बिहार का भरत तिवारी एनकाउंटर: सरेंडर के बाद गोली चली या पुलिस ने बचाव में की कार्रवाई? सवालों के घेरे में पूरा घटनाक्रम, सड़कों पर उतरे युवा
भोजपुर (बिहार)। बिहार के भोजपुर जिले में सोशल मीडिया पर बाढ़ और कटाव जैसे जनसरोकार के मुद्दे उठाने वाले युवा भरत भूषण तिवारी की पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत ने पूरे देश में बहस छेड़ दी है। एक ओर पुलिस इसे आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई बता रही है, वहीं परिजन और ग्रामीण इसे फर्जी एनकाउंटर करार दे रहे हैं। मामले ने इतना तूल पकड़ लिया है कि राज्य सरकार को न्यायिक जांच कराने की घोषणा करनी पड़ी है। बिलौटी गांव निवासी भरत भूषण तिवारी विज्ञान स्नातक (बीएससी) थे और पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया के माध्यम से क्षेत्र में बाढ़, कटाव और विकास कार्यों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे थे। स्थानीय स्तर पर उन्हें एक मुखर सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी देखा जाता था।विवाद की शुरुआत 16 जून से हुई, जब भरत का एक वीडियो सामने आया जिसमें वह कथित तौर पर पिस्टल के साथ दिखाई दे रहे थे। सूचना मिलने पर पुलिस उनके घर पहुंची और कई घंटों तक बातचीत भी हुई, लेकिन उस दिन कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। अगले दिन घटनाक्रम ने अचानक हिंसक मोड़ ले लिया। पुलिस के अनुसार 17 जून को भरत को पकड़ने के लिए स्थानीय पुलिस और विशेष टीम ने घेराबंदी की थी। अधिकारियों का दावा है कि इस दौरान भरत ने अवैध हथियार से फायरिंग की और पुलिस दल पर भी गोली चलाई। पुलिस का कहना है कि जवाबी कार्रवाई केवल आत्मरक्षा के लिए की गई, जिसमें भरत घायल हुए और बाद में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। हालांकि परिवार का पक्ष पूरी तरह अलग है। परिजनों का आरोप है कि भरत ने फेसबुक लाइव के दौरान अपना हथियार फेंककर आत्मसमर्पण कर दिया था। उनका कहना है कि सरेंडर के बावजूद पुलिस ने उन पर कई गोलियां चलाईं। परिवार का दावा है कि घटना के वायरल वीडियो भी इसी ओर इशारा करते हैं और इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है। भरत की मां और अन्य परिजनों ने इसे सुनियोजित हत्या बताते हुए कई गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि भरत किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं था बल्कि वह प्रशासनिक लापरवाही और बाढ़ पीड़ितों की समस्याओं को लगातार उजागर कर रहा था। इसी कारण वह कुछ लोगों के निशाने पर आ गया। घटना के बाद पुलिस प्रशासन भी सवालों के घेरे में आ गया है। जानकारी के अनुसार, 16 जून को हुई प्रारंभिक कार्रवाई में कथित लापरवाही को लेकर शाहपुर थाना प्रभारी समेत कुछ पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई एनकाउंटर को लेकर नहीं बल्कि पहले दिन की प्रक्रियागत कमियों के कारण की गई है। इस बीच पुलिस ने भरत, उनके पिता काशीनाथ तिवारी और भाई चंदन तिवारी के खिलाफ भी विभिन्न धाराओं में मुकदमे दर्ज किए हैं। आरोपों में अवैध हथियार रखने, पुलिस कार्य में बाधा पहुंचाने और संरक्षण देने जैसी धाराएं शामिल हैं। अब इस पूरे मामले का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या भरत तिवारी ने वास्तव में आत्मसमर्पण कर दिया था, या फिर पुलिस पर फायरिंग जारी रखी थी? वायरल वीडियो, प्रत्यक्षदर्शियों के दावे और पुलिस के आधिकारिक बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। ऐसे में न्यायिक जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि भोजपुर में 17 जून को वास्तव में क्या हुआ था और भरत तिवारी की मौत किन परिस्थितियों में हुई।
सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की मांग
मामले को लेकर कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र भेजकर स्वतः संज्ञान लेने की मांग की है। पत्र में कहा गया है कि पुलिस मुठभेड़ से जुड़े मामलों में सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा तय दिशा-निर्देशों का पालन किया जाना आवश्यक है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या न्यायिक आयोग से कराई जानी चाहिए ताकि सच्चाई सामने आ सके। साथ ही, यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता या शक्ति के दुरुपयोग की पुष्टि होती है तो संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
आरा में निकला विशाल कैंडल मार्च
भरत तिवारी की मौत के विरोध में आरा शहर में युवाओं ने बड़ा कैंडल मार्च और न्याय मार्च निकाला। युवा नेता और समाजसेवी मोनू सिंह के नेतृत्व में कतीरा से लेकर जेपी स्मारक तक सैकड़ों युवाओं ने हाथों में मोमबत्तियां लेकर मार्च किया। मार्च के दौरान प्रदर्शनकारी ‘भरत तिवारी अमर रहें’ और ‘हमें न्याय चाहिए’ जैसे नारे लगाते रहे। युवाओं के हाथों में न्याय की मांग से जुड़े पोस्टर और बैनर भी दिखाई दिए। पूरे मार्ग में प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की गई और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई गई। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि पुलिस कार्रवाई पूरी तरह नियमों के तहत हुई है तो इसकी निष्पक्ष जांच से सच्चाई सामने आ जाएगी। लेकिन यदि किसी प्रकार की गलती हुई है तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई होनी चाहिए। युवाओं का आरोप है कि भरत तिवारी कथित तौर पर आम लोगों की समस्याओं को उठाने वाले व्यक्ति थे और वे व्यवस्था की ज्यादती का शिकार हुए हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।