Sep 08, 2026 Login

घाटी में 36 साल बाद भी वही खौफ: कश्मीर में 17 दिन में दो धमकी भरे लेटर, अब बाहरी मजदूर भी निशाने पर

The same fear grips the Valley even after 36 years: Two threatening letters in Kashmir in 17 days; now, migrant workers are also being targeted.

श्रीनगर। घाटी में तीन दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी आतंकवाद का साया और खौफ का मंजर कम होने का नाम नहीं ले रहा है। 1990 के उस दर्दनाक दौर की यादें एक बार फिर ताजा हो गई हैं, जब कश्मीरी पंडितों को रातों-रात अपना घर-बार छोड़कर भागने पर मजबूर होना पड़ा था। अब वही खौफ एक बार फिर पैर पसार रहा है। पिछले 17 दिनों में कश्मीरी पंडितों को मिले दो धमकी भरे पत्रों के बाद अब आतंकियों ने राज्य में काम कर रहे बाहरी मजदूरों को अपना निशाना बनाने की चेतावनी दी है।

जम्मू-कश्मीर में आतंक और धमकी का साया एक बार फिर लोगों की चिंता बढ़ा रहा है। सोशल मीडिया पर यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (यूएलसी) के नाम से कथित तौर पर जारी एक नया धमकी भरा संदेश सामने आया है। इसमें घाटी में काम कर रहे बाहरी मजदूरों को निशाना बनाते हुए उन्हें जम्मू-कश्मीर छोड़ने की चेतावनी दी गई है। सुरक्षा एजेंसियां इस संदेश की प्रामाणिकता और इसके पीछे सक्रिय लोगों की भूमिका की जांच कर रही हैं। एजेंसियों के मुताबिक यूएलसी को प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े ऑनलाइन प्रॉक्सी फ्रंट के तौर पर देखा जाता है। नए संदेश में बाहरी मजदूरों पर जम्मू-कश्मीर में स्थायी रूप से बसने की कोशिश करने का आरोप लगाया गया है। संदेश में उन्हें कथित तौर पर दिल्ली का ‘मोहरा’ बताते हुए हिंसक परिणाम भुगतने की धमकी दी गई है। स्थानीय लोगों से भी ऐसे लोगों को बाहर निकालने की अपील की गई है। धमकी भरे संदेश में विरोध प्रदर्शनों को दिखावा बताते हुए हिंसा की चेतावनी दी गई है। सुरक्षा एजेंसियां इसे आम नागरिकों में भय पैदा करने और तनाव बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देख रही हैं। नया संदेश ऐसे समय सामने आया है जब पिछले कुछ सप्ताह से कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को भी कथित धमकी भरे संदेश मिल रहे हैं। जुलाई-अगस्त 2026 से सामने आए इन संदेशों में प्रधानमंत्री के पुनर्वास पैकेज के तहत घाटी में काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को निशाना बनाया गया। कुछ संदेशों में कर्मचारियों की पहचान से जुड़ी निजी जानकारियां सार्वजनिक कर उन्हें निगरानी और हमले की चेतावनी दिए जाने का दावा किया गया।

बीते दिनों सामने आए धमकी भरे पत्रों के क्रम ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। 7 अगस्त को कथित पहला पत्र, इसके बाद 23 अगस्त को दूसरा संदेश और फिर 1 सितंबर को एक और पत्र सामने आने की बात कही जा रही है। एक सितंबर के संदेश में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा की अध्यक्षता में हुई सुरक्षा बैठक और कश्मीरी कर्मचारियों को सुरक्षा के लिए हथियार उपलब्ध कराने से जुड़े फैसले का भी कथित तौर पर विरोध किया गया। लगातार सामने आ रहे इन संदेशों ने घाटी में काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के बीच सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। कर्मचारी बेहतर सुरक्षा व्यवस्था की मांग को लेकर प्रदर्शन भी कर चुके हैं। कश्मीर में बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों से मौसमी मजदूर रोजी-रोटी के लिए पहुंचते हैं। निर्माण कार्य, ईंट भट्ठों, बागवानी और अन्य क्षेत्रों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। जुलाई में कुलगाम में ईंट भट्ठे पर काम करने वाले दो मजदूरों की लक्षित हत्या के बाद से बाहरी मजदूरों में पहले ही डर का माहौल बताया जा रहा है। ऐसे में धमकी भरे नए संदेश ने उनकी चिंता और बढ़ा दी है। जम्मू-कश्मीर प्रशासन पहले भी यूएलसी के नाम से सामने आने वाले पोस्टरों और ऑनलाइन संदेशों को गंभीर चिंता का विषय बता चुका है। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को ऐसे मामलों पर नजर रखने तथा धमकी के स्रोत का पता लगाने के निर्देश दिए गए हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को मिल रही धमकियों की गहराई से जांच की मांग की है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर कम चर्चित संगठन के नाम से धमकी देने वालों तक कर्मचारियों की निजी जानकारी कैसे पहुंच रही है। उन्होंने इसे साजिश बताते हुए उपराज्यपाल प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, ये उनके राजनीतिक आरोप हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को मिल रही धमकियों का मुद्दा केंद्र के सामने उठा चुके हैं और मामले की जांच की मांग कर चुके हैं। उनका सवाल है कि घाटी में काम कर रहे इन कर्मचारियों को ही बार-बार निशाना क्यों बनाया जा रहा है। कश्मीरी पंडितों के लिए धमकियों का यह सिलसिला सिर्फ मौजूदा सुरक्षा चिंता नहीं है, बल्कि तीन दशक से अधिक पुराने जख्मों को भी कुरेद रहा है। 1990 के दशक में आतंकवाद और हिंसा के दौर में बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी से पलायन करना पड़ा था। 19 जनवरी 1990 को कश्मीर के इतिहास में एक बेहद भयावह दौर की शुरुआत के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। 36 साल बाद भी धमकी भरे संदेश सामने आना यह सवाल खड़ा करता है कि क्या घाटी में लौटकर सामान्य जीवन शुरू करने की कोशिश कर रहे लोगों का डर पूरी तरह खत्म हुआ है? फिलहाल सुरक्षा एजेंसियां इन संदेशों की सत्यता, स्रोत और संभावित साजिश की जांच कर रही हैं। चुनौती सिर्फ धमकी देने वालों तक पहुंचने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि आतंक और भय का इस्तेमाल कर आम नागरिकों, कश्मीरी पंडितों और बाहर से काम करने आए मजदूरों के बीच फिर से अविश्वास और दहशत का माहौल पैदा न किया जा सके।