Oct 14, 2026 Login
Awaaz24x7-government

चीन सीमा पर गूंजा 'कैलाश मुक्ति' का शंखनाद: नेलांग-मानसरोवर कॉरिडोर के लिए संतों ने लिया संकल्प

The Conch Call for 'Kailash Liberation' Resounds at the China Border: Saints Pledge to Establish the Nelang-Mansarovar Corridor

उत्तरकाशी। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों से कैलाश मानसरोवर की सुगम यात्रा को लेकर एक बार फिर बड़ी मुहिम शुरू हो गई है। उत्तरकाशी की नेलांग घाटी में समुद्र तल से 11,500 फीट की ऊंचाई पर देश भर से जुटे साधु-संतों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों ने एक ऐतिहासिक संकल्प पारित किया है। इस संकल्प का मुख्य उद्देश्य पौराणिक 'नेलांग-जादूंग-कैलाश मानसरोवर मार्ग' को पुनर्जीवित कर इसे एक भव्य कॉरिडोर के रूप में विकसित करना है।

भारत-चीन सीमा पर स्थित नेलांग के 'लाल देवता' परिसर में गंगा पूजन के साथ इस अभियान का आगाज हुआ। पहली बार आयोजित की गई 'कैलाश मुक्त यात्रा' के तहत करीब 100 संतों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शिव-पार्वती चोटी के नीचे विशेष पूजा-अर्चना की। यात्रा का नेतृत्व कर रही साध्वी रेणुका गुरुमां ने बताया कि यह मार्ग केवल एक रास्ता नहीं, बल्कि हमारी आस्था का प्रतीक है। संतों ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया है, जिसे जल्द ही राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को सौंपा जाएगा। इतिहास और पुराणों के अनुसार, प्राचीन काल में गंगोत्री धाम से साधु-संत नेलांग और जादूंग होते हुए अंतिम सीमा 'झेलूखागा' मार्ग से तिब्बत स्थित कैलाश मानसरोवर जाते थे। मान्यता है कि पशुपतिनाथ मंदिर (नेपाल) जाने वाला गंगाजल भी इसी पवित्र मार्ग से ले जाया जाता था। 1962 के युद्ध और तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद से यह मार्ग बंद है। संतों का तर्क है कि अन्य मार्गों की तुलना में नेलांग मार्ग से यात्रा न केवल कम समय में पूरी होगी, बल्कि यह सबसे सुगम भी है। प्रस्ताव में मांग की गई है कि भारत सरकार चीन के साथ कूटनीतिक वार्ता कर इस मार्ग को दोबारा खुलवाए और यहाँ 'नेलांग-कैलाश मानसरोवर कॉरिडोर' की स्थापना करे। इससे न केवल तीर्थयात्रियों को सुविधा होगी, बल्कि भारत-तिब्बत व्यापार के पुराने दिनों को भी पुनर्जीवित किया जा सकेगा। साध्वी रेणुका गुरुमां ने स्पष्ट किया कि इस विषय पर गृह मंत्री अमित शाह से सकारात्मक वार्ता चल रही है। उन्होंने संकल्प लिया कि जब तक नेलांग-मानसरोवर कॉरिडोर की मांग पूरी नहीं होती, तब तक यह अभियान और गंगा पूजन का संकल्प जारी रहेगा। सीमावर्ती क्षेत्रों में इस तरह के धार्मिक और रणनीतिक अभियान से न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी भारत की उपस्थिति मजबूत होगी।