अडानी के लिए किसानों के खेत कुर्बान?जेटपार में आखिर किसके पक्ष में झुका विकास? किसान की जमीन का मूल्य कौन करेगा तय?क्या विकास की कीमत सिर्फ गांव चुकाएंगे?

Sacrificing farmland for Adani? Adani, the government, and farmers! Whose favor is development in Jetpar? Who will determine the value of farmers' land? Will only villages pay the price for developme

गुजरात के मोरबी जिले का जेटपार गांव आज देश की विकास नीति के सामने एक असहज प्रश्न खड़ा कर रहा है। सवाल केवल मुआवज़े का नहीं है, सवाल यह है कि जब किसी बड़े कॉरपोरेट समूह की परियोजना और किसानों के अधिकार आमने-सामने खड़े दिखाई दें, तब सत्ता किसके साथ खड़ी नजर आती है।

जेटपार में चल रहा आंदोलन अडानी समूह की हाई-वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइन परियोजना से जुड़ा है। सरकार इसे राष्ट्रीय ऊर्जा अवसंरचना और हरित विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रही है, लेकिन किसानो के हितों का क्या?अगर यह परियोजना पूरे देश के हित में है तो उसकी सबसे बड़ी कीमत कुछ गांवों के किसान ही क्यों चुकाएं।

किसानों का कहना है कि वे बिजली परियोजना के विरोधी नहीं हैं। वे देश को ऊर्जा संपन्न बनाने के खिलाफ नहीं हैं। उनका विरोध उस व्यवस्था से है जिसमें उनकी उपजाऊ जमीन के ऊपर विशाल ट्रांसमिशन टावर खड़े होंगे, भूमि की उपयोगिता प्रभावित होगी, बाजार मूल्य घटेगा और आने वाली पीढ़ियों की आर्थिक सुरक्षा पर असर पड़ेगा, लेकिन बदले में उन्हें ऐसा मुआवज़ा दिया जा रहा है जिसे वे न्यायसंगत नहीं मानते।

बीते वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अडानी समूह के संबंधों को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। ऐसे में जेटपार का विवाद राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील हो गया है। किसान संगठनों का आरोप है कि सरकार किसानों की आशंकाओं को दूर करने के बजाय परियोजना को तेजी से आगे बढ़ाने में अधिक रुचि दिखा रही है। यही कारण है कि जेटपार का ये आंदोलन केवल भूमि विवाद नहीं, बल्कि सत्ता, कॉरपोरेट और किसान के बीच बदलते समीकरणों की कहानी बन चुका है। सरकार ने आंदोलन के दबाव के बाद मुआवज़ा बढ़ाने की घोषणा की है। अगर किसानों की आपत्तियां निराधार होतीं, तो क्या मुआवज़ा नीति में संशोधन की आवश्यकता पड़ती? यह प्रश्न आंदोलनकारी किसान बार-बार उठा रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल भरोसे का है। किसान लगातार ये कह रहे हैं कि उन्हें बयान नहीं, लिखित आदेश चाहिए। उन्हें आश्वासन नहीं, कानूनी गारंटी चाहिए। यह मांग केवल गुजरात के किसानों की नहीं है। यह उस ग्रामीण भारत की आवाज़ है जिसने वर्षों तक अधिग्रहण, अधिसूचनाओं और अधूरे वादों का अनुभव किया है।

निस्संदेह देश को बिजली चाहिए, ट्रांसमिशन नेटवर्क चाहिए और नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार भी जरूरी है। लेकिन अगर विकास का मॉडल ऐसा बने जिसमें लाभ निजी क्षेत्र को मिले और जोखिम ,सामाजिक लागत किसानों पर डाल दी जाए, तो असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है।

सरकार के समर्थक इसे राष्ट्रीय विकास का अनिवार्य हिस्सा बताएंगे। विरोधी इसे कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता देने वाली नीति कहेंगे। लेकिन लोकतंत्र में अंतिम कसौटी यही है कि सबसे कमजोर और सबसे प्रभावित व्यक्ति को न्याय मिला या नहीं। क्या भारत का विकास किसानों की भागीदारी से होगा या किसानों की कीमत पर?