उत्तराखण्डः नैनीताल में 30 और 31 अक्टूबर को सजेगा ‘हिमालयन इकोज़’ का मंच! पर्वतीय देशों के साहित्यकार करेंगे महामंथन
नैनीताल। सरोवर नगरी नैनीताल के ऐतिहासिक एबट्सफोर्ड एस्टेट में 30 और 31 अक्टूबर को हिमालयन इकोज़ साहित्य उत्सव का 11वां संस्करण आयोजित होने जा रहा है। इस बार उत्सव में भारत, नेपाल और भूटान के साथ-साथ स्विट्जरलैंड, फ्रांस और रूस जैसे पर्वतीय देशों के वक्ता भी शामिल होंगे। जलवायु परिवर्तन, जिम्मेदार पर्यटन और पहाड़ी क्षेत्रों की साझा चुनौतियों पर चर्चा के साथ स्थानीय हस्तशिल्प, साहित्य और पारंपरिक खानपान भी आकर्षण का केंद्र रहेंगे। हिमालय की संस्कृति, साहित्य और परंपराओं को अंतरराष्ट्रीय मंच देने वाला हिमालयन इकोज़ साहित्य उत्सव इस वर्ष अपने दूसरे दशक में प्रवेश कर रहा है। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद यानी आईसीसीआर और उत्तराखंड पर्यटन के सहयोग से आयोजित इस उत्सव में दुनिया के विभिन्न पर्वतीय देशों की आवाजें एक मंच पर सुनाई देंगी। उत्सव का उद्घाटन भूटान की चादोर वांगमो और मिथक विशेषज्ञ सुनीता पंत बंसल करेंगी। वहीं, स्विट्जरलैंड के बेंजामिन वियात्ते, जिन्हें ‘वॉकिंग बाबा’ के नाम से जाना जाता है, प्रमुख वक्ताओं में शामिल होंगे। बेंजामिन 18 देशों से होते हुए करीब 14 हजार किलोमीटर की पैदल यात्रा कर भारतीय हिमालय पहुंचे हैं। इसके अलावा रूसी चित्रकार निकोलस रोरिक के विशेषज्ञ व्लादिमीर जैतसेव ‘हिमालयन पैनोरमा’ प्रस्तुत करेंगे। आयोजकों के मुताबिक, इस बार उत्सव का दायरा बढ़ाते हुए दुनिया के विभिन्न पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों को एक मंच पर लाने की पहल की गई है। जलवायु परिवर्तन, पर्यटन के दबाव और पहाड़ों की दूसरी चुनौतियों पर विचार-विमर्श के साथ अलग-अलग देशों के अनुभवों और तकनीकों को साझा करने पर जोर रहेगा। साहित्य के साथ खानपान और हस्तशिल्प भी उत्सव का अहम हिस्सा होंगे। देहरादून की लेखिका रुशीना मुंशा भारतीय चटनियों की विविधता से परिचित कराएंगी। वहीं, कुमाऊंनी हस्तशिल्प, हिमाचली उत्पाद, तराई के पारंपरिक शिल्प और स्थानीय कला से जुड़ी प्रदर्शनियां भी लगाई जाएंगी। पुस्तकों की प्रदर्शनी के जरिए साहित्य प्रेमियों को विविध विषयों की किताबें देखने का अवसर मिलेगा। हिमालयन इकोज़ का उद्देश्य केवल साहित्यिक संवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि विभिन्न पर्वतीय क्षेत्रों की संस्कृति, जीवनशैली और अनुभवों को साझा करते हुए आपसी सहयोग की संभावनाएं तलाशना भी है। ऐसे में नैनीताल में आयोजित होने वाला यह दो दिवसीय उत्सव स्थानीय संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय पहचान देने के साथ पहाड़ों के भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर संवाद का मंच बनेगा।