उत्तराखण्डः सवालों में बिजली विभाग की कार्यप्रणाली? आम उपभोक्ताओं पर सख्ती, नगर निगम पर मेहरबानी! पिथौरागढ़ में नगर निगम का 46 लाख से अधिक का बिल बकाया, उठे सवाल
पिथौरागढ़। उत्तराखण्ड में बिजली विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। पिथौरागढ़ जिले से सामने आया मामला न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करता है, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि क्या कानून और नियम सभी के लिए बराबर हैं। एक तरफ आम उपभोक्ताओं के बिजली बिल में थोड़ी सी देरी होते ही कनेक्शन काटने की चेतावनी दी जाती है, तो वहीं दूसरी ओर नगर निगम पर 46 लाख रुपये से ज्यादा का बिजली बिल बकाया होने के बावजूद विभाग पूरी तरह खामोश नजर आ रहा है। दरअसल, पिथौरागढ़ नगर निगम पर उत्तराखण्ड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) का कुल 46 लाख 97 हजार 784 रुपये का बिजली बिल बकाया है। यह खुलासा आरटीआई कार्यकर्ता लक्ष्मी दत्त जोशी द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी से हुआ है। यहां सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब आम नागरिक दो-तीन महीने का बिजली बिल जमा नहीं कर पाता, तो विभाग तत्काल नोटिस जारी कर देता है और कनेक्शन काटने की कार्रवाई भी कर देता है, लेकिन जब नगर निगम जैसे बड़े सरकारी निकाय पर लाखों रुपये बकाया हों, तब आखिर बिजली विभाग की सख्ती कहां गायब हो जाती है? आरटीआई कार्यकर्ता लक्ष्मी दत्त जोशी के मुताबिक शहर के विभिन्न इलाकों में नगर निगम के बिजली पोलों पर लगी स्ट्रीट लाइटें दिनभर जलती रहती हैं। कई बार इस समस्या को लेकर संबंधित विभागों और नगर निगम को शिकायतें भी की गईं, लेकिन किसी ने भी इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। लक्ष्मी दत्त जोशी का कहना है कि जब बार-बार शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो उन्होंने आरटीआई का सहारा लिया। आरटीआई के जरिए मिली जानकारी ने न सिर्फ नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए, बल्कि बिजली विभाग की भूमिका को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर आम उपभोक्ता पर नियम लागू होते हैं, तो वही नियम नगर निगम पर क्यों नहीं? क्या सरकारी संस्थानों के लिए अलग कानून है? क्या बिजली विभाग सिर्फ आम जनता पर ही अपनी सख्ती दिखाता है? अब देखने वाली बात यह होगी कि आरटीआई से हुआ यह खुलासा महज कागजों तक सीमित रह जाता है या फिर बिजली विभाग और नगर निगम इस पर कोई ठोस कार्रवाई करते हैं। फिलहाल यह मामला बिजली विभाग की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक जवाबदेही, समान कानून व्यवस्था और नगर निगम की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है।
