आपदा प्रबंधन में 'विश्व गुरु' बना उत्तराखंड: ब्रिक्स सम्मेलन में 11 देशों ने सराहा सूबे का रेस्क्यू मॉडल
ओडिशा। प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से देश के सबसे संवेदनशील राज्यों में शुमार उत्तराखंड ने एक बार फिर पूरी दुनिया के सामने अपनी अद्वितीय आपदा प्रबंधन क्षमता और अदम्य साहस का दम दिखाया है। ओडिशा के पुरी में आयोजित प्रतिष्ठित ब्रिक्स आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्य समूह की बैठक में उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन मॉडल की जमकर सराहना हुई। वैश्विक मंच पर न केवल भारत की तैयारियों को सम्मान मिला, बल्कि ब्राजील, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात समेत 11 देशों के दिग्गजों ने उत्तराखंड की पीठ थपथपाई।
सम्मेलन में उत्तरकाशी के ऐतिहासिक सिलक्यारा टनल रेस्क्यू ऑपरेशन और धराली आपदा राहत अभियान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मिसाल के तौर पर पेश किया गया। कठिन और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में राज्य आपदा प्रतिवादन बल (SDRF) और अन्य सहयोगी एजेंसियों द्वारा किए गए अभूतपूर्व कार्यों को दुनिया भर के प्रतिनिधियों ने खड़े होकर सराहा। भारत की अध्यक्षता में 3 से 5 जून तक आयोजित ब्रिक्स डीआरआर कार्य समूह की दूसरी तकनीकी बैठक में उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व एसडीआरएफ सेनानायक अर्पण यदुवंशी और यूएलएमएमसी निदेशक शान्तनु सरकार ने किया। भारतीय अधिकारियों ने देवभूमि में चलाए गए जटिल राहत और बचाव अभियानों की जो केस स्टडी प्रस्तुत की, उसने वैश्विक विशेषज्ञों को हैरान कर दिया। अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने सर्वसम्मति से माना कि बेहद कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित समय में उत्तराखंड ने जिस तरह से त्वरित और समन्वित कार्रवाई की, वह दुनिया के अन्य पहाड़ी देशों के लिए एक बेहतरीन सीख है। सम्मेलन में 5 अगस्त 2025 को उत्तरकाशी के धराली में आए बादलों के फटने (क्लाउडबर्स्ट) के बाद की तबाही का विशेष रूप से जिक्र किया गया। खीर गंगा नदी में आए भारी मलबे ने पूरे कस्बे को अपनी चपेट में ले लिया था, जिससे घर, सड़कें और बुनियादी ढांचा तबाह हो गया था। लेकिन, सेना, वायुसेना, आईटीबीपी, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ ने मिलकर जो संयुक्त अभियान चलाया, उसने सैकड़ों जिंदगियों को सुरक्षित बचा लिया। ब्रिक्स के विशेषज्ञों ने इस अभियान को 'त्वरित प्रतिक्रिया और मानवीय संवेदनशीलता' का सबसे बड़ा उदाहरण बताया।
12 नवंबर 2023 को चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना के तहत बन रही सिलक्यारा-बड़कोट सुरंग में हुए भूस्खलन ने पूरे देश की सांसें अटका दी थीं। टनल के अंदर 41 मजदूर फंस गए थे। इस 4.5 किलोमीटर लंबी सुरंग में चला 17 दिनों का रेस्क्यू ऑपरेशन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। अत्याधुनिक मशीनों, देसी कौशल (रैट माइनर्स) और विज्ञान के बेजोड़ तालमेल से सभी 41 श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकाला गया था। ब्रिक्स सम्मेलन में मौजूद वैश्विक वैज्ञानिकों ने माना कि उत्तराखंड ने यह साबित कर दिया है कि बेहतर तकनीक और एजेंसियों के सटीक समन्वय से प्रकृति की सबसे बड़ी चुनौती को भी मात दी जा सकती है। एसडीआरएफ सेनानायक अर्पण यदुवंशी ने बताया कि उत्तराखंड अब केवल आपदा के बाद राहत कार्य तक सीमित नहीं है, बल्कि 'वैज्ञानिक योजना' और 'जोखिम न्यूनीकरण' पर लगातार काम कर रहा है। वहीं, आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन के कुशल निर्देशन में चल रही गतिविधियों को साझा करते हुए निदेशक शान्तनु सरकार ने कहा कि राज्य में पूर्व चेतावनी प्रणाली को बेहद मजबूत किया जा रहा है, ताकि आपदा आने से पहले ही जान-माल के नुकसान को न्यूनतम किया जा सके। ब्रिक्स देशों के प्रतिनिधियों ने स्वीकार किया कि आपदा के समय केवल मशीनें काम नहीं आतीं, बल्कि प्रशासनिक तालमेल और मानवीय दृष्टिकोण सबसे बड़ा हथियार होता है। उत्तराखंड के इस जज्बे ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के आपदा प्रबंधन की साख को एक नया मुकाम दे दिया है।