Aug 20, 2026 Login

नैनीताल:हाईकोर्ट को हल्द्वानी शिफ्ट करने के मामले में फैसला सुरक्षित,वन भूमि के चयन पर उठे सवाल!राज्य सरकार ने प्रस्तावित भूमि को हाथी कॉरिडोर का हिस्सा मानने से किया इनकार

The decision regarding the relocation of the High Court to Haldwani has been reserved, and questions have been raised about the selection of forest land. The state government has refused to consider

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी के बेल बाबा क्षेत्र में स्थानांतरित करने के लिए भूमि आरक्षित किए जाने और प्रशासनिक स्वीकृति दिए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर शुक्रवार को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

उच्च न्यायालय के अधिवक्ता और राज्य आंदोलनकारी रमन शाह की ओर से दायर याचिका में बेल बाबा क्षेत्र में चिन्हित भूमि को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि जिलाधिकारी नैनीताल की वह रिपोर्ट, जिसमें हाईकोर्ट को बेल बाबा मंदिर के पास रिजर्व फॉरेस्ट की भूमि पर स्थानांतरित किए जाने की संभावना जताई गई है, वन संरक्षण अधिनियम, 1980 की धारा-2 के प्रावधानों के विपरीत है।

याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि संबंधित भूमि रिजर्व फॉरेस्ट की श्रेणी में आती है और वहां बड़े स्तर पर पौधरोपण भी किया गया है। ऐसे में इस भूमि को हाईकोर्ट के निर्माण के लिए चिन्हित किए जाने पर सवाल उठाते हुए संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच और नियमानुसार कार्रवाई की मांग की गई।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी दिया हवाला

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के 15 जुलाई 2026 के आदेश के बाद भी उक्त भूमि का वन स्वरूप समाप्त नहीं हो जाता। उनका कहना है कि राज्य सरकार की 12 अगस्त 2026 की अधिसूचना में भी संबंधित भूमि को 'फॉरेस्ट लैंड' के तौर पर दर्ज किया गया है।

याचिकाकर्ता के मुताबिक, वन संरक्षण अधिनियम के तहत रिजर्व फॉरेस्ट की भूमि को डी-रिजर्व करने की प्रक्रिया निर्धारित है और इसके लिए केंद्र सरकार की अनुमति आवश्यक होती है। ऐसे में केवल न्यायिक आदेश के आधार पर वन भूमि का स्वरूप बदलने का दावा कानून के प्रावधानों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

याचिका में यह भी सवाल उठाया गया कि जब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर कार्यवाही और रोक की स्थिति बनी हुई थी, तब मई 2026 में जिलाधिकारी की ओर से उक्त भूमि को हाईकोर्ट के लिए हस्तांतरित करने का प्रस्ताव किस आधार पर तैयार किया गया।

'हाथी कॉरिडोर' होने का भी दावा

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि प्रस्तावित भूमि हाथी कॉरिडोर क्षेत्र में आती है और वहां पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील परिस्थितियां हैं। ऐसे क्षेत्र में हाईकोर्ट जैसे बड़े संस्थान के निर्माण से पर्यावरण और वन्यजीवों पर संभावित प्रभाव को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

याचिकाकर्ता ने उत्तराखंड राज्य गठन की मूल भावना का हवाला देते हुए कहा कि राज्य का गठन पर्वतीय क्षेत्र के विकास और उसकी विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर हुआ था। ऐसे में राज्य के प्रमुख संस्थानों में से एक हाईकोर्ट को पहाड़ से मैदान में स्थानांतरित करने के औचित्य पर भी विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि हाईकोर्ट को स्थानांतरित करना ही है तो पर्वतीय क्षेत्र में ही उपयुक्त स्थान तलाशा जाना चाहिए।

सरकार ने कहा, आगे की प्रक्रिया जारी

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि हाईकोर्ट के स्थानांतरण को लेकर आगे की प्रक्रिया जारी है। सरकार की ओर से प्रस्तावित भूमि को हाथी कॉरिडोर का हिस्सा होने से भी इनकार किया गया।

वहीं, हाईकोर्ट को हल्द्वानी स्थानांतरित करने का विरोध कर रहे अधिवक्ताओं की ओर से कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश में नैनीताल जिले में उपलब्ध भूमि को लेकर निर्देश दिए गए हैं, ऐसे में केवल हल्द्वानी क्षेत्र में ही भूमि चिन्हित करने पर सवाल उठता है। उनका कहना था कि नैनीताल जिले के अन्य क्षेत्रों में भी भूमि उपलब्ध हो सकती है, इसलिए किसी एक स्थान को ही हाईकोर्ट के लिए निर्धारित करने का औचित्य स्पष्ट किया जाना चाहिए।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब हाईकोर्ट के निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि प्रस्तावित भूमि और हाईकोर्ट के स्थानांतरण को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर कोर्ट का क्या रुख रहता है।