अमेरिका-ईरान के बीच फिर बढ़ा तनाव! कुवैत-बहरीन तक तबाही, पश्चिम एशिया पर टिकीं दुनिया की निगाहें

Tensions flare up again between the US and Iran! Devastation reaches Kuwait and Bahrain; the world's eyes are fixed on West Asia.

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया एक बार फिर गंभीर भू-राजनीतिक तनाव के दौर से गुजर रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता की आशंकाओं को बढ़ा दिया है। हाल के दिनों में दोनों देशों की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और कड़े राजनीतिक बयान सामने आए हैं, जिससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या क्षेत्र एक बार फिर व्यापक संघर्ष की ओर बढ़ रहा है या यह केवल रणनीतिक दबाव की राजनीति का हिस्सा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा टकराव केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि इसके पीछे कूटनीतिक, आर्थिक, सामरिक और घरेलू राजनीतिक कारण भी जुड़े हुए हैं। दोनों देश बातचीत की मेज पर अपने-अपने पक्ष को मजबूत बनाए रखना चाहते हैं और किसी भी स्थिति में कमजोर दिखाई देने से बच रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकारों के अनुसार वर्तमान स्थिति को कोअर्सिव डिप्लोमेसी (Coercive Diplomacy) और ब्रिंकमैनशिप (Brinkmanship) की रणनीति का मिश्रण माना जा सकता है। इसका अर्थ है कि बातचीत जारी रखते हुए भी सैन्य दबाव बनाया जाए ताकि विरोधी पक्ष अपनी शर्तों में नरमी लाने को मजबूर हो। अमेरिका लगातार ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए है। वॉशिंगटन चाहता है कि तेहरान अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को सीमित या पूरी तरह बंद करे। दूसरी ओर ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह किसी भी बाहरी दबाव में अपनी नीतियों में बदलाव नहीं करेगा।

सैन्य कार्रवाई से बढ़ा तनाव, तेल बाजार पर पड़ता है सीधा असर
हालिया घटनाक्रम में अमेरिका द्वारा ईरान के कई ठिकानों पर हमले किए जाने की खबरों के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया। इसके जवाब में ईरान की ओर से भी सैन्य प्रतिक्रिया देखने को मिली, जिससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई। हालांकि दोनों पक्षों की ओर से किए गए दावों और जवाबी दावों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। विश्लेषकों का कहना है कि इस प्रकार की कार्रवाई कई बार विरोधी पक्ष पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा भी होती है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ते ही सबसे पहले असर वैश्विक तेल बाजार पर दिखाई देता है। निवेशकों में अनिश्चितता बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में उतार.चढ़ाव शुरू हो जाता है। इसके साथ ही दुनिया भर के शेयर बाजार भी प्रभावित होते हैं। पश्चिम एशिया दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। इसलिए यहां किसी भी प्रकार का सैन्य संघर्ष वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर असर डाल सकता है। भारत सहित तेल आयात पर निर्भर देशों के लिए भी ऐसी स्थिति चिंता का विषय बन जाती है।

पूरी दुनिया की निगाहें पश्चिम एशिया पर
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल दो देशों तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक कूटनीति पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों पक्ष बातचीत के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं तो तनाव कम हो सकता है। लेकिन यदि सैन्य कार्रवाई और जवाबी हमलों का सिलसिला जारी रहता है तो पश्चिम एशिया में अस्थिरता और बढ़ सकती है, जिसका असर पूरी दुनिया को झेलना पड़ सकता है।