उत्तराखण्डः हाईकोर्ट में गंगा किनारे अवैध खनन पर सख्त रुख! 34 स्टोन क्रशरों के प्रार्थनापत्र पर मातृ सदन से दो सप्ताह में जवाब तलब, अगली सुनवाई 12 मार्च को
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हरिद्वार में रायवाला से भोगपुर व कुम्भ मेला क्षेत्र में गंगा नदी के किनारे हो रहे अवैध खनन के खिलाफ मातृ सदन हरिद्वार की जनहित याचिका पर सुनवाई की।
मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने मातृ सदन से कहा है कि जिन 34 स्टोन क्रेशरों ने अपने भंडारण से माल बेचने व मशीन बेचने की गुहार प्रार्थनापत्र देकर लगाई है, उसपर आपको कुछ कहना है तो दो सप्ताह के भीतर अपना उत्तर दें। दरअसल पूर्व में उच्च न्यायालय ने एक आदेश पारित कर हरिद्वार में कई स्टोन क्रेशरों को बंद करने के आदेश जारी किए थे। इस आदेश के खिलाफ 34 स्टोन क्रशर मालिक एसएलपी दायर करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय गए। लेकिन वहां उनको कोई राहत नही मिली। उच्च न्यायलय के इस आदेश को संशोधित करने के लिए उनके द्वारा संशोधन प्रार्थना पत्र दिया गया। जिसमें कहा गया कि वे स्टोन क्रशर चलाना नही चाहते हैं। अब उनके भंडारण में बची सामग्री व मशीनों को सेल करना चाहते हैं। इसका विरोध करते हुए मातृ सदन की तरफ से कहा गया कि जो इनके द्वारा पर्यावरण की क्षति की गई है उसकी भरपाई इनकी ऑक्शन होने वाली सामग्री से की जाय। जिसपर कोर्ट ने मातृ सदन से कहा कि इसमें दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब पेश करें।
कोर्ट ने अगली सुनवाई हेतु 12 मार्च की तिथि नियत की है। मामले के अनुसार हरिद्वार मातृ सदन ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि हरिद्वार में रायवाला से भोगपुर के बीच गंगा नदी में नियमों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से अवैध खनन किया जा रहा है जिससे गंगा नदी के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। गंगा नदी में खनन करने वाले नेशनल मिशन क्लीन गंगा को पलीता लगा रहे हैं। जनहित याचिका में कोर्ट से प्रार्थना की गई है कि गंगा नदी में हो रहे अवैध खनन पर रोक लगाई जाए ताकि गंगा नदी के अस्तित्व को बचाया जा सके। अब खनन कुम्भ क्षेत्र में भी किया जा रहा है। याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि केंद्र सरकार ने गंगा नदी को बचाने के लिए एनएमसीजी बोर्ड गठित किया है। जिसका मुख्य उद्देश्य गंगा को साफ करना व उसके अस्तित्व को बचाए रखना है। एनएमसीजी द्वारा राज्य सरकार को बार-बार आदेश दिए गए कि यहां खनन कार्य नहीं किया जाय। उसके बाद में सरकार ने यहां खनन कार्य करवाया जा रहा है। यूएन ने भी भारत सरकार को निर्देश दिए थे कि गंगा को बचाने के लिए क्या-क्या कदम उठाए जा रहे। उसके बाद भी सरकार द्वारा गंगा के अस्तित्व को समाप्त किया जा रहा है।