Sep 05, 2026 Login

नोएडा श्रमिक प्रोटेस्ट: छात्रा आकृति चौधरी पर लगा NSA रद! हाईकोर्ट ने कहा- सरकार की कहानी मनगढ़ंत, डीएम अपनी सैलरी से दें 5 लाख का मुआवजा

Noida Workers' Protest: NSA invoked against student Akriti Chaudhary quashed! High Court terms government's version 'fabricated'; orders DM to pay ₹5 lakh compensation from personal salary.

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा-ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में अप्रैल में हुए श्रमिक आंदोलन से जुड़े मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी को बड़ी राहत दी है। हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी रासुका के तहत निरुद्ध किए जाने को अवैध करार देते हुए निरुद्धि आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। अदालत ने मामले में सरकार को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया है। यह राशि गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी के वेतन से अदा किए जाने का निर्देश दिया गया है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने आकृति चौधरी की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य सरकार से आकृति चौधरी को रासुका के तहत निरुद्ध करने के आधार स्पष्ट करने को कहा था। कोर्ट ने पुलिस कार्रवाई के समर्थन में उपलब्ध साक्ष्य और संबंधित दस्तावेज भी पेश करने के निर्देश दिए थे। अदालत ने उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करने के बाद पाया कि आकृति की निरुद्धि को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त आधार और साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके। इसी आधार पर कोर्ट ने निरुद्धि आदेश को अवैध मानते हुए उसे रद्द कर दिया। अदालत के इस फैसले से आकृति चौधरी को तत्काल राहत मिली है। हालांकि उनकी रिहाई का आदेश इस शर्त के साथ है कि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हों। मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सरकार से कई अहम सवाल किए थे।

कोर्ट ने पूछा था कि आकृति चौधरी को रासुका के तहत निरुद्ध करने के लिए प्रशासन के पास कौन से ठोस आधार और साक्ष्य मौजूद हैं। इसके अलावा पीठ ने यह भी जानना चाहा था कि एफआईआर दर्ज किए जाने से पहले आकृति को शांति भंग की आशंका के संबंध में कोई नोटिस दिया गया था या नहीं। अदालत ने पुलिस और प्रशासन से संबंधित दस्तावेज पेश करने को कहा था, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि निरुद्धि की कार्रवाई कानून के अनुरूप थी या नहीं। हाई कोर्ट ने मामले में उन कथित वीडियो और वॉट्सऐप चैट से जुड़ी सामग्री भी मांगी थी, जिन्हें पुलिस ने श्रमिकों को कथित तौर पर भड़काने के आरोपों के समर्थन में महत्वपूर्ण बताया था। पुलिस का आरोप था कि 13 अप्रैल को वेतन वृद्धि की मांग को लेकर चल रहे श्रमिक आंदोलन के दौरान आकृति चौधरी ने मजदूरों को भड़काने का प्रयास किया। पुलिस के मुताबिक, आंदोलन के बाद हिंसा और आगजनी की घटनाएं हुईं और इससे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई। हालांकि, हाई कोर्ट के समक्ष इन आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके। अदालत ने उपलब्ध सामग्री की समीक्षा के बाद माना कि रासुका के तहत निरुद्धि को उचित ठहराने के लिए जरूरी पर्याप्त आधार और साक्ष्य सामने नहीं आए। पुलिस और प्रशासन की ओर से आकृति चौधरी के खिलाफ कार्रवाई को श्रमिक आंदोलन के दौरान कानून-व्यवस्था बिगड़ने से जोड़कर देखा गया था। आरोप था कि आंदोलन के दौरान कथित तौर पर मजदूरों को उकसाने की कोशिश की गई, जिसके बाद स्थिति हिंसक हो गई। पुलिस के मुताबिक, घटना के दौरान हिंसा और आगजनी हुई तथा सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई। इसी आधार पर आकृति के खिलाफ कार्रवाई आगे बढ़ाई गई और उन्हें रासुका के तहत निरुद्ध किया गया। लेकिन हाई कोर्ट में सरकार की ओर से पेश सामग्री को पर्याप्त न मानते हुए पीठ ने निरुद्धि आदेश को रद्द कर दिया। अदालत के फैसले ने रासुका के इस्तेमाल और उसके लिए जरूरी साक्ष्यों को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं।

पांच लाख रुपये मुआवजे का भी आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने केवल निरुद्धि आदेश रद्द करने तक सीमित न रहते हुए आकृति चौधरी को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मुआवजा गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी के वेतन से अदा किया जाएगा। अदालत का यह निर्देश मामले को और महत्वपूर्ण बनाता है। कोर्ट ने एक ओर रासुका के तहत की गई निरुद्धि को अवैध माना, वहीं दूसरी ओर प्रभावित व्यक्ति को आर्थिक क्षतिपूर्ति देने का भी आदेश दिया है।