी की दिमाग, शरीर और व्यवहार की बायो क्लॉक तय करने में अहम भूमिका होती है. इससे ये तय होता है कि हम कब जागते और सोते हैं. रात के वक्त, जब अंधेरा होना चाहिए, पूर्णिमा में प्रकाश बढ़ने के कारण लोगों पर उसका प्रभाव पड़ता है.

रिसर्च टीम ने साल 2012-2016 के बीच इंडियाना में हुई खुदकुशी के आंकड़ों का एनालिसिस किया. उन्होंने पाया कि पूर्णिमा के हफ्ते में आत्महत्या से होने वाली मौतों की संख्या काफी बढ़ गई थीं. उन्होंने ये भी पाया कि 55 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में इस दौरान खुदकुशी की घटनाएं और भी अधिक तेजी से बढ़ी हैं.

रिसर्च के अनुसार, आत्महत्या के वक्त और महीनों पर भी ध्यान दिया गया तो पाया कि दोपहर बाद 3-4 बजे के बीच के वक्त और सितंबर महीने में खुदकुशी ज्यादा होती हैं. डिस्कवर मेंटल हेल्थ नामक पत्रिका में पब्लिश रिसर्च में अध्ययन के ऑथर अलेक्जेंडर निकुलेस्कु ने लिखा कि हम इस हाइपोथेसिस का एनालिसिस करना चाहते थे कि पूर्णिमा के आसपास के समय के दौरान खुदकुशी बढ़ जाती है और ये जानना चाहते थे कि क्या उस दौरान खुद की जान लेने के जोखिम वाले मरीजों का ज्यादा ध्यान रखना चाहिए।

एनालिसिस करने पर पता चला कि जो लोग पूर्णिमा वाले हफ्ते में दोपहर 3-4 बजे के बीच सितंबर महीने में खुदकुशी कर सकते हैं, उनमें ब्लड बायोमार्कर नामक एक जीन होता है. ये शरीर की बायो क्लॉक को कंट्रोल करता है. रिसर्चर्स ने कहा कि बायोमार्कर का इस्तेमाल करते हुए पाया कि शराब की लत या डिप्रेशन वाले लोग इस समय की अवधि के दौरान ज्यादा रिस्क में हो सकते हैं.

आइये अब ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भी जानते है कि आखिर पूर्णिमा और आत्महत्याओं का आपस मे क्या कनेक्शन है?


ज्योतिष शास्त्र की माने तो ग्रह दशाओं का परिवर्तन लोगों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर रहा है। अचानक होने वाली आत्महत्याओं की घटनाओं का संबंध ज्योतिष विज्ञान से है। इतना ही नहीं पूर्णिमा के दौरान चांद की स्थितियां बदलने पर भी लोग सुसाइड अटैंप्ट करते हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि कैसे पूर्णिमा की रात करीब आते ही सुसाइड की घटनाएं अचानक से बढ़ जाती हैं?
दरअसल ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक मंगल उन्माद का देवता है। चंद्रमा और मंगल दोनों से इमोशन आते हैं। मंगल प्रतिकूल प्रभाव देता है। जिससे आत्मघाती इमोशन के पैदा होने के कारण सुसाइड की घटनाएं बढ़ती हैं। पूर्णिमा के करीब आने पर जिस तरह से इसका असर ज्चार भाटा पर पड़ता है। उसी तरह से असामान्य व्यवहार होने पर लोग कोई भी आत्मघाती कदम उठा लेते हैं, क्योंकि उस दौरान भावनाएं बलवती हो जाती हैं।पूर्णिमा के लगभग, दिन करीब आने पर उत्तेजना ज्यादा होती है। अतिभावुकता की दशा में जान देने जैसे दुस्साहसी कदम लोग उठा लेते हैं।
पूर्णिमा और इसके आसपास होने वाले परिवर्तन से सुसाइडल इमोशन में बढ़ोत्तरी हो जाती है। डिप्रेशन के शिकार लोग अ‌र्द्धविक्षिप्त हो जाते हैं। असामान्य व्यवहार करने वाले इस दौरान आत्महत्या की राह पर चल पड़ते हैं।


ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में पंचमेष पंचम भाव का स्वामी कमजोर या संक्रमित होता है। उनका चंद्रमा कमजोर या संक्रमित हो जाता है। ऐसे लोगों में आत्महत्या करने की भावना बढ़ जाती है। पूर्णिमा के दौरान यह परिस्थितियां ज्यादा प्रभावी होती हैं। इसी समय शनि के वक्री होने की वजह से अधिकतर लोग अनिद्रा, डिप्रेशन जैसे रोगों से ग्रसित हो जाते हैं। इससे ऐसी परिस्थितियां बन जाती हैं जिससे लोग आत्महत्या करने को मजबूर होते हैं।लोग पागलों वाली हरकते शुरू कर देते है।

 

ओशो भी कहते है कि गौर करे तो पागल को इंग्लिश में लुनेटिक कहते है यानी लूना जो कि चंद्रमा का ही एक शब्द है। चंद्रमा से प्रभावित होकर लोग पागल जैसे हो जाते है। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक चंद्रमा सपने में देखने से मतिभ्रम की स्थिति बनती है। ज्योतिष ये भी कहता है कि मानव शरीर अस्सी प्रतिशत पानी से बना है और जिस तरह समुद्र में ज्वार भाटा उठता है  उसी तरह मनुष्यों में भी भावनाओ के ज्वार भाटे उठते रहते है। 

वही मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि पूर्णिमा के दौरान चांद की स्थितियां बदलने पर आंतरिक उदोलन बढ़ जाता है। इससे बेचैनी और डिप्रेशन की शिकायत हो जाती है। यह एक फैक्टर है इसको लेकर स्टडीज चल रही है। सुसाइड के लिए ज्यादातर महिलाएं अटैंप्ट करती हैं, लेकिन मेल इसको पूरी तरह से फॉलो करते हैं जिससे वे सुसाइड में बच न सकें। महिलाओं में भी कम उम्र की लड़कियां ज्यादा अटैंप्ट करती हैं जबकि मेल में यह खतरा उम्र बढ़ने के साथ बढ़ता है। सुसाइड के लिए महिलाएं कम खतरनाक तरीके अपनाती हैं लेकिन पुरुष हिंसा का सहारा लेकर खुद को खत्म करने की कोशिश करते हैं।