चंपावत फर्जी गैंगरेप केसः साजिशकर्ता की जमानत याचिका पर हुई सुनवाई! हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने चंपावत में 5 मई की रात एक युवती के साथ हुए तथाकथित सामूहिक दुराचार की घटना की साजिश करने के आरोप में गिरफ्तार आनंद सिंह महरा की जमानत याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से जबाव पेश करने को कहा है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ में हुई। आरोपी आनंद सिंह महरा की जमानत याचिका निचली अदालत द्वारा खारिज कर दी गई है। जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी है। सुनवाई के दौरान मामले के कानूनी पहलुओं और एक ही घटना चक्र को लेकर पुलिस द्वारा दर्ज की गई एक से अधिक प्राथमिकी का संज्ञान लेते हुए, न्यायालय ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर इस पर अपनी विस्तृत लिखित आपत्ति प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। मामले के अनुसार 5 मई 2026 की रात चंपावत में एक युवती समीप के गांव में शादी समारोह में गई थी। जहां दूध की डेयरी के पास वह नग्नावस्था में मिली थी, उसके हाथपांव बांधे हुए थे। जिसकी रिपोर्ट युवती के पिता ने 6 मई को दर्ज कराई थी। शुरुआत में पुलिस ने इस घटना में पूरन रावत, विनोद रावत व नवीन रावत की संलिप्तता की संभावना जताई। लेकिन मेडिकल जांच में युवती के साथ दुराचार व जबरदस्ती न होने की पुष्टि हुई। जांच में कमल रावत व उसकी महिला मित्र द्वारा इस प्रकरण को साजिश के तहत सामूहिक दुराचार का रूप देने पर उन्हें गिरफ्तार किया और उनसे पूछताछ के बाद इस साजिश में आनंद सिंह महरा का नाम भी उजागर हुआ। जिसके बाद पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार किया था।
जिसमें याचिकाकर्ता के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम की विभिन्न धाराओं और भारतीय न्याय संहिता की धारा 61(2) (आपराधिक साजिश) सहित अन्य गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। याचिकाकर्ता आनंद सिंह महरा 13 मई 2026 से ही न्यायिक हिरासत के तहत जेल में बंद हैं। कोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने जोरदार तरीके से तर्क दिया कि पुलिस द्वारा एक ही घटनाक्रम को तोड़-मरोड़ कर और द्वेषवश राजनीतिक व प्रशासनिक दबाव में याचिकाकर्ता को फंसाने के लिए एकाधिक एफआईआर दर्ज की गई हैं, जो स्थापित कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ है। बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने न्यायालय के समक्ष मुख्य तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष द्वारा तैयार की गई "पूर्व-नियोजित साजिश" और बलात्कार के मामले की पूरी कहानी पूरी तरह से निराधार और राजनीति से प्रेरित है। अधिवक्ता ने जोर देकर कहा कि याचिकाकर्ता क्षेत्र का एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता है, जिसने एक लापता लड़की की खोज और क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सोशल मीडिया व सार्वजनिक मंचों पर आवाज उठाई थी। इसी जनहित के कार्य और स्थानीय ग्राम प्रधान के चुनावों को लेकर चल रही पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण प्रशासनिक तंत्र का दुरुपयोग करके याचिकाकर्ता को इस झूठे काउंटर-केस में फंसाया गया है। उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता और इन कानूनी विसंगतियों को देखते हुए राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने का समय दिया है तथा मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 जून की तिथि नियत की है।