उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसलाः सिर्फ़ फोन कॉल को नहीं माना जाएगा सुनवाई का मौका! जाति प्रमाण पत्र रद्द करने से पहले कारण बताओ नोटिस अनिवार्य, जानें क्या है मामला?

The Uttarakhand High Court has issued a significant ruling: a mere phone call will not be considered a hearing! A show-cause notice is mandatory before canceling a caste certificate. Find out what th

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि किसी व्यक्ति को सिर्फ़ फ़ोन कॉल करना, जाति प्रमाण पत्र रद्द करने से पहले 'कारण बताओ नोटिस' जारी करने की शर्त को पूरा नहीं करता। कोर्ट ने कहा कि जाति प्रमाण पत्र रद्द करने से, जिससे नागरिक अधिकार मिलते हैं, प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का उचित और सही मौक़ा मिलना ज़रूरी है।

जस्टिस पंकज पुरोहित रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में तहसीलदार द्वारा 09.07.2025 को जारी उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें याचिकाकर्ता का OBC जाति प्रमाण पत्र रद्द किया गया था। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि प्रमाण पत्र रद्द करने से पहले उसे सुनवाई का कोई मौक़ा नहीं दिया गया। कोर्ट के निर्देश पर राज्य सरकार ने कुछ निर्देश पेश किए, जिनमें कहा गया कि याचिकाकर्ता के 'स्थानांतरण प्रमाण पत्र' (Transfer Certificate) में कुछ छेड़छाड़ पाई गई, जिसके आधार पर जाति प्रमाण पत्र जारी किया गया। आगे यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता से फ़ोन पर संपर्क किया गया और उससे अपनी जाति साबित करने के लिए दूसरे दस्तावेज़ पेश करने को कहा गया, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया।

कोर्ट ने राज्य सरकार के पक्ष पर विचार किया और जांच की कि क्या इस तरह का संपर्क, सुनवाई का मौक़ा देने की शर्त का पालन माना जा सकता है। कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि याचिकाकर्ता से फ़ोन पर संपर्क करना, सुनवाई का उचित और प्रभावी मौक़ा नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि, क्योंकि जाति प्रमाण पत्र से नागरिक अधिकार मिलते हैं, इसलिए इसे रद्द करने से पहले सुनवाई का उचित मौक़ा देने की शर्त का पालन करना ज़रूरी है। कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि प्रमाण पत्र रद्द करने की प्रक्रिया शुरू करने से पहले याचिकाकर्ता को 'कारण बताओ नोटिस' जारी किया जाना ज़रूरी है।

कोर्ट ने कहा, “कानून के मुताबिक़, क्योंकि जाति प्रमाण पत्र से याचिकाकर्ता को नागरिक अधिकार मिले थे, इसलिए इसे रद्द करने के लिए याचिकाकर्ता को सुनवाई का उचित और सही मौक़ा दिया जाना चाहिए था। जाति प्रमाण पत्र रद्द करने से पहले प्रतिवादियों द्वारा की जाने वाली कानूनी शर्त को पूरा करने के लिए, सिर्फ़ फ़ोन पर कॉल करना काफ़ी नहीं है।”

इस तरह की प्रक्रिया का पालन न होने के कारण कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि अधिकारी द्वारा की गई यह कार्रवाई सही नहीं मानी जा सकती। तदनुसार, हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार की और तहसीलदार द्वारा 09.07.2025 को पारित आदेश रद्द किया, जिसमें याचिकाकर्ता का जाति प्रमाण पत्र निरस्त किया गया। साथ ही कोर्ट ने राज्य को यह छूट दी कि वह याचिकाकर्ता को सुनवाई का उचित और तर्कसंगत अवसर प्रदान करने के बाद इस मामले में जांच कर सकता है।